संदिग्ध और फर्जी अभियान

प्यू सर्वे में भाग लेने वालों में से 81.6 फीसद ने कहा कि वे हिंदू के रूप में पले-बढ़े हैं और 81.7 फीसद ने कहा कि उनकी मौजूदा पहचान हिंदू के रूप में है। 2.3 फीसद ने बताया कि वे ईसाई के रूप में पले-बढ़े और 2.6 फीसद ने अपनी पहचान ईसाई के रूप में बताई। ऐसे में बड़े पैमाने पर इस्लाम में धर्मांतरण की बात झूठी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हिंदू अतिवादी पाला के बिशप के समर्थन में उतर आएंगे। दोनों का निशाना ‘दूसरे’ यानी मुसलिम हैं। हमें याद रखना चाहिए कि ऐसे कई मौके आए हैं जब हिंदू अतिवादियों ने ईसाइयों को ‘दूसरा’ माना है। किसी भी वर्ग के लोगों को ‘दूसरा बना डालना’ स्वीकार्य नहीं है।

Jihad, Religious atrocity
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने भी शादी के लिए जबरन धर्म परिवर्तन को एक आपराधिक कृत्य करार दिया है, जिसे कानून के अनुसार निपटा जाना चाहिए। (स्रोत: एक्सप्रेस फोटो)

मैंने इतिहास का एक पन्ना पढ़ा है। धर्मयुद्ध धार्मिक लड़ाई थे, जो ग्यारहवीं सदी के अंत में शुरू हुए थे। माना जाता है कि ये धर्मयुद्ध 1095 से 1291 के बीच लड़े गए थे। इतिहास बताता है कि ये धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों ने लैटिन चर्च की मदद से लड़े थे, ताकि इस्लाम के विस्तार को रोका जा सके (फिलस्तीन, सीरिया और मिस्र में) और पूर्वी भूमध्यसागरीय हिस्से में अपनी पवित्र जमीन को फिर से हासिल किया जा सके।

ये लड़ाइयां जीसस क्राइस्ट के हजारों साल बाद और पैंगबर मोहम्मद के साढ़े चार सौ साल बाद शुरू हुई थीं। दोनों ने ही एकेश्वरवाद के उपदेश दिए थे। दोनों ही अब्राहम और मोशे से प्रेरित थे। यहूदी धर्म के साथ तीन और आस्थाएं अब्राहम धर्म कहलाती हैं। इसलिए लड़ाइयों को जायज ठहरा पाना बहुत ही मुश्किल है। इन लड़ाइयों के बावजूद करोड़ों अनुयायियों के साथ ईसाइयत और इस्लाम आज तक चले आ रहे हैं, ज्यादातर अनुयायी सहिष्णु और शांतिप्रिय हैं, कुछ योद्धा हैं। यूरोप कुल मिला कर ईसाई बहुल है, जबकि फिलस्तीन, सीरिया, मिस्र और कुछ दूसरे हिस्सों को लेकर मुख्यरूप से मुसलिम राष्ट्र लड़ाई करते आए हैं। इस कथा का सार यह है कि कोई भी धर्म या धार्मिक संगठन दूसरे को हरा नहीं सकता।

जिहाद है क्या?
फिर भी जिहाद शब्द चलन में है। ब्रिटानिका के अनुसार इस्लाम में जिहाद का मतलब एक सराहनीय संघर्ष या कोशिश है, मुख्य रूप से अच्छे को बढ़ावा देने और गलत को रोकने के लिए इंसान का संघर्ष है। आधुनिक युग में हालांकि यह हिंसक अभियानों का पर्याय बन गया है। लव जिहाद एक ऐसा भूत था, जो हिंदू अतिवादियों ने नौजवान पुरुषों और महिलाओं को आतंकित करने के लिए ईजाद किया था। नशीली दवाओं का जिहाद एक नया भूत है, जो मुझे और करोड़ों भारतीयों को पीड़ा पहुंचाता है कि पाला के बिशप जोसेफ कल्लरैंगाट इसके प्रवर्तक हो गए हैं। जब ‘लव’ और ‘नारकोटिक’ वास्तविक हैं, तो जिहाद शब्द को प्रेम (एक नैसर्गिक इंसानी भावना) और नशे (दर्दनाशक और नशीली दवा) से जोड़ना एक विकृत मानसिकता को उजागर करता है।

इरादा साफ है। यह एक तरफ हिंदू या ईसाई धर्म के अनुयायियों को और दूसरी तरफ इस्लाम के अनुयायियों के बीच अविश्वास उकसाने और सांप्रदायिक टकराव पैदा करने के लिए किया गया है। अतिवादियों के लिए इस्लाम ‘अन्य’ तथा मुसलिम ‘अन्य लोग’ हैं। एक धर्मनिरपेक्ष देश को इस तरह के कट्टरपन को खत्म कर देना चाहिए, चाहे इसे शब्दों या लेख के जरिए व्यक्त किया गया हो या फिर भेदभाव के सामान्य तरीके के रूप में।

कोई प्रमाण नहीं
इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि भारत में इस्लाम ‘विस्तारवादी’ है। इस साल जून में पीईडब्ल्यू (प्यू) सर्वे ने कई मिथकों और झूठ का पर्दाफाश कर दिया है। 1951 से 2021 के बीच भारत की धार्मिक संरचना उचित रूप से स्थिर रही है। बाहर से आने और प्रजनन दर के कारण मुसलमानों की आबादी में मामूली-सी बढ़ोतरी हुई है, हालांकि 1992 से 2015 के बीच इसमें तेज गिरावट देखी गई और यह 4.4 से घट कर 2.6 पर आ गई। और यह प्रजनन दर हिंदुओं तथा दूसरे धार्मिक समूहों से थोड़ी ही ज्यादा है। फिर भी 2050 तक हिंदू कुल आबादी का सतहत्तर प्रतिशत (एक सौ तीस करोड़) बने रहेंगे।

प्यू सर्वे में भाग लेने वालों में से 81.6 फीसद ने कहा कि वे हिंदू के रूप में पले-बढ़े हैं और 81.7 फीसद ने कहा कि उनकी मौजूदा पहचान हिंदू के रूप में है। 2.3 फीसद ने बताया कि वे ईसाई के रूप में पले-बढ़े और 2.6 फीसद ने अपनी पहचान ईसाई के रूप में बताई। ऐसे में बड़े पैमाने पर इस्लाम में धर्मांतरण की बात झूठी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हिंदू अतिवादी पाला के बिशप के समर्थन में उतर आएंगे। दोनों का निशाना ‘दूसरे’ यानी मुसलिम हैं। हमें याद रखना चाहिए कि ऐसे कई मौके आए हैं जब हिंदू अतिवादियों ने ईसाइयों को ‘दूसरा’ माना है। किसी भी वर्ग के लोगों को ‘दूसरा बना डालना’ स्वीकार्य नहीं है।

मेरा स्कूली अनुभव
मैं ईसाई मिशनरी स्कूल में पढ़ा। उसमें ज्यादातर बच्चे हिंदू थे, जो समाज के सभी वर्गों से आते थे। ईसाई बच्चों की संख्या कम थी और मुसलमान तो बहुत ही कम। हर कक्षा के कई खंड थे। लेकिन कक्षा का प्रमुख प्रधानाध्यापक कुरुविल्ला जैकब चुनते थे। पांच साल तक मैं छठी कक्षा से दसवीं तक वहां पढ़ा, कक्षा का प्रमुख एक हंसमुख, लेकिन औसत छात्र एके मूसा था। अंतिम वर्ष यानी ग्यारहवीं कक्षा में कक्षा का प्रमुख अपने आप स्कूल के छात्रों का प्रमुख बन गया।

प्रधानाध्यापक चाहते थे कि कद में लंबा और आकर्षक छात्र ही स्कूली छात्रों की अगुआई करे, जो स्कूल के समारोहों और सालाना समारोह में फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सके। उन्होंने किसे चुना? ये लो, उन्होंने हारून मोहम्मद को चुना, और किसी को नहीं, हिंदू या ईसाई छात्रों में से किसी को नहीं। सोचा कि कुछ अलग हट कर किया गया है। तब हम ‘तुष्टीकरण’ शब्द से एकदम अनजान थे।

मुझे खुशी है कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने बिशप की दंगा कराने की हरकत का संज्ञान लिया। इस बात की भी खुशी है कि विपक्ष के नेता वीडी सतीशम ने मुख्यमंत्री के बयान का समर्थन किया है, जिसमें कहा गया था कि सरकार उन लोगों से सख्ती से निपटेगी जो इस तरह की झूठी बातें फैलाते हैं।

जो लोग नारकोटिक्स जिहाद के बारे में नुकसान पहुंचाने वाली बातें करते हैं, उन्हें तीन हजार किलो (तीन टन) हेरोइन पकड़े जाने के बारे में भी सोचना चाहिए जो गुजरात में एक बंदरगाह के जरिए ‘आयात’ करने की कोशिश की गई थी। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि जब तक किसी को उच्चस्तर पर सरकारी संरक्षण हासिल न हो तब तक कोई भी इतनी भारी मात्रा में इस तरह के ‘आयात’ की हिम्मत नहीं कर सकता (जिस दंपति को पकड़ा गया है वह मुसलिम नहीं है)।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को जिहाद के बारे में बात की निंदा करनी चाहिए। तीन हजार किलो हेरोइन पकड़े जाने के बारे में भी उन्हें बोलना चाहिए। ये ऐसे मसले हैं, जो आतंरिक सुरक्षा और देश के सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर नतीजे पैदा कर सकते हैं।

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