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सात साल बाद गरीबी, बीमारी और मौत

एक मंत्री विदेशी टीकों के आयात को मंजूरी दिए जाने के सुझाव का उपहास उड़ाता है (वह विदेशी दवा कंपनियों को लिए लामबंदी कर रहा है) और जब सरकार ठीक यही फैसला कर लेती है तो वह अपनी फूहड़ टिप्पणियों के लिए माफी भी नहीं मांगता।

oxygen crisis, lucknow, delhiउत्तरप्रदेश में स्थिति दिन प्रतिदिन भयावह होती जा रही है। इन दिनों लखनऊ में ऑक्सीजन रिफिलिंग सेंटर के बाहर कोरोना संक्रमितों के परिजनों की लंबी कतारें लगी हुई है। (फोटो – पीटीआई)

दो साल पहले देश ने भाजपा को भारी बहुमत से सत्ता में पहुंचाया था। अकेले भाजपा को तीन सौ तीन सीटें मिली थीं और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को तीन सौ तिरपन। जब हम तीसरे साल में प्रवेश कर रहे हैं तो यह पूछना उचित ही होगा कि हमें किस तरह का शासन मिला और उसके नतीजे क्या रहे। भारी-भरकम आंकड़ों वाले छब्बीस करोड़ परिवार रोजाना सबसे पहले अपनी थालियों में खाना चाहते हैं। इसके बाद सुरक्षा, रोजगार, मजदूरी/आय, घर, स्वास्थ्य देखभाल, बच्चों के लिए शिक्षा और दूसरी चीजें आती हैं।

कुपोषण से बदतर स्थिति
भारत अनाज (प्रमुख भोजन), दलहन, मोटा अनाज, दूध, सब्जियों और फलों के अलावा मांस और मछली का बड़ा उत्पादक देश है। लक्ष्य यह है कि हरेक को उसकी थाली में पर्याप्त खाना मिले और अगर हम तरक्की कर रहे हैं तो हर साल चीजें बेहतर होती जानी चाहिए। अगर बच्चों को पर्याप्त खाना नहीं मिलता है तो वे खून की कमी, बौनेपन और टीबी के शिकार हो जाएंगे। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 के आंकड़े अंतिम हैं। इनके अनुसार 58.6 फीसद बच्चे एनीमिया (खून की कमी), 38.4 फीसद बौनेपन और इक्कीस फीसद टीबी के शिकार थे। दस पहले किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-3 के मुकाबले इसमें काफी सुधार देखा गया था। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 वर्ष 2019 में शुरू किया गया था, लेकिन महामारी के कारण पूरा नहीं हो पाया। हालांकि बाईस राज्यों के जो आंकड़े जारी किए गए, वे बताते हैं कि बाईस में अठारह राज्यों में खून की कमी के, तेरह राज्यों में बौनेपन और बारह राज्यों में टीबी के मामले बढ़े थे।

निष्कर्ष पीड़ादायक है। अनाज और अन्य खाद्यान्नों के भंडारों के बावजूद हमारे बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा, गरीबों को न्यूनतम मात्रा ही मिल पा रही है। बाकी सब चीजें तार्किक रूप से चलती हैं। मैं आपको आज के कुछ पैमानों का संकेत देता हूं। एनडीए-2 की शुरूआत से ही जीडीपी, जीडीपी दर और प्रति व्यक्ति आय में गिरावट आई है, श्रम भागीदारी दर घटी है, जबकि बेरोजगारी की दर बढ़ी है। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई और खाद्य महंगाई बढ़ती जा रही है, और लैंगिक असमानता की खाई भी चौड़ी हो गई है।

अक्षमता ने बनाया बदतर
महामारी ने हालात बदतर बना दिए हैं। दोहराव के जोखिम पर, मैं बताता हूं कि 30 जनवरी 2020 को कोविड का पहला मामला सामने आने के पहले ही अर्थव्यवस्था में गिरावट शुरू हो गई थी। आर्थिक गिरावट और मंदी मानव-निर्मित थे। महामारी प्राकृतिक आपदा थी जिसे इंसान ने बदतर बना दिया। दोनों मामलों में सत्ता में मौजूद पुरुष और महिलाएं जिम्मेदार थे, वे लोग नहीं जिन्होंने उन्हें सत्ता के लिए वोट दिया था।

हम 2021-22 से शुरू करें तो यह साफ है कि दूसरे भयानक साल में भी आर्थिकी पर भारी मार पड़ेगी। नौकरियां जाएंगी, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार ज्यादा जाएंगे, और नियमित कर्मचारियों के मुकाबले अनियमित कर्मचारी ज्यादा मार झेलेंगे, वेतन और आमदनी पर असर पड़ेगा, और ज्यादा लोग गरीबी व कर्ज में डूब जाएंगे। हरेक उस स्थिति के मुकाबले में और ज्यादा बदतर हालत में चला जाएगा जिसमें वह 2019-20 या 2020-21 में था।

भगवान न करें, तो भी पूर्णबंदी अपरिहार्य दिखती है। मुझे ताज्जुब है कि जैसा कि प्रधानमंत्री ने 17 अप्रैल को दावा किया कि हम 2020 में कोविड के खिलाफ जंग जीत गए हैं, तो इसके बाद पूर्णबंदी अपरिहार्य क्यों बना दी गई। हालांकि इस बार ठीकरा राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सिर पर रख दिया गया, जो धीरे-धीरे करके एक-एक गतिविधि को तब तक बंद करते रहेंगे जब तक कि एक दिन सब कुछ बंद नहीं हो जाएगा। उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है। इस बीच लाखों लोग संक्रमित हो जाएंगे और हजारों लोग टीके, ऑक्सीजन सिलेंडर, जीवन रक्षक प्रणाली, आइसीयू बिस्तर और वायरल रोधी दवाओं के अभाव में मर जाएंगे।

झांसा, धमकाना और पीछे पड़ जाना
सरकार अब तक झांसेबाजी, धमकाने, शेखी बघारने और भाड़े के टट्टुओं के सहारे ही आर्थिक संकट और महामारी से निपटती रही है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि
-एक प्रधानमंत्री हर दूसरे दिन चुनाव रैलियों को संबोधित करने निकल जाता है और जरूरी बात के लिए भी मुख्यमंत्रियों को फोन पर उपलब्ध नहीं रहता।
-एक स्वास्थ्य मंत्री घृणा पैदा हो जाने तक बार-बार यह दोहराता रहता है कि टीके या ऑक्सीजन सिलेंडरों या रेमडेसिविर या अस्पतालों में बिस्तरों की कोई कमी नहीं है और फिर गायब हो जाता है।
-एक मंत्री विदेशी टीकों के आयात को मंजूरी दिए जाने के सुझाव का उपहास उड़ाता है (वह विदेशी दवा कंपनियों को लिए लामबंदी कर रहा है) और जब सरकार ठीक यही फैसला कर लेती है तो वह अपनी फूहड़ टिप्पणियों के लिए माफी भी नहीं मांगता।
-कोविशील्ड टीके का उत्पादन बढ़ाने के लिए तीन हजार करोड़ रुपए के पूंजी निवेश की सीरम इंस्टीट्यूट की मांग पर वित्त मंत्री चुप्पी साधे रहती हैं।

-एक सरकार आवश्यक अनुमति के लिए उन प्रावधानों को लागू नहीं कर रही है जो देश में कोविशील्ड और कोवैक्सीन के निर्माण के लिए कई तरह की सुविधा देने वाले हों, ताकि दुनिया में सबसे ज्यादा टीका निर्माण क्षमता को और बढ़ा सकें।
-संक्रमण और मौतों के मामले में राज्य सरकारें फर्जीवाड़ा कर रही है ताकि अस्पतालों के बाहर खड़ी मरीजों से भरी एंबुलेंस, मुर्दाघरों के बाहर खड़े शव वाहनों और श्मशानों के बाहर लगी कतारों की हकीकत को छिपाया जा सके (उदाहरण के तौर पर गुजरात और दिल्ली)।
सरकार टीका निर्माताओं को कई मूल्य निर्धारित करने की छूट दे रही है और अठारह से चवालीस साल आयुवर्ग वालों को सरकारी टीकाकरण से बाहर कर दिया गया है, और

-सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद लगातार मूक दर्शक बन कर देख रहे हैं और एक शब्द भी बोलने से घबरा रहे हैं, जबकि आपदा के कारण देश गर्त में जा रहा है।
भविष्यवाणी, परिदृश्य निर्माण, योजना, गतिविधियों का पता लगाना, संसाधन आवंटन, प्रबंधन, तालमेल और क्रियान्वयन के मामले में शासन अब चॉक और ब्लैकबोर्ड, टाइपराइटर और आइटीआइ में बने काले टेलीफोन की तरह पुराने दिनों की बात हो चुकी है। शासन की गुणवत्ता तो बहुत ही खराब स्तर तक गिर चुकी है। इसका नतीजा हम अपने चारों ओर गरीबी, कर्ज, बीमारी और मौत के रूप में देख रहे हैं। जिन लोगों ने 2019 में सरकार को सत्ता में लाने के लिए वोट दिया था, क्या वे इसी के हकदार रह गए हैं? मैं कहूंगा- नहीं।

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