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परिप्रेक्ष्य: निजीकरण के रास्ते

दलितों और पिछड़ों को आरक्षण की वजह से सर्वाधिक नौकरियां लगीं। इनके उत्पादन की वजह से निजी क्षेत्र कीमत और गुणवत्ता पर एकाधिकार नहीं बना पाया। लेकिन आज निजीकरण के रास्ते इस सामाजिक सवाल को हाशिये पर डाला जा रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

उदित राज

कभी सावर्जनिक उपक्रमों की संख्या तीन सौ से अधिक हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ यह संख्या घटती जा रही है। निजी क्षेत्र उस समय आवश्यकता पूरी करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए सरकारों ने विभिन्न तरह के सावर्जनिक उपक्रम स्थापित किए। मसलन भारत संचार नगर निगम लिमिटेड, ओएनजीसी, तेल की कंपनियां, रक्षा उत्पाद उपक्रम, स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया, कोयले की कंपनियां आदि। यूरोप में औद्योगीकरण की प्रक्रिया सोलहवीं सदी से शुरू हुई और उन्नीसवीं सदी तक आते-आते चरम सीमा तक पहुंची। इस अंतराल में भारत में नहीं के बराबर औद्योगीकरण हुआ। यूरोप और अमेरिका में निजी क्षेत्र के तहत न केवल तमाम क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ा, बल्कि तकनीक और खोज भी सामने आए। 1930 के दशक में टाटा द्वारा निजी क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाया गया, जो इतने बड़े देश में आपूर्ति की दृष्टि से नहीं के बराबर था। अंग्रेजों ने भी कुछ उद्योग स्थापित किए, लेकिन मूलरूप से व्यापार और आयात-निर्यात पर उनका जोर रहा। आजादी के बाद सरकारी उपक्रमों और विभागों की आपूर्ति एवं सेवा लगभग अस्सी फीसद हुआ करती थी और उसकी तुलना में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग दस से पंद्रह फीसद तक ही रही।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया समाजवादी और पूंजीवादी खेमे में बंटी और हमारा झुकाव समाजवादी व्यवस्था के प्रति रहा। भारत कृषि प्रधान देश रहा और इससे अपने आप बात समझ में आती है कि उद्योग-धंधों के मामलों में हम सदियों से पीछे चलते रहे हैं। जाति-व्यवस्था ने उत्पादन के काम में लगे लोगों को न तो सम्मान दिया और न ही श्रम के बराबर मेहनताना। जो उत्पादन से दूर रहे और इस तरह के काम करने में अपना अपमान समझते थे, शिक्षा एवं सत्ता उनके पास रही। यानी व्यावहारिक ज्ञान महत्त्वहीन और काल्पनिक रहा और केवल बौद्धिक को सर्वोपरि रखा गया। इसकी वजह से विज्ञान, तकनीक का विकास नहीं हो पाया। उदाहरण के तौर पर लोहे के क्षेत्र में काम करने वाले को शूद्र की श्रेणी में रखा गया और इस तरह से उसके लिए यह कार्य जीविकोपार्जन तक ही सीमित रहा। यह नहीं हो सका कि वह इस क्षेत्र में अनुसंधान या कोई विकास करता और धीरे-धीरे इंजीनियरिंग का एक विषय बन जाता, जिसे हम मेटललॉजी के नाम से जानते हैं। इसके विपरीत यूरोप में ऐसे हाथों को सम्मान से देखा गया तो उनकी रुचि न केवल जीविकोपार्जन की रही, बल्कि उस क्षेत्र में लगातार कुछ नया करने का जुनून बना रहा। यही कारण है कि हमारे यहां मशीनीकरण और औद्योगीकरण नहीं हो सका। परिस्थिति भले ही क्यों न सरकार के अधीन उद्योग-धंधे लगाने की रही हो, लेकिन दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि निजी क्षेत्र के पास न तो पूंजी थी, न मशीनें और न ही इनको संचालित करने का अनुभव।

उद्योग-धंधे और व्यवसाय की बात करते हुए यह ध्यान में रखना चाहिए कि सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थिति कैसी है। आज भी हमारे निजी क्षेत्र शोध, तकनीक और विकास आदि में नहीं के बराबर दिखते हैं और लगभग पनचानबे फीसद मशीनें और उपकरण आदि आयातित होते हैं। कुछ मामलों में ज्यों का त्यों इस्तेमाल कर लिया जाता है और उनमें परिस्थितिवश थोड़ा बहुत परिवर्तन करके उपयोग किया जाता है। जिन देशों में औद्योगीकरण, मशीनीकरण, विज्ञान एवं तकनीक का विकास हुआ, वहां पर धंधा करने के लिए निजी क्षेत्र ने खुद तकनीक और ज्ञान विकसित करके पैसा कमाया। जैसे ‘फेसबुक’ ने अगर उद्योग खड़ा किया तो एक नई तकनीक की खोज की और बिल गेट्स ने ‘विंडोज सॉफ्टवेयर’ और स्टीव जॉब ने ‘एप्पल’ को खोजा या तैयार किया। अन्य देशों में निजी क्षेत्र मुनाफा ही नहीं कमाते, बल्कि शोध और विकास पर भारी धन व्यय करते हैं। हमारे यहां मुक्त अर्थव्यवस्था की वकालत ज्यादा ही हो रही है। इसका सबसे ज्यादा शिकार सार्वजनिक उपक्रम हैं। विश्व बैंक, आइएमएफ आदि पर यूरोप और अमेरिका हमेशा दबाव बनाए रहते हैं कि आर्थिक सुधार ज्यादा से ज्यादा और जल्दी कर दिया जाए यानी सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश कराया जाए या उन्हें बेच दिया जाए। अब तो मुनाफे वाले उपक्रम बिकने लगे हैं। गाजियाबाद के सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के कमर्चारी आंदोलनरत हैं कि मुनाफे वाली कंपनी को सरकार क्यों बेच रही है। ड्रीजिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया का भी यही हश्र हो रहा है। इसके अलावा, एअर इंडिया सहित कई मुनाफे में चल रही कंपनियों को पूंजीपतियों को देने की तैयारी है। सार्वजनिक उपक्रम इतने निकम्मे नहीं है, जितना इनको बनाया गया है। दरअसल, शुरू से ही नौकरशाहों को इनके ऊपर बैठाया गया और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि इनके दोहन के लिए तमाम अधिकारी सिफारिश करके जाते हैं। नेताओं ने भी इनका शोषण करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

जबकि जितना कल्याणकारी काम सार्वजनिक उपक्रमों का रहा, शायद दूसरों का नहीं। दूरदराज के क्षेत्रों में इन्हें लगाया गया जहां निजी क्षेत्र मुनाफा न होने की स्थिति में जाने से कतराते रहे। जिन पिछड़े इलाकों में सावर्जानिक उद्योग लगे, वहां के गरीबों, आदिवासियों और दलितों के जीवन में बड़ा परिवर्तन हुआ। दलितों और पिछड़ों को आरक्षण की वजह से सर्वाधिक नौकरियां लगीं। इनके उत्पादन की वजह से निजी क्षेत्र कीमत और गुणवत्ता पर एकाधिकार नहीं बना पाया। लेकिन आज निजीकरण के रास्ते इस सामाजिक सवाल को हाशिये पर डाला जा रहा है। सवाल है कि जहां मुनाफा न हो, वहां निजी क्षेत्र क्यों नहीं जाते? लेह और लद्दाख में बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) ही क्यों सेवाएं दे और निजी क्षेत्र क्यों न जाए? दरअसल, वहां सेवा देने के लिए लागत अधिक होगी और मुनाफा कम। घाटा भी हो सकता है। जबकि सरकारी कंपनियां लाभ को लक्ष्य बना कर कहीं नहीं जाती हैं, बल्कि सुविधा और आपूर्ति उनके लिए प्राथमिक होता है। यही हाल विमानन क्षेत्र का है। एअर इंडिया सभी जगह सेवा देती रही, जबकि निजी एयरलाइंस वहां जाने की ताक में रहते हैं, जहां से मुनाफा कमाया जाए। एअर इंडिया की हालत इतनी खराब नहीं होती। नेताओं और अधिकारियों ने मिल कर उसे बर्बाद किया। जिन सेक्टरों में पैसेंजर ज्यादा थे, वहां निजी कंपनियों को दे दिया गया और घाटे वाला मार्ग एयर इंडिया को दिया गया। ऐसा ही व्यवहार बाकी सरकारी उपक्रमों के साथ किया गया। सरकारी होटलों को उससे भी कम दाम में बेचा गया, जितना बैलेंस शीट में नकदी रहा हो।

हमारे देश की सामाजिक सोच ऐसी नहीं है कि निजी क्षेत्र की प्राथमिकता रिसर्च और विकास, गुणवत्ता और कर आदि दूसरे देश के पूंजीपतियों जैसा दें। शुरुआती दौर में मोबाइल कॉल बत्तीस रुपए और सोलह रुपए थे। तब भारत संचार निगम लिमिटेड मुनाफा कमाने के बजाय सार्वजनिक सेवा की नीयत से मोबाइल क्षेत्र में आया, तब निजी क्षेत्र वालों का एकाधिकार खत्म हुआ और दाम गिरे। निजी क्षेत्र नहीं चाहता था कि सरकारी कंपनी को इसका लाइसेंस मिले। मिला भी तो सात साल बाद। कायदे से मुक्त अर्थव्यवस्था की अंधाधुंध नकल न की जाए, बल्कि अपनी परिस्थिति के मुताबिक हमारी अर्थव्यवस्था का ताना-बाना होना चाहिए। सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने के बजाय उन्हें सौंपा जाए जो उत्पादन को बढ़ाया जाए और घाटे से बचाए। इनकी उपस्थिति से निजी क्षेत्र मनमानी नहीं कर सकेगा और रोजगार भी सुनिश्चित कर सकेगा। सावर्जनिक उपक्रमों के मुनाफे से ‘स्वच्छ भारत’ जैसे तमाम कार्यक्रम सरकारों ने चलाए हैं। सैकड़ों एनजीओ इनसे सहायता लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल आदि के क्षेत्रों में काम कर रही हैं। जहां सरकारी उपक्रम लगे हैं, आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल आदि के क्षेत्र में काम होने लगता है। किसी भी सरकार की प्राथमिकता होती है रोजगार देना। सरकारी कंपनियों ने जितना रोजगार दिया है उसकी तुलना में निजी क्षेत्र का योगदान कुछ भी नहीं रहा। क्या यह दूरदर्शिता है कि घर में पड़ी हुई कीमती चीज को बेच दिया जाए। इनके बिकने के बाद और क्या बेचा जाएगा?
(लेखक लोकसभा सांसद हैं।)

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