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पी. चिदंबरम का कॉलम : सकल घरेलू उत्पाद या पहेली?

जब से केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने जीडीपी के हिसाब की नई पद्धति अपनाई है, आंकड़ों पर शक बढ़ता जा रहा है। विश्लेषकों ने ऐसे कई पहलुओं की ओर इशारा किया है जो संदेहास्पद हैं।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 4:46 AM
पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम। ( File Photo)

यह अच्छा ही हुआ कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने जीडीपी के इर्दगिर्द छाए कुहासे- और मिथ- को कुछ हद तक दूर कर दिया है। उन्होंने दो साधारण उदाहरण दिए हैं:

पहला उदाहरण: ‘निर्यात और आयात का अंतर’ जीडीपी के हिसाब में सहायक साबित होता है। वर्ष 2015-16 में जीडीपी में गिरावट दर्ज हुई, पर आयात में उससे भी अधिक गिरावट आई। लिहाजा, 2015-16 में निर्यात और आयात का अंतर 2014-15 के मुकाबले अधिक रहा। इसका अर्थ है ग्रोथ (आर्थिक वृद्धि)- जीडीपी के आंकड़ों में बढ़ोतरी (मौजूदा कीमतों पर)! दूसरा उदाहरण: ‘विक्रय और लागत का अंतर’ जीडीपी में योगदान करने वाला एक दूसरा कारक है। वर्ष 2015-16 में, उससे पहले के साल के मुकाबले, सारी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की बिक्री में 9.02 फीसद की गिरावट आई, लेकिन लागत में और तेज गिरावट दर्ज हुई (18.42 फीसद), वजह थी तेल तथा जिन्सों की कीमतों में आई भारी कमी। नतीजतन, 2014-15 की तुलना में 2015-16 में ‘विक्रय मूल्य और लागत का अंतर’ अधिक था। परिमाण है ग्रोथ!

लागत कम, विकास दर अधिक!
ये दोनों उदाहरण उत्पादन में बढ़ोतरी के नहीं हैं। निर्यात घटा, औद्योगिक उत्पादन कम रहा, कंपनियों के कारोबार में कमी आई, रोजगार के नए अवसर नहीं पैदा हुए या एकदम मामूली तौर पर ही सृजित हुए, और फिर भी निर्यात तथा मैन्युफैक्चरिंग, इन दोनों क्षेत्रों के आंकड़े सकारात्मक रहे, जिससे यह भ्रम निर्मित हुआ कि निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग में तेज बढ़ोतरी हुई। (मेरा खयाल है उत्पादकता जस की तस थी।) चूंकि इन दो क्षेत्रों का जीडीपी के कुल आंकड़ों में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जीडीपी के आंकड़ों में मजे का इजाफा दिखने लगा।

तेल और जिन्सों की कीमतों में भारी गिरावट एक नई परिघटना है और मेरा खयाल है कि ऐसी स्थिति में जीडीपी के विश्वसनीय आंकड़े देने में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन सक्षम नहीं है। जमीन पर आंकड़ों और हकीकत के बीच का फर्क एकदम साफ है। तर्क का कितना भी जामा पहनाएं, उससे लोगों को रोजाना चुभने वाली हकीकत नहीं बदली जा सकती- खुदरा मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई पांच फीसद है, न तो नया निवेश और न ही रोजगार के नए अवसर दिख रहे हैं। इसलिए औसत व्यक्ति भौंचक रह जाता है, जब उसे बताया जाता है कि जीडीपी वृद्धि दर 7.6 फीसद पर पहुंच गई।

जब हम उत्पादन के आंकड़ों पर नजर डालते हैं तो अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर उभरती है। आठ बुनियादी उद्योगों में कोयला, रिफाइनरी उत्पाद, फर्टिलाइजर, सीमेंट और बिजली क्षेत्र ने वर्ष 2015-16 में अधिक उत्पादन किया, जबकि तेल, प्राकृतिक गैस, और इस्पात में उससे पहले के साल के मुकाबले कम उत्पादन दर्ज हुआ। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में 2015-16 में आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर सिर्फ 2.67 फीसद रही। फिर भी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने तीन क्षेत्रों में (जो आठ बुनियादी उद्योगों को समाहित किए हुए हैं) ऊंची वृद्धि दर की सूचना दी; ये तीन क्षेत्र हैं- खनन (7.44 फीसद), मैन्युफैक्चरिंग (9.29 फीसद) और बिजली व गैस (6.57 फीसद)!

पद्धति की विसंगतियां
जब से केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने जीडीपी के हिसाब की नई पद्धति अपनाई है, आंकड़ों पर शक बढ़ता जा रहा है। विश्लेषकों ने ऐसे कई पहलुओं की ओर इशारा किया है जो संदेहास्पद हैं। एक प्रमुख विसंगति अपस्फीतिकारक (डिफ्लेटर) का चुनाव है। सकल मूल्य जोड़ (जीवीए) का हिसाब मौजूदा कीमतों पर लगाया जाता है, पर उनकी तुलना आधार वर्ष (2011-12) से करते समय कीमतों में आए अंतर को जरूर ध्यान में रखा जाना चाहिए। ‘वाणिज्य, होटल, परिवहन, संचार आदि’ और ‘वित्त, रीयल एस्टेट व पेशेवर सेवाओं’ में जीवीए मौजूदा कीमतों पर क्रमश: 6.6 फीसद और 7.4 फीसद था। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने नकारात्मक अपस्फीति का फार्मूला लागू करके क्रमश: 9.0 फीसद व 10.3 फीसद वृद्धि दर की सूचना दी। चूंकि 2015-16 के बारह महीनों की औसत खुदरा महंगाई 4.9 फीसद थी, यह मानना मुश्किल है कि उपर्युक्त दो क्षेत्रों में महंगाई नकारात्मक रही होगी! यह समझ से परे है कि इन दो क्षेत्रों के जीडीपी का हिसाब बिठाते वक्त क्यों नकारात्मक अपस्फीति का फार्मूला चुना गया।

दूसरी विसंगित एमसीए 21 डाटाबेस के इस्तेमाल को लेकर है। यह माना जा चुका है कि डाटाबेस के स्थिरीकरण की जरूरत है। जैसा कि अमूमन कहा जाता है और यह तथ्य हमें भी मालूम है कि छोटे व मझोले उद्योगों के लिए नए सांचे में समय-समय पर अपने फर्मों से संबंधित सूचनाएं मुहैया कराना मुश्किल है। इसके अलावा, एमसीए 21 डाटाबेस केवल केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के साथ साझा किया जाता है, ऐसे में आंकड़ों की प्रामाणिकता की जांच कोई अन्य नहीं कर सकता।
जीडीपी के आंकड़े आर्थिक गतिविधि के परिचायक होते हैं। सरकार और निजी निवेशकों के बहुत सारे फैसले इन आंकड़ों पर निर्भर करते हैं। कई विश्लेषक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जीडीपी के आंकड़ों को अधिक से अधिक जितना प्रामाणिक बनाया जा सकना संभव है उतने प्रामाणिक वे नहीं हैं, और इसीलिए वे भरोसा व उत्साह पैदा नहीं कर पा रहे हैं।
संशोधन की जरूरत
पहला संशोधन तो यह होना चाहिए कि उन उद्योगों तथा क्षेत्रों की पहचान की जाए जिनमें 2014-15 के मुकाबले 2015-16 में उत्पादन गिरा था और यह माना जाए इन उद्योगों/क्षेत्रों में विकास दर शून्य थी, मसलन निर्यात, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और इस्पात।

दूसरा संशोधन यह होगा कि जिन अपस्फीतिकारकों (डिफ्लेटर्स) का इस्तेमाल हुआ था उन पर फिर से गौर किया जाए। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई के आंकड़ों तथा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई के आंकड़ों के बीच बड़ी खाई दिखती है। नकारात्मक महंगाई या महंगाई न होने की स्थिति को ऐसे क्षेत्रों (खासकर सेवाओं) पर लागू करने का कोई मतलब नहीं है जहां तेल और जिन्सों की कीमतों की कोई भूमिका नहीं है, और जहां खुदरा कीमतें वास्तव में बढ़ गई हैं।
तीसरा संशोधन यह हो कि एमसीए 21 डाटाबेस का इस्तेमाल कर निकाले गए जीडीपी के आंकड़ों के साथ-साथ पुराने व परिपाटीबद्ध तरीके निकाले गए आंकड़ों के आधार पर भी जीडीपी की तस्वीर पेश की जाए, जब तक यह मान नहीं लिया जाता कि एमसीए 21 डाटाबेस ने स्थिरता हासिल कर ली है।

आखिरकार, कम-से-कम कुछ सालों तक पुरानी विधि के जीडीपी के आंकड़ों और नई विधि के जीडीपी के आंकड़ों को प्रकाशित करने में कोई हर्ज नहीं है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन को नीचे दी गई तालिका को पूरा करना चाहिए और पूरी कवायद की विश्वसनीयता बहाल करनी चाहिए।

वर्ष पुरानी विधि नई विधि
2012-13 4.47 5.62
2013-14 4.74 6.64
2014-15 ? 7.2
2015-16 ? 7.6
मेरा अनुमान है कि दोनों सवालिया निशानों की जगह आंकड़े लगभग पांच फीसद के होंगे।
अगर नई विधि कृत्रिम होशियारी है।

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