इस तरह अंधा हो जाएगा दक्षिण एशिया

1947 में भारत के विभाजन के कारण माना जाता है कि मानव इतिहास में सबसे बड़े पलायन की ‘मजबूरी’ पैदा हुई थी और अनुमानित तौर पर करीब एक करोड़ अस्सी लाख लोगों को पलायन करना पड़ा था। मुक्ति संघर्ष, जिससे बांग्लादेश बना, के पहले और बाद में अस्सी से नब्बे लाख शरणार्थी भारत आए थे। ज्यादातर पश्चिम बंगाल में बस गए। बड़ी संख्या में असम में भी बस गए। इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे।

iskcon temple bangladesh
बांग्लादेश के इस्कॉन मंदिर में तोड़फोड़ (फोटो- @iskcon)

सीमाएं देशों को सीमांकित करती हैं। सीमाएं लोगों को बांध नहीं सकतीं। लोगों के एक देश से दूसरे देश में पलायन कर जाने के बहुत से उदाहरण दुनिया के इतिहास में मौजूद हैं। पलायन के लिहाज से बीसवीं सदीं और अब इक्कीसवीं सदी उल्लेखनीय रही है।

एक संस्था है, जिसे इंटरनेशनल आर्गनाइजेशन आफ माइग्रेशन (आइओएम) कहा जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था का हिस्सा है। इसकी स्थापना 1951 में हुई थी। यह पलायन और आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास के बीच सेतु का काम करती है और आजादी के अधिकार के आंदोलन का भी। लोगों के पलायन को भीतर और बाहर कहीं भी रोका नहीं जा सकता। भारत में साढ़े छह करोड़ अंतरराज्यीय प्रवासी हैं। हम आइओएम की तरह ही सिर्फ प्रवास का सुव्यवस्थित और मानवोचित प्रबंधन सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं।

लाखों का पलायन
बंटवारा लोगों के पलायन का कारण रहा है। दूसरा कारण युद्ध है। भारत ने दोनों देखे हैं। 1947 में भारत के विभाजन के कारण माना जाता है कि मानव इतिहास में सबसे बड़े पलायन की ‘मजबूरी’ पैदा हुई थी और अनुमानित तौर पर करीब एक करोड़ अस्सी लाख लोगों को पलायन करना पड़ा था। मुक्ति संघर्ष, जिससे बांग्लादेश बना, के पहले और बाद में अस्सी से नब्बे लाख शरणार्थी भारत आए थे। ज्यादातर पश्चिम बंगाल में बस गए। बड़ी संख्या में असम में भी बस गए। इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे।

उसी समय लाखों मुसलमान भारत में ही रुक गए, हजारों हिंदू और सिख पाकिस्तान में और बड़ी संख्या में हिंदू बांग्लादेश में रुक गए थे। तीन में से भारत और बांग्लादेश स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र हैं, जो अब गंभीर परीक्षा के दौर से गुजर रहे हैं।

पिछले कुछ सालों में लाखों भारतीय अमेरिका पलायन कर गए हैं, जिनमें हिंदू, मुसलिम, सिख सब हैं। हम उन्हें गर्व से भारतीय प्रवासी कहते हैं, लेकिन वे धर्मनिरपेक्ष पर ईसाई बहुल देश में अल्पसंख्यक हैं। दूसरे कई यूरोपीय देशों कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी भारतीय प्रवासी हैं। इनमें से जब कोई नस्लीय या धार्मिक पूर्वाग्रह का शिकार होता है तो भारत की सरकार जायज तौर पर चिंतित होती है।

बहुसंख्यकवादी एजंडा
भारत में इक्कीस करोड़ तीस लाख मुसलमानों के घर हैं, जहां उनके पूर्वज रहते आए हैं। इसी तरह बांग्लादेश में सोलह करोड़ की आबादी में डेढ़ करोड़ हिंदू हैं, जिनके परिवारों ने बंटवारे या मुक्ति संघर्ष के दौरान भारत पलायन नहीं किया था।

मुसलमानों के दोनों समूह, जो भारतीय नागरिकों और प्रवासियों की संतान हैं, भारत में रहते हैं। समय-समय पर वे धार्मिक भेदभाव के शिकार होते रहे हैं। फिर भी मोदी सरकार उन्हें बचाने या उनके खिलाफ होने वाली हिंसा की निंदा करने से इंकार कर देती है। अगर कोई देश सवाल उठाता है, तो मोदी सरकार उसे ‘भारत के अंदरूनी मामलों में दखल’ की बात कह कर चुप करा देती है। इसके ठीक उलट, जब बांग्लादेश में हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले हुए तो मोदी सरकार ने चिंता जताई। गौरतलब यह भी कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो-टूक बयान दिए और अपने गृहमंत्री को कड़े निर्देश भी।

मुझे याद आता है कि आरएसएस के संस्थापकों में से एक, एमएस गोलवलकर ने अपनी किताब ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में लिखा था- ‘मुसलमानों को हिंदू नस्ल और संस्कृति के गौरवगान के अलावा कुछ और उम्मीद नहीं करनी चाहिए… वे हिंदू राष्ट्र में पूरी तरह अधीन होकर रह सकते हैं, बिना किसी दावे के… यहां तक कि नागरिकों के अधिकारों की मांग भी नहीं।’

क्या आरएसएस और भाजपा के मौजूदा नेताओं ने उस दर्शन से दूरी बना ली है?
अगर यह मान लिया जाए कि ऐसा है, तो उनकी कथनी और करनी उस मान्यता को झुठलाती है।
असल में मुसलमानों पर ज्यादतियों पर उनकी चुप्पी हमें काफी कुछ बताती है।

  • क्या एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) जैसे स्पष्ट रूप से भेदभाव वाले कानून को न्यायोचित ठहराएगा, जिसमें मुसलमानों को छोड़ कर सभी धर्मों के लोगों को समाविष्ट किया गया है? क्या कोई कह सकता है कि सीएए और हजारों तथाकथित ‘विदेशियों’ को हिरासत में लेने की धमकी बांग्लादेश या कहीं और असर नहीं दिखाएगी?
  • क्या बहुसंस्कृति वाला देश राजस्थान में अपनी डेयरी के लिए गायों को ले जा रहे पहलू खान या उत्तर प्रदेश में गोमांस रखने के संदेह में अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या की घटना को माफ कर देगा?
  • क्या बहुधार्मिक देश लव जिहाद की मान्यता को बर्दाश्त करेगा, जब दो धर्मों के युवक-युवती एक दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं या शादी करना चाहते हैं?
  • क्या आधुनिक देश लोकप्रिय ब्रांड तनिष्क पर अपने विज्ञापन वापस लेने के लिए दबाव बनाएगा, जिसमें दिखाया जाता है कि अंतर-धार्मिक दंपति पति के परिवार के साथ खुशी से जिंदगी गुजारते हैं?
  • क्या बहुभाषी देश अंतरराष्ट्रीय ब्रांड फैब इंडिया के परिधानों के शुभारंभ पर उर्दू नाम को लेकर विवाद खड़ा करेगा, यह आरोप लगाते हुए कि हिंदू त्योहार को मुसलमानी रंग दिया गया, जो दो हफ्ते बाद आने वाला है?
  • मुजफ्फरनगर और उत्तरी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के आरोपियों की जांच में जो नतीजे आए हैं और जिस तरह के अभियोजन हुए हैं, उसे कोई भी निष्पक्ष राज्य झेलने और मानने के लिए बाध्य होगा?
    यहां बहुलवाद है
  • अगर कुछ भारतीय- सारे नहीं- तंज कसने, गाली देने, नुकसान पहुंचाने, चोट पहुंचाने, आतंकित करने और साथी भारतीय मुसलमानों को मार डालने देने के लिए बहाने खोज सकते हैं, तो दूसरे देशों में रह रहे हिंदू और सिख तंज, गाली, चोट, नुकसान, आतंक करने या कत्लेआम के शिकार क्यों नहीं होंगे?
  • एक जलते उपमहाद्वीप में ‘क्रिया’ और ‘प्रतिक्रिया’ को कभी भी सफाई के साथ अलग नहीं किया जा सकता। बहुलवाद एक हकीकत है। हर देश को भिन्न संस्कृति, दूसरे धर्म मानने वालों, दूसरी भाषा बोलने वालों के साथ रहना सीखना चाहिए। किसी भी देश को जो चीज बांधती है वह स्वीकार्यता और परस्पर सम्मान है। हाल के वर्षों में इस मामले में भारत नाकाम रहा है।
  • लगता है, सहनशीलता की जगह हिंसा ने ले ली है। यह कहीं भी किसी भी समय घृणास्पद है। हिंसा से हिंसा ही पैदा होगी। आंख के लिए आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी। जरा पूछिए अपने से, किसने कहा था यह?

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