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रफाल का भूत फिर आया

मामले को बारीकी से देखने के लिए चार संस्थाओं के पास मौका था। पहला मीडिया के पास। कई सारे सवाल उठाने और उनका जवाब मांगने के लिए पर्याप्त सामग्री थी। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इन सवालों को उठाने से इंकार कर दिया, बल्कि इसके उलट कई मीडिया संगठनों ने सरकार के बयान छापे जैसे कि वही प्रामाणिक खबर हों।

Ravivari stambh, special storyराफेल जेट फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट द्वारा निर्मित है। (फाइल फोटो)

यादें कमजोर पड़ जाती हैं। आम आदमी के लिए रोजमर्रा की जिंदगी चुनौती होती है। वे देश की चुनौतियों और शासन को लेकर जागरूक तो रहते हैं, लेकिन बहुत लंबे समय तक उनके बारे में सोच नहीं सकते। वे उन संस्थाओं पर भरोसा करते हैं, जिन्हें उन्होंने इन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्थापित किया है, जिनमें संसद, विधायिका, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) और विपक्षी दल शामिल हैं। जब ये संस्थान अक्षमता, साठगांठ या किसी खौफ की वजह से अलग-अलग या सामूहिक रूप से नाकाम हो जाते हैं, तो लोग हार मान लेते हैं। रफाल विमान मामले में यही हुआ है।

चार संस्थाएं नाकाम
मामले को बारीकी से देखने के लिए चार संस्थाओं के पास मौका था। पहला मीडिया के पास। कई सारे सवाल उठाने और उनका जवाब मांगने के लिए पर्याप्त सामग्री थी। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इन सवालों को उठाने से इंकार कर दिया, बल्कि इसके उलट कई मीडिया संगठनों ने सरकार के बयान छापे जैसे कि वही प्रामाणिक खबर हों। सात अक्तूबर, 2018 को मैंने अपने इसी स्तंभ में वित्तमंत्री के समक्ष दस सवाल उठाए थे। उनमें से कुछ ये थे-

1- भारत और फ्रांस के बीच उस समझौते, जिससे भारत दो इंजन वाले एक सौ छब्बीस रफाल विमान खरीदता, को क्यों रद्द कर दिया गया था और सिर्फ छत्तीस नए विमान खरीदने के लिए नया करार करने का फैसला किया गया था?
2- क्या यह सही है कि नए समझौते में प्रति विमान कीमत एक हजार छह सौ सत्तर करोड़ रुपए (जैसा कि दासो ने खुलासा किया) रखी गई थी, जो कि रद्द किए समझौते में पांच सौ छब्बीस करोड़ दस लाख थी?
3- यदि पहला विमान सितंबर 2019 में (नए करार के चार साल बाद) और आखिरी 2022 में मिलेगा, तो सरकार आपात खरीद के रूप में लेनदेन को कैसे उचित ठहराती है?
4- हिंदुस्तान एअरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को तकनीकी हस्तांतरण का समझौता क्यों रद्द कर दिया गया?
5- आफसेट भागीदार के तौर पर सरकार ने क्या कोई नाम सुझाया था और यदि नहीं तो फिर सरकार ने एचएएल का नाम क्यों नहीं सुझाया?
अब तक इन और अन्य सवालों का जवाब नहीं दिया गया है। कुछ महत्त्वपूर्ण अपवादों को छोड़ कर मीडिया ने देश को निराश किया है।

दूसरा, सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दाखिल की गई याचिका में उठाए महत्त्वपूर्ण सवालों पर जांच में अपनी अक्षमता व्यक्त कर दी। उदाहरण के लिए, अदालत ने कीमत के मामले या तकनीकी उपयुक्तता से संबंधित मामलों, एक सौ छब्बीस विमान, जो कि वायुसेना की जरूरत थे, के बजाय सिर्फ छत्तीस विमान खरीदने के फैसले, या सैन्य उपकरणों की खरीद की निर्धारित मानक प्रक्रिया से हटने जैसे मामलों की जांच करने से इंकार कर दिया। अदालत ने सरकार की ओर से सील बंद लिफाफे में पेश की गई टिप्पणी और मौखिक जवाबों को भी स्वीकार कर लिया। अदालत को इस भरोसे की गलतफहमी में रखा गया था कि इस सील बंद लिफाफे में कैग की रिपोर्ट थी, जबकि उस दिन तक संसद या अदालत में कोई रिपोर्ट पेश नहीं की गई थी। फैसले का स्वागत करते हुए सरकार ने दावा किया कि उसे दोषमुक्त कर दिया गया है, जबकि सच्चाई यह थी कि महत्त्वपूर्ण मुद्दों की तो अदालत ने जांच ही नहीं की थी।

संसद ने अधिकार त्यागे
तीसरा, संसद दलीय आधार पर बंट गई और सरकार की कार्रवाई पर ससंदीय निगरानी नाकाम हो गई। अकेली संसद ही यह पूछ सकती थी और सच का पता लगा सकती थी कि दासो और एचएएल के बीच 13 मार्च, 2013 के तकनीकी हस्तांतरण और कार्य भागीदारी करार को क्यों छोड़ दिया गया, जबकि पंचानबे फीसद समझौता हो चुका था, अगर नए समझौते के तहत दाम नौ से बीस फीसद कम थे तो एक सौ छब्बीस विमान बेचने का दासो का प्रस्ताव क्यों नहीं मान लिया गया, और एचएएल को आफसेट भागीदार बनाने के लिए सरकार ने मामले को क्यों नहीं बढ़ाया? संसदीय जिम्मेदारी की कोशिशों को सरकार के पाशविक बहुमत ने विफल कर डाला।

चौथा, सबसे ज्यादा नाकाम तो कैग रहा। तैंतीस पन्नों की रिपोर्ट में कैग ने लेनदेन पर परदा डाल दिया और इस मामले की सच्चाई से जुड़े तथ्यों को दफ्न कर दिया। अप्रत्याशित रूप से कैग ने यह स्वीकार कर लिया कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए एमएमआरसीए (मध्यम श्रेणी के बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान) मामले में सरकार ने व्यावसायिक ब्योरे नहीं देने के फैसले को दोहराया। बोफोर्स या किसी अन्य मामले में ऐसी सहिष्णुता या सम्मान नहीं दिखाया गया था। परिणाम यह हुआ कि पृष्ठ संख्या 126 से 141 तक तक का सामान्य समझ वाले व्यक्ति के लिए भी कोई मतलब नहीं रह गया। खासतौर से पृष्ठ संख्या 131 पर सारणी तीन और पृष्ठ संख्या 133 पर सारणी चार में जो भी था, वह कुछ नहीं समझ में आने वाली बातें थीं। फिर भी कैग पर सरकार के इस दावे को खारिज करने के लिए दबाव था कि नया सौदा नौ फीसद सस्ता (प्रति विमान) था। किसी भी अन्य प्राधिकार के मुकाबले कैग व्यापक हिदायतें दे सकता था, लेकिन इस स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकार ने देश को निराश किया।

विचलित करने वाले खुलासे
मुझे याद पड़ता है कि नए समझौते में आवश्यक भ्रष्टाचार निरोधी धाराओं को अनावश्यक रूप से हटा दिया गया था। ये अनुचित दबाव नहीं डालने, कोई एजेंसी नहीं होने, खातों तक पहुंच और ईमानदारी संधि जैसी धाराएं थीं। इन्हें हटाने के पीछे क्या कोई गुप्त उद्देश्य था? हमें नहीं मालूम, लेकिन धाराओं की गैरमौजूदगी सरकार का पीछा करने के लिए आ गई है। फ्रांस के मीडिया संगठन मीडियापार्ट ने तीन हिस्सों में जांच में पाया है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करने वाली फ्रांस की एजेंसी एजेंस फ्रैंकाइस एंटीकरप्शन को इस बात के सबूत मिले हैं कि दासो उस एक बिचौलिए को दस लाख यूरो देने के लिए तैयार हो गई थी, जिसकी भारत में एक अन्य रक्षा सौदे के मामले में जांच चल रही है। और पांच लाख आठ हजार नौ सौ पच्चीस यूरो का भुगतान भारतीय कंपनी डेफसिस सॉल्युशंस को कर भी दिया था। मीडियापार्ट की यह खबर यह भी खुलासा करती है कि फ्रांसीसी और भारतीय जांचकर्ताओं ने सूचनाओं के समझौते को लेकर बड़ा सौदा किया था, लेकिन दोनों देशों ने इस मामले को दबा दिया था।

यह उतना ही खास है जितना कि कोई आरोप हो सकता है। रफाल सौदे का ब्योरा जमीन खोद कर भी निकाल लिया जाएगा। तब तक इसका भूत सरकार का पीछा करता रहेगा।

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