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कार्य संस्कृति: व्यस्तता का दुश्चक्र

अत्याधुनिक उपकरणों के जरिए अब काम का समय ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि पूरी जीवनशैली प्रभावित हो रही है। वाकई चिंतनीय है कि यह डिजिटल व्यस्तता और काम का दबाव देश की श्रमशक्ति के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा साबित हो रही है।

Author December 9, 2018 6:04 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर। (Source: Dreamstime)

आज के डिजिटल दौर में एक नए तरह की कार्य संस्कृति विस्तार पा रही है। आनलाइन कार्य संस्कृति ने देश में कामकाजी समूह के काम के घंटे इतने बढ़ा दिए हैं कि घर और दफ्तर का फर्क ही मिट गया है। अब केवल दफ्तर में नहीं, हरदम आनलाइन रहने के चलते लगभग पूरे समय व्यस्तता बनी रहती है। अधिकतर कर्मचारी दफ्तर से निकलने के बाद भी ईमेल, फोन और काम से जुड़े संदेशों का ही जवाब देते रहते हैं। चिंता का विषय है कि स्मार्ट गैजेट्स ने हर समय उपलब्ध रहने की जो स्थिति बनाई है, उसमें बड़ी संख्या में लोग अवसाद का शिकार हो रहे हैं। देश की श्रमशक्ति की सेहत बिगड़ रही है। रिश्तों में दूरियां आ रही हैं। साथ और संबल की वह डोर कमजोर हो रही है, जो अपनों के साथ समय बिताने से मजबूती पाती थी। कुल मिला कर आज के दौर का आनलाइन वर्क कल्चर इंसान को मशीन बना रहा है। चिंतनीय है कि कामकाज और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन न बन पाने का असर पारिवारिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सभी स्तरों पर देखने को मिल रहा है।

दरअसल, कामकाज और व्यक्तिगत जिंदगी के बीच संतुलन बेहद जरूरी है। वरना अंसतोष और अपराधबोध जैसे मनोभाव खिन्न स्वभाव बना देते हैं। हरदम अपने काम में उलझे रहना, दफ्तर की गतिविधियों से दिन-रात अपडेट रहना या साथी कर्मचारियों को अपडेट देते-लेते रहना, कारपोरेट जगत के कर्मचारियों में कई व्यवहारगत समस्याएं ला रहा है। आनलाइन रहने के चलते काम का अतिरिक्त बोझ उन्हें तनाव की तरफ ढकेल रहा है। नींद की कमी, आक्रामक व्यवहार और अपनेपन की कमी अब आम बात हो गई है। एसोचैम हैल्थकेयर समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक कॉरपोरेट जगत में काम की चिंता और कर्मचारियों को दिए गए लक्ष्य इतने ऊंचे रहते हैं कि करीब छप्पन फीसद कर्मचारी छह घंटे से भी कम नींद ले पाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में श्रमशक्ति का करीब छियालीस फीसद हिस्सा तनाव से जूझ रहा है। इस तनाव का कारण कामकाज का दबाव तो है ही, हरदम कामकाज को साथ लिए चलना भी है। मन-मस्तिष्क पर यह दबाव घर-दफ्तर में ही यात्रा करते हुए या किसी सामाजिक समारोह में शिरकत करते हुए भी देखा जा सकता है। नतीजतन, शरीर ही नहीं, दिमाग से जुड़ी व्याधियां भी कामकाजी समूह को घेरने लगी हैं। एसोचैम हेल्थकेयर समिति की रिपोर्ट कहती है कि काम के तनाव की वजह से कर्मचारियों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और अवसाद जैसी परेशानियां बढ़ रही हैं। इतना ही नहीं, इस आनलाइन कार्यशैली के कारण लोग अपने सामाजिक-पारिवारिक परिवेश से भी कट रहे हैं। आपसी संवाद की कमी के चलते अकेलेपन और आक्रामकता का व्यवहार भी अब देश की श्रमशक्ति के बड़े वर्ग को घेर रहा है। इस अध्ययन के अनुसार सोलह फीसद लोग मोटापे से और ग्यारह फीसद लोग अवसादग्रस्त हैं। निस्संदेह स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम हर पहलू पर देखने को मिल रहे हैं।

आमतौर पर यह माना जाता है कि स्मार्ट गैजेट्स के जरिए हर वक्त कामकाज के मोर्चे पर जुटे कर्मचारियों की उत्पादकता ज्यादा होती है। लेकिन ऐसी व्यस्तता कामकाजी लोगों की उत्पादकता घटा रही है। दफ्तर के तनाव और काम के बोझ का असर जीवनशैली पर पड़ रहा है, जो अंतत: उत्पादकता को कम करती है। मनोवैज्ञानिक तनाव के कारण कार्यस्थल पर प्रदर्शन में गिरावट आती है। हमारे यहां महानगरों में बसे कामकाजी समूह के लिए तो यह समस्या वाकई चिंतनीय है। तन की थकावट और मन की भावनात्मक टूटन के रूप में कामकाज के बढ़ते दबाव का नतीजा साफ देखा जा सकता है। काम के तय डेडलाइंस और ऊंचे लक्ष्य से जूझ रहे कर्मचारियों का व्यक्तिगत जीवन इस हद तक प्रभावित हो रहा है कि मानसिक और मनोवैज्ञानिक उलझनें अपनी जड़ें जमा रही हैं। इसके चलते नागरिकों का स्वास्थ्य तो बिगड़ ही रहा है, समग्र रूप से ये सभी बातें देश के कामकाजी समूह की जीवनशैली में चिंतनीय बदलाव भी ला रही हैं। कई शोध बताते हैं कि शराब और सिगरेट की बढ़ती लत के पीछे भी कामकाज का बढ़ता दबाव एक अहम वजह है। वाणिज्य और उद्योग संगठन के ही एक अध्ययन में यह दावा किया गया है कि कारपोरेट जगत के उनतीस प्रतिशत कर्मचारी धूम्रपान, शराब पीने और जंक फूड खाने के चलते आगे चल कर गंभीर बीमारियों का शिकार होते हैं। काम का दबाव अधिक रहने से कर्मचारियों की दिनचर्या भी बिगड़ जाती है, जिसके चलते खानपान की आदतें, सोने और व्यायाम का चक्र भी गड़बड़ा रहा है। कॉरपोरेट क्षेत्र में कार्यरत ऐसे कर्मचारियों में बड़ी सख्या युवाओं की है।

हाल के वर्षों में भारत की श्रमशक्ति में महिलाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। महिलाओं के कामकाजी समूह पर दफ्तर के साथ घर की जिम्मेदारियों का भी दबाव रहता है। यही वजह है कि तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं उन्हें भी घेर रही हैं। एसोचैम सर्वे के अनुसार अठहत्तर फीसद कामकाजी महिलाएं जीवनशैली से जुड़े किसी न किसी विकार की शिकार हैं। इतना ही नहीं, कार्यस्थल पर सम्मानजनक व्यवहार और सुरक्षा जैसी चिंताएं भी उनके कामकाज से जुड़े दबाव और चिंताओं को बढ़ाती हैं। आनलाइन वर्क कल्चर ने कामकाजी महिलाओं की व्यस्तता को और बढ़ा दिया है। भारत में कामकाजी समूह पर लक्ष्यों को हासिल करने का तनाव और खुद को साबित करने का दबाव इतना है कि वे छुट्टियां भी कम ही लेते हैं। एक्सपीडिया वैकेशन डेप्रीवेशन के उन्नीस देशों में किए अध्ययन के मुताबिक भारतीय नागरिक अपने काम से अवकाश लेने में बहुत पीछे हैं। एक्सपीडिया की 2018 की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में पचहत्तर प्रतिशत लोग अवकाश की कमी का सामना कर रहे हैं।

इस अध्ययन में पैंतीस फीसद भारतीयों ने कार्यस्थल पर काम का दबाव और सहकर्मियों की कमी को कम छुट्टियां लेने की वजह बताया है। साथ ही पच्चीस फीसद ने माना कि छुट्टियां न लेने की वजह है कि अपनी गैर-मौजूदगी के चलते वे दफ्तर के महत्त्वपूर्ण निर्णयों में शामिल नहीं हो पाएंगे। बीते साल आए साइबर सिक्योरिटी फर्म मकैफी के एक सर्वे के अनुसार अवकाश के दिनों में भी भारतीय कम से कम एक घंटा अपने ईमेल देखने, लिखित संदेश पढ़ने और भेजने और सोशल मीडिया पर बिताते हैं। इसमें एक बड़ा वर्ग कामकाज से जुड़े अपडेट्स से आनलाइन जुड़ा रहता है। देखने में लगता है ज्यादातर कॉरपोरेट कार्यालयों में काम का समय निर्धारित है। देश की श्रमशक्ति के कामकाज के घंटे नियत हैं। पर अत्याधुनिक उपकरणों के जरिए अब काम का समय ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि पूरी जीवनशैली प्रभावित हो रही है। वाकई चिंतनीय है कि यह डिजिटल व्यस्तता और काम का दबाव देश की श्रमशक्ति के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा साबित हो रही है।

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