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समाज: बदलाव की बुनियाद

आजादी के बाद लोक-परंपराओं, प्रचलित तकनीकों और उन पर आश्रित लोकाचार को सराकर ने सिरे से खारिज कर दिया। यह सच है कि पानी और खेती से जुड़ी व्यवस्था समय के साथ बढ़ती आबादी के साथ सामंजस्य नहीं बैठा सकी।

Author January 13, 2019 4:01 AM
सरकार ने यही माना कि यूरोप और अन्य महादेशों में खेती-किसानी की विधियां और तकनीक कहीं ज्यादा प्रासंगिक और अचूक हैं।

अमरेंद्र किशोर

देश के बेहद पिछड़े, गरीब और बदनसीब कहे जाने वाले इलाकों की सच्चाइयां भी अजीब हैं। कहने को कई रोजगार योजनाएं चला कर समाज के आखिरी छोर तक लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन समाज के तलछट का सच न सिर्फ विरोधाभासी, बल्कि वहां की वास्तविकताएं लोकमानस के लिए चिंता की पोटली हैं। आजादी से पहले तक भारत के सुदूरवर्ती इलाके श्रम की प्रतिष्ठा के अद्भुत केंद्र रहे हैं। वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक अवधारणा समरसता और सामुदायिकता पर आश्रित रही है। इस वजह से भारत के गांव अपने आप में प्रौद्योगिकी, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और अंतर्जातीय संबंधों के ऐसे मजबूत आधार थे, जहां स्त्री-पुरुष संबंध, धर्म, परिवार और कृषि की शानदार परंपराओं को पोसने वाला एक बेहद मजबूत समाज था। जब उन इलाकों में विकास आया तो निर्माण और सुविधाओं के चंद फलसफे जरूर लिखे गए, पर कुवृत्तियां वहां आज भी दिखती हैं।

देश के पूर्वी राज्य झारखंड और पश्चिमी प्रदेश महाराष्ट्र के सामाजिक हालात पर नजर डालें तो वहां आजादी अब भी कोसों दूर दिखती है। अगर ओडीशा की सामाजिक और सांस्कृतिक अवधारणा बेतरह शिथिल, अदक्ष और भ्रष्ट प्रशासन के चंगुल में दम तोड़ चुकी है, तो महाराष्ट्र में दलितों के पक्ष में लड़ी गई ऐतिहासिक लड़ाइयों के बावजूद यह कसक रह-रह कर सालती है कि वहां जो होना था, वह अभी तक हो नहीं पाया। बल्कि महिलाओं की अधिकारिता के सवाल पर कई दृष्टांत चिंता का सबब बन जाते हैं। यह सच है कि कभी किसी जमाने में ओडीशा के कालाहांडी-बोलांगीर-कोरापुट और महाराष्ट्र के अधिकतर हिस्सों में लोग खेती-बाड़ी, वनोपज जुटाने और कुदरती संसाधनों से सुसंगत रिश्ते बना कर सदियों तक सामुदायिक जीवन, संपत्ति पर सामूहिक हक और सर्वानुमतिमूलक जनतंत्र के जीवंत बोध को बचाए रखते थे। लेकिन देखते ही देखते उन तमाम जगहों का दृश्य-परिदृश्य बदलता चला गया। सुखद कुदरती सुंदरता है, पर वहां की जिंदगी खूबसूरत नहीं है। ओडीशा, महाराष्ट्र के अलावा हर राज्य में सरकार के बनवाए लोगों के पक्के मकान हैं, घर में भोजन के अधिकार वाला अनाज है, जनधन सुविधा के तहत बैंक में खाते हैं और चावल वाला खैराती कार्ड भी है। खेती-किसानी को लेकर योजनाओं के अंबार हैं- योजनाएं इतनी हैं कि खुद जिला स्तर के अधिकारी उन्हें गिन कर बता नहीं पाते। तो, आम जनता भी उन्हें जान नहीं पाती।

कालाहांडी, पलामू, बुंदेलखंड से लेकर मुर्शिदाबाद तक में सदियों से चली आ रही वंचना आज भी है। वहां कालातीत शोषण और उससे उपजा अबाध पलायन है। वहां के गांवों में पंचायत है। उन पंचायतों में विभिन्न राजनीतिक दलों के एजेंट हैं। जनवादी विकास के लोकलुभावन पोस्टर हैं, लेकिन उन्हीं गांवों में राशनकार्ड गिरवी रख कर कर्ज जुटाते किसान हैं। सूरत और अमदाबाद जाकर श्रम बेचते और वहां से जानलेवा बीमारी लेकर लौटते सैकड़ों मजदूर हैं। वहीं नवजात शिशु बेचती माएं हैं और बिन ब्याही मां बनती बालाएं हैं। विकास और लोकतंत्र को चिढ़ाता यवतमाल है, जहां देश भर में सबसे ज्यादा बिन ब्याही माताएं हैं, जिनकी राहत के लिए उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है। इसी तरह हरियाणा का मेवात भी है, जहां कई गांवों के हर तीसरे घर में बाहर से खरीद कर लाई गई बहुएं हैं- यानी परोक्ष ही सही, पर देश के कई राज्यों में असंगठित बहू बाजार भी हैं। इसके आगे देश में बुंदेलखंड भी है, जहां पानी के नाम पर तमाम संघर्ष हैं, विरोध है और उस विरोध के प्रतिरोध में खूरेंजी भी है। इस पानी के कारण पलामू इस कारण से नामचीन हुआ कि सरकारी योजनाओं के तहत वहां इतने कुएं खोदे गए कि हर कदम पर एक कुआं है और संताल परगना में हर दस कदम पर तालाब और पोखर की मौजूदगी कागजों पर दिखती है।
जबकि चाहे झारखंड हो या महाराष्ट्र- अमूमन हर राज्य में पानी के आधार पर सामाजिक परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। जैसे झारखंड में जिस गांव के नाम का अंत ‘दा’ से होता है वहां पानी की कभी कमी नहीं होती थी। ऐसे इलाके में तालाब,पोखर, आहर और कुओं के चलते पीने के अलावा खेतों में फसल उगाने के लिए भरपूर पानी की उपलब्धता होती थी। ऐसे गांवों में आंखें मूंद कर बेटी ब्याहने की परंपरा का जिक्र आज भी लोग करते हैं।

पानी और शादी का नाता बहुत पुराना है। कालाहांडी आज भी सरकार द्वारा तय धान के लक्षित उत्पाद से कहीं ज्यादा उपज का रिकॉर्ड हर साल दर्ज करवाता है, लेकिन पड़ोसी जिलों के लोग वहां के कई इलाकों में अपनी बेटी ब्याहना नहीं चाहते। क्योंकि भोजन की कमी की वजह से आज भी कहीं-कहीं मां-बाप एक क्विंटल चने की कीमत से भी कम रकम पर अपने नौनिहाल बेच देते या लिए गए कर्ज के एवज में महाजन के पास अपना बच्चा गिरवी रखते हैं। पानी की कमी की शुरुआत कालाहांडी में 1965 से शुरू हुई। कहते हैं अभाव में स्वभाव बदलता है। इसलिए लगातार अकाल ने वहां के लोगों को मानसिकता से भिखारी और लालची बना दिया। लिहाजा, समझौतों की अटूट शृखंला में बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम से लेकर पलायन का धब्बा कालाहांडी को नसीब हुआ। लड़कियों की कमी से बदनसीब मेवात से बहुओं की बढ़ती मांग से कालाहांडी की लड़कियों से हरियाणा के आंगनों में किलकारियां गूंजने लगीं। मगर, बहुओं की खरीद-फरोख्त के बाजार के बिचवानों की आवाजाही से कालाहांडी में सामाजिक असंतुलन के हालत पैदा हो गए। दुनिया भर में आधुनिकता की बढ़ती संभावनाओं और विकास से बदलते समाज के चेहरे के साथ पानी को लेकर औरतों की तकलीफें बढ़ी हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) ने घरों से पनघट की बढ़ती दूरियों पर जो आंकड़े पेश किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। क्यों जिंदगी की मूलभूत सुविधाएं गांवों तक पहुंचाने में सरकारें बहुत सफल नहीं रही हैं। जल और जन के परस्पर रिश्तों को लेकर ‘यूएन वर्ल्ड वाटर असेसमेंट’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पानी की उपलब्धता को लेकर भारत में आंकड़े जुटाने की संवेदनशीलता अभी देखने को नहीं मिल रही है। देश में पानी-सेहत-शिक्षा की स्थिति झारखंड से लेकर महाराष्ट्र की तस्वीर एक जैसी है।

आजादी के बाद लोक-परंपराओं, प्रचलित तकनीकों और उन पर आश्रित लोकाचार को सराकर ने सिरे से खारिज कर दिया। यह सच है कि पानी और खेती से जुड़ी व्यवस्था समय के साथ बढ़ती आबादी के साथ सामंजस्य नहीं बैठा सकी। सरकार ने यही माना कि यूरोप और अन्य महादेशों में खेती-किसानी की विधियां और तकनीक कहीं ज्यादा प्रासंगिक और अचूक हैं। लिहाजा, कृषि क्रांति और सिंचाई की आयातित ‘उन्नत’ तकनीकों ने तात्कालिक परिणाम तो बढ़िया दिया, लेकिन भारत की माटी, आबोहवा इन तकनीकों के अनुकूल नहीं थी। देश का लोकमानस परस्परता की भावना से इतर उपभोक्ता बन गया। सरकारों ने गरीबी, पिछड़ेपन और बदहाली को लेकर स्थानीय समाज की सोच को समझने और आंकने के बदले विशेष पैकेज परोसना शुरू किया। इस पैकेज के परिणाम सामने हैं। लोग अपनी जमीन पर काम करना भूल गए, हर विपत्ति और आफत में सरकार की और देखने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई।

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