ताज़ा खबर
 

कारण पर बात करने का वक्त नहीं

जैसे ही पहली लहर थमी, जांच बेहद धीमी कर दी गई। जब जांच नमूनों की संख्या घटी तो नए संक्रमितों के आंकड़े में भी गिरावट आनी थी। जांच में तेजी नहीं लाई गई। तेज गर्मी में छत को दुरुस्त नहीं किया गया, इसलिए बारिश शुरू होते ही छत टपकने लगी।

पंजाब के जालंधर स्थित एक श्मशान घाट में कोरोना से मरने वाले व्यक्ति के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के दौरान रस्म निभाता परिजन। (फोटोः पीटीआई)

भारत के लोग, या कम से कम विशाल बहुसंख्यक उस मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां निष्कर्ष यह है कि अपना जीवन बचाने के लिए उन्हें सिर्फ अपने पर, अपने परिवारों और दोस्तों पर ही भरोसा करना पड़ेगा। कोरोना के खिलाफ जंग में राज्य, खासकर केंद्र सरकार खत्म हो चुकी है। कुछ राज्य सरकारें जैसे केरल और ओड़िशा थोड़े से भरोसे के सहारे अभी जंग में जुटी हैं। तमिलनाडु और पुदुचेरी में अभी सरकारें बदली हैं, इसलिए उनके बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। आरोपों से कोई भी पार्टी बच नहीं सकती। कुछ ने बहुत बाधाओं के बाद भी काफी कोशिशें की, कुछ हिम्मत हार गर्इं, और कुछ ने तथ्यों को दफ्न कर दिया और झांसों व डींगों पर ही भरोसा करती रहीं। पीड़ित आम जनता है।

विवादों या तर्कों से यह मुद्दा हल नहीं होगा कि आखिर देश को इस खौफनाक हालात में धकेलने के लिए मुख्यरूप से कौन जिम्मेदार है, क्योंकि यह कारण से चलने वाला वक्त नहीं है। बजाय इसके कुछ निश्चित विवादित तथ्यों को फिर से दोहराना कहीं ज्यादा उचित है और इसे सवाल का जवाब खोजने के लिए लोगों पर छोड़ दिया जाए। मेरे तथ्य इस प्रकार हैं-
मांग बनाम आपूर्ति
1- मूल सारणी
हर लक्षित समूह का अनुमानित आकार उपलब्ध है और सरकार को पता था। इसलिए, हर निर्धारित तारीख को कितनी मांग होगी, इसकी गणना आसानी से हो सकती थी, लेकिन यह नहीं किया गया। टीकों की खुराक की जितनी जरूरत होती उसे दो गुणा कर दिया जाता। टीकाकरण को लेकर शुरुआती हिचक को छोड़ भी दें तो भी टीकों की खुराक के लिए संभावित मांग का अनुमान लगा पाना संभव था। यह भी कभी नहीं किया गया।
2- दो भारतीय निर्माताओं- सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटैक की निर्धारित क्षमता सरकार को पता थी। फैक्टरी का मुआयना और समय-समय पर जांच करके वास्तविक निर्माण क्षमता और इसे बढ़ाने की संभावना का पता लगाया जा सकता था। यह भी कभी नहीं किया गया।

बिना टीके का टीकाकरण!
3- सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटैक को टीकों के लिए आदेश 11 जनवरी, 2021 को दिया गया था। दोनों कंपनियों ने शुरुआती आपूर्ति अपने जोखिम पर तैयार भंडार से की थी। इस तरह दोनों ही कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने का कीमती वक्त गंवा दिया गया।
4. कम से कम एक कंपनी (सीरम इंस्टीट्यूट) और शायद दोनों को उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसे की जरूरत थी। उत्पादन बढ़ाने के लिए उस तारीख तक कोई वित्तीय मदद नहीं दी गई थी। आपूर्ति के लिए अग्रिम की घोषणा 19 अप्रैल, 2021 को की गई, लेकिन यह आपूर्ति के लिए अग्रिम भुगतान जैसा ही था, न कि उत्पादन बढ़ाने के लिए पूंजी या कर्ज की मंजूरी।

5. भारत में बने टीकों के निर्यात की अनुमति मार्च, 2021 तक ही थी। निर्यात पर प्रतिबंध 29 मार्च को लगाया गया। तब तक पांच करोड़ अस्सी लाख खुराक निर्यात की जा चुकी थी।
6. फाइजर के टीके को आपात इस्तेमाल के लिए इजाजत देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गई और इसका नतीजा यह हुआ कि फाइजर ने अपना आवेदन वापस ले लिया। तीसरे टीके स्पूतनिक के आपात इस्तेमाल को 12 अप्रैल, 2021 को मंजूरी दी गई और भारत में इसकी पहली खेप एक मई को पहुंची। उपयोग या आयात के लिए आज की तारीख तक किसी दूसरे टीके को मंजूरी नहीं दी गई है।

7. पिछले साल तैयार किए गए अतिरिक्त स्वास्थ्य सेवा ढांचे को अक्तूबर 2020 के बाद ही छिन्न-भिन्न कर दिया गया था और मार्च में दूसरी लहर के बाद इसे फिर से खड़ा करना था। इससे उपलब्ध स्वास्थ्य सेवा ढांचे पर असहनीय बोझ पड़ा जैसे अस्पतालों में बिस्तरों, जीवन रक्षक प्रणाली, ऑक्सीजन टैंकरों, सिलेंडरों और सांद्रकों की भारी कमी पड़ गई।

8. जैसे ही पहली लहर थमी, जांच बेहद धीमी कर दी गई। जब जांच नमूनों की संख्या घटी तो नए संक्रमितों के आंकड़े में भी गिरावट आनी थी। जांच में तेजी नहीं लाई गई। तेज गर्मी में छत को दुरुस्त नहीं किया गया, इसलिए बारिश शुरू होते ही छत टपकने लगी।

9. रोजाना लगाए जाने वाले टीकों की संख्या बढ़ने के बजाय घटी है। दो अप्रैल को बयालीस लाख पैंसठ हजार एक सौ सत्तावन टीके लगाए गए थे। हालांकि अप्रैल के लिए रोजाना का औसत करीब तीस लाख का रहा। मई में यह औसत गिर कर करीब साढ़े अठारह लाख पर आ गया है। टीकों की कमी से टीकाकरण अभियान का दम घुटने लगा है।

इनकार, और इनकार
10. आपात स्थिति में नए संसाधनों का पता लगाने और उनके उपयोग की कोई योजना नहीं है। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन के स्रोतों को बढ़ाने, नाइट्रोजन टैंकरों को ऑक्सीजन टैंकरों में बदलने, ऑक्सीजन के लिए पीएसए संयंत्रों को खड़ा करने और उनका आयात और ऑक्सीजन सांद्रकों और जीवन रक्षक प्रणाली का आयात और भंडारण करने की कोई योजना नहीं है। नर्सों और अर्ध चिकित्सा कर्मचारियों की भर्ती की भी कोई योजना नहीं है।

11. जब दूसरी लहर शुरू हुई, तब यह माना गया था कि यह पहली लहर की तरह ही धीरे-धीरे बढ़ेगी, फिर स्थिर हो जाएगी और फिर कम होना शुरू हो जाएगी। बदतर हालात सहित कई तरह की स्थितियों का अनुमान लगाने की कोई कोशिश नहीं की गई। इसलिए दूसरी लहर के तेजी से बढ़ने और उसे फैलने को रोकने की कोई योजना नहीं थी। यह मानना उचित ही होगा कि तीसरी या चौथी लहर का मुकाबला करने की भी कोई योजना नहीं है।

12. सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर सूचना, शिक्षा और संचार की कोई दृष्टि नहीं है। पहली लहर के दौरान सरकार का नजरिया प्रचार, दिखावा और जीत का रहा। दूसरी लहर में नजरिया खारिज करने (ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं, राज्यों के पास टीकों का पर्याप्त भंडार है, जैसे जुमले), सच्चाई को दफ्न करने और राज्यों के सिर टोपी रखने वाला रहा। उसका नतीजा घोर अराजकता, गफलत और किसी तरह की जवाबदेही न होने के रूप में सामने आया। किसी दूसरे देश में ऐसा होता तो कुछ लोगों को निश्चित ही सजा मिलती।
अब यह पाठकों पर है कि वे क्या फैसला करते हैं।

Next Stories
1 राष्ट्र सारा देखता है
2 बकबक का नशा
3 जवाबदेही किसकी है?
ये पढ़ा क्या?
X