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स्वायत्तता बनाम संकुचन

शोध कार्य या पुस्तक लेखन पूरी तरह शोधार्थी और शिक्षकों की अकादमिक स्वायत्ता का सवाल है, उसमें किसी भी तरह का राजनीतिक या अन्य हस्तक्षेप बंधक मस्तिष्क का परिचायक है। इस तरह की संभावनाएं शिक्षक, शोधार्थी, शैक्षणिक संस्थानों, यहां तक कि समूची शिक्षा-व्यवस्था को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गैर-आलोचनात्मक बनाती है।

Higher educationउच्च शिक्षा को लेकर देश में एक स्थायी नीति होनी चाहिए।

ज्योति सिडाना
शिक्षा और शिक्षक जनसंख्या के अधिकांश भाग को विचार सृजन से संबद्ध कर दें, तो नवजागरण और वांछनीय परिवर्तन तीव्र गति से प्राप्त किए जा सकते हैं। बर्टेंड रसेल का मत है कि किसी भी समाज में शिक्षा का मूल लक्ष्य समाज को विकास के अवसर उपलब्ध कराना तथा बाधाओं को दूर करना है। इसके अलावा संस्कृति का आंतरीकरण, व्यक्ति की क्षमताओं का सर्वाधिक विकास तथा योग्य नागरिकों को प्रशिक्षण देना भी शिक्षा का लक्ष्य है। रसेल स्वीकार करते हैं कि शिक्षा में संभावित स्वतंत्रता अत्यधिक आवश्यक है। किसी भी प्रकार का दबाव शिक्षा में वास्तविकता तथा बौद्धिक हितों को नष्ट कर देता और उन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

हाल में भारतीय प्रबंधन संस्थान अमदाबाद के एक छात्र के शोधपत्र को लेकर उठे विवाद ने उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता के मामले को फिर गरमा दिया है। एक राजनेता ने उस शोधपत्र पर सवाल उठाए कि उसमें कुछ पार्टियों को ‘जाति के आधार पर गठित’ और एक पार्टी को ‘हिंदू समर्थक ऊंची जाति की’ पार्टी बताया है। उनका आरोप है कि इसमें जानबूझ कर प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की गई है, जो कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत के विषय में फैलाए थे। जब केंद्र सरकार ने संस्थान से उस विवादास्पद शोधपत्र की प्रति मांगी तो उसके निदेशक ने नियमों का हवाला देकर उसे उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया।

उच्च शिक्षण केंद्रों में इस तरह का यह शायद पहला मामला है। जबकि स्कूली शिक्षा के स्तर पर पहले भी कई बार एनसीईआरटी या राज्य स्तरीय बोर्ड की पुस्तकों को लेकर सवाल उठते रहे हैं, जिनमें कहा गया कि ये पुस्तकें भारत के अतीत के गौरव को स्थापित नहीं करतीं, उनकी पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए। क्या पुस्तकों का स्वरूप, उनकी पाठ्य रचना राजनेताओं द्वारा तय की जानी चाहिए, यह सोचने का विषय है। विश्वविद्यालय और उच्च शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता अकादमिक स्वतंत्रता को स्थापित करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। स्वायत्ता का अभिप्राय शिक्षण प्रणाली तथा विषय संरचना में राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप से है। साथ ही ऐसे प्रयास को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार के विरोध में अनुचित कहा जा सकता है।

समाजशास्त्री मैक्स वेबर अपने अध्ययनों में तर्क देते हैं कि राजनीति को शिक्षण संस्थानों से दूर रखना चाहिए। यह एक तथ्य है कि शिक्षक का पेशा राजनीति से निर्देशित नहीं होता, बल्कि राजनीति को निर्देशित करता है। क्या यह कथन कि शिक्षक समाज को निर्मित करता है, आज के दौर में केवल एक भ्रम बन कर रह गया है? पाउलो फ्रेरे ने अपनी पुस्तक ‘पेडागोगी आॅफ ओप्रेस्ड’ में लिखा कि शिक्षा भी राजनीति की तरह है, जिस प्रकार राजनीति वर्गीय होती है, शिक्षा भी है। अगर यह तर्क सही है तो शिक्षण संस्थानों के जनहित केंद्रित चरित्र पर संदेह होना स्वाभाविक है। समाज विज्ञानों की एक ही भूमिका होती है कि वे विद्यार्थियों/ युवाओं में आलोचनात्मक चेतना (क्रिटिकल माइंडसेट) को विकसित करे। अगर ऐसा नहीं हो रहा है और शिक्षा अधीनस्थ तथा अनुकरण करने वाले नागरिक उत्पन्न कर रही है, तो जनहित केंद्रित विकास सवालों के घेरे में आ जाता है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शोध कार्य या पुस्तक लेखन पूरी तरह शोधार्थी और शिक्षकों की अकादमिक स्वायत्ता का सवाल है, उसमें किसी भी तरह का राजनीतिक या अन्य हस्तक्षेप बंधक मस्तिष्क का परिचायक है। इस तरह की संभावनाएं शिक्षक, शोधार्थी, शैक्षणिक संस्थानों, यहां तक कि समूची शिक्षा-व्यवस्था को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गैर-आलोचनात्मक बनाती है। अगर हमारे शैक्षणिक संस्थान उन लोकतांत्रिक समाजों के शैक्षणिक संस्थान हैं, जिन्होंने संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई है, अब अगर ये संस्थान स्वीकृत संवैधानिक मूल्यों का निषेध करते हैं, तो यह न केवल लोकतंत्र, बल्कि संविधान के समक्ष भी गंभीर चुनौती उत्पन्न करते हैं। युवा पीढ़ी जब शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश लेती है तो वह ईमानदार, ऊर्जावान, साहसी और आदर्शवादी चरित्र की होती है, उस समय उसे एक प्रतिबद्ध दृष्टिकोण और विकास प्रक्रिया के साथ जोड़ा जा सकता है, अगर शैक्षणिक संस्थान उसे उपयुक्त चिंतन और आलोचनात्मक चेतना का परिवेश उपलब्ध करा सके। इसमें दो राय नहीं कि इस तरह स्वतंत्र एवं वैचारिक चिंतन/ शोध का ह्रास आने वाले समय में मानवीय मूल्यों के प्रतिकूल जा सकता है और शैक्षणिक संस्थानों/ विश्वविद्यालयों को किसी विचारधारा या उद्योग जगत के विशिष्ट हितों की पूर्ति करने वाले संस्थान के रूप में परिवर्तित कर सकता है।

शोध कार्यों पर शासक वर्ग का नियंत्रण या निर्देशन उन्हें अपनी इच्छाओं और अपने हितों के अनुरूप निष्कर्ष प्राप्त करने में सहायक होगा। संभव है कि वित्तीय अनुदान भी उन्हीं शोध कार्यों या प्रोजेक्ट को मिले, जो शासक वर्ग के हितों का पोषण करते हों। अगर ऐसा होता है, तो उच्च शिक्षण संस्थान एक ऐसे बाजार का भाग बन जाएंगे, जहां विभिन्न समूहों के विशिष्ट हितों का क्रय-विक्रय किया जा सकता है। मानव मस्तिष्क कोई मशीन नहीं है, जिसे तर्क करने, सोचने या निर्णय करने की स्वतंत्रता न दी जाए।

जाक देरिदा ने तर्क दिया कि हजारों वर्षों से और यहां तक कि समकालीन विश्व में भी, लेखन शक्तिशाली अभिजनों का विशेषाधिकार रहा है। लेखन के पीछे प्रयास किया जाता है कि इसे मानव स्मृति का भाग बनाया जाए, ताकि दासता और अधीनस्थता की संस्कृति तथा संस्थाओं को वैधता प्रदान की जा सके। उनका यह भी तर्क है कि साक्षरता के विस्तार का एक कारण राज्य के नियंत्रण का विस्तार और उसकी वैधता को स्थापित करना भी रहा है। जबकि शिक्षा का उद्देश्य नियंत्रण करना नहीं, स्वतंत्रता देना है, नागरिक में आलोचनात्मक चेतना का विस्तार करना और उसे तार्किक मानव बनाना है, उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और उन्हें सामाजिक पूंजी में परिवर्तित करना है।

अगर वर्तमान शिक्षा प्रणाली ऐसा करने में असमर्थ है, तो वह बंधक मस्तिष्क को ही उत्पन्न करेगी। इसलिए आवश्यक है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली का इस दृष्टिकोण से विश्लेषण और व्यापक विचार-विमर्श भी किया जाए। अगर फूको का तर्क स्वीकार किया जाए कि ज्ञान शक्ति है, तो यहां यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि कौन-सा ज्ञान और ज्ञान किसके लिए? अनुकरणात्मक ज्ञान, जो नागरिक को बंधक मस्तिष्क में बदलता है, जो राज्य द्वारा थोपा गया होता है या फिर ऐसा ज्ञान जो नागरिक को दासता, शोषण, असमानता से मुक्त करता है, उसे सशक्त बनाता है, उसे समाज का सक्रिय और जिम्मेदार नागरिक बनाता है, ताकि वह एक बेहतर तथा समतामूलक समाज का निर्माण करने में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके।

ऐसा तभी संभव होगा जब शोध कार्य और लेखन प्रक्रिया को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, अकादमिक गलियारों में बौद्धिक और अकादमिक स्वायत्ता स्थापित हो, राजनीति को अकादमिक क्षेत्रों से बाहर रखा जाए। ज्ञान की खोज और उपयोगिता से संबंधित पक्ष आज भी उतने ही उपयोगी हैं, जितने पारंपरिक समाजों में थे। इसलिए सामाजिक समस्याओं के प्रति रुचि, समस्याओं का प्राथमिकता के क्रम में निर्धारण और समाधान के विकल्प खोजने में बुद्धिजीवियों की भूमिका आज भी उतनी ही, या कहें कि उससे अधिक, महत्त्वपूर्ण है। यह विचारणीय विषय है कि अनुसंधान कार्य को अनुदान देने वाली संस्थाएं किस प्रकार के निष्कर्ष चाहती हैं? ज्ञान मानव हित के लिए या ज्ञान बाजार के लिए जैसे सवाल आज ज्यादा महत्त्वपूर्ण हुए हैं।

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