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पक्षी और कीड़े में सहमति

महामारी और अर्थव्यवस्था की हालत ने घरेलू बजट को बुरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। घटती आमद, बढ़ते खर्च, उधार लेने की नौबत, बचत में गिरावट और चुकाने की क्षमता को लेकर भरोसा नहीं होने जैसी चीजों ने औसत घरेलू व्यक्ति को थका डाला है।

सरकार की आर्थिक नीतियों से जनता की असहमति भरोसे को कम करता है। (Photo source- Praveen Khanna/Representational)

रायसीना हिल के कोने वाले शीर्ष दफ्तर से नजारा आकर्षक लग सकता है। खासतौर से तब जब छवियां और तस्वीरें मुख्य आर्थिक सलाहकार ने चुन कर निकाली हैं। उदाहरण के लिए, नौकरियों का जाना नजर नहीं आ सकता और ईपीएफ में नए पंजीकरण सामने आ जाते हैं! भूखे चेहरे गायब हो सकते हैं और उनकी जगह दो महीने के लिए महीने में एक बार बंटने वाला पांच किलो अनाज लेते लोगों का चेहरा आ जाता है! बंटाईदारी पर हाड़तोड़ काम करने वाले किसान की तस्वीरें धुंधली की जा सकती हैं और उसकी जगह पर्दे पर किसान सम्मान का चेक जमा कराने वाला जमीन मालिक जो नजर नहीं आता, दिखाया जाता है। यह अधिकार, सत्ता और आलोचना से बेपरवाह लोगों द्वारा तैयार किया गया जादू है।

औसत भारतीय इस पहाड़ी तक पहुंचने की आकांक्षा नहीं रख सकता। कुल मिला कर वह अपने गांव या कस्बे या शहर के एक इलाके तक ही सीमित रह जाता है। इसका कारण यह है कि जमीन पर दोनों पैर मजबूती के साथ जमा दिए गए हैं। औसत भारतीय का नजरिया कीड़े जैसा ही होता है। नजरिया एकदम अलग, खराब और बदसूरत हो सकता है, लेकिन यह सच्चाई के करीब होगा।

सर्वे करवाया
मैंने अपने दोस्त जवाहर से निम्न मध्यवर्ग के एक हजार लोगों का फोन सर्वे करवाने का अनुरोध किया। उन्होंने जांचकर्ताओं की टीम बना ली। उन लोगों को भी इसमें शामिल किया, जो अपनी घिरी कालोनियों में बने घरों में रहते हैं और अपने को मध्यवर्ग का बताते हैं, पर हमें पता है कि वे नहीं हैं। हमने पांच हजार से तीस हजार रुपए आय वालों को निम्न मध्यवर्ग में रखा। एक हजार चार लोगों ने नौ सवालों के जवाब दिए और अपना-अपना ईमेल और मोबाइल नंबर भी। हो सकता है, कुछ ने अपनी आमद कम करके बताई हो, लेकिन अगर तीस हजार रुपए के मुकाबले आय थोड़ी कम भी दिखा दी जाए तो भी आंकड़ों का कुछ नहीं बिगड़ने वाला।

सवाल 25 मार्च, 2020 से लगी पहली पूर्णबंदी से लेकर बारह महीने की अवधि से संबंधित थे। सर्वे के नतीजे यह बताते हैं-
1- जवाब देने वाले लोगों की संख्या एक हजार चार थी।
2- आठ सौ अस्सी लोगों ने बताया कि उनकी आमद घटी, एक सौ सत्रह ने कहा कोई बदलाव नहीं और सात ने तनख्वाह बढ़ने की बात कही।
3- सात सौ अट्ठावन लोगों ने बताया कि उनका खर्च बढ़ा, एक सौ पंद्रह ने कहा कोई फर्क नहीं पड़ा और इक्यानबे लोगों ने बताया कि खर्चा घट गया था।
4- सात सौ पच्चीस लोगों ने बताया कि उनकी बचत में गिरावट आई, लेकिन सिर्फ तीन सौ उनतीस ने परिसंपत्ति में कमी आने की बात कही। बाकी ने बचत या परिसंपत्ति में कोई फर्क नहीं आने की बात कही।
5- जैसी कि उम्मीद थी, सात सौ दो लोगों ने उधार पैसा लेने की बात कही। इनके स्रोत बैंक, छोटे वित्तीय संस्थान, स्व सहायता समूह, चिट फंड, परिवार, रिश्तेदार और दोस्त थे। कुछ ने बताया कि उन्होंने इनमें एक से ज्यादा स्रोतों से पैसा उधार लिया। छह सौ तिरपन लोगों ने ब्याज पर पैसा लिया। निश्चित समय के भीतर ब्याज के साथ पैसा चुकाने की क्षमता के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में एक सौ छिहत्तर लोगों को इसका पूरा भरोसा था, एक सौ चौंसठ को कोई भरोसा नहीं था और दो सौ छप्पन लोगों को आशंका थी।

प्रमाण हमारे चारों ओर
ये नतीजे उन्हीं के अनुरूप हैं जो हम रोजाना देख, सुन और अनुभव कर रहे हैं। महामारी और अर्थव्यवस्था की हालत ने घरेलू बजट को बुरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। घटती आमद, बढ़ते खर्च, उधार लेने की नौबत, बचत में गिरावट और चुकाने की क्षमता को लेकर भरोसा नहीं होने जैसी चीजों ने औसत घरेलू व्यक्ति को थका डाला है। जब तक घर में दो गुनी आमद नहीं है (चाहे दोनों आमदों पर बुरा असर पड़ा हो) तो नतीजा यही निकालना सुरक्षित होगा कि औसत गृहस्थ व्यक्ति बुरी तरह हलकान है और उसे लगता है कि वह और गरीबी में चला गया है।

आय, खर्च, बचत और उधारी से जुड़े चार प्रमुख प्रश्नों के जवाबों में चार अंकों में सबसे कम वाले को लेते हैं। यह सात सौ दो है। यह संख्या सर्वे में शामिल लोगों का सत्तर फीसद है। यह उस देश की आश्वस्त करने वाली तस्वीर नहीं है, जो हाल तक यह डींगें मारता रहा कि उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गई है। यह निश्चित रूप से इन स्थापित ऊंचाइयों से तेजी से नीचे आना है कि (1) 2004-2014 के बीच भारत की औसत वृद्धि दर 7.6 फीसद रही और (2) इस अवधि में सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए। अब यह सब इतिहास है।

एनएसओ ने 2020-21 के लिए राष्ट्रीय सालाना आय के जो अनुमान जारी किए हैं, नतीजे उनके भी अनुरूप हैं। 2020-21 में जीडीपी पूर्ववर्ती वर्ष के मुकाबले 7.3 फीसद तक सिकुड़ गई। फिर, चार संकेतक निजी खपत, सकल स्थिर पूंजी निर्माण, निर्यात और आयात भी पूर्व के दो वर्षों के मुकाबले बेहद बदतर हालत में पहुंच गए। आरबीआइ ने अर्थव्यवस्था में मांग की भारी कमी की चेतावनी दी और नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजित बनर्जी ने ज्यादा खर्च और जरूरत हो तो नोटों की छपाई की सलाह दी।

एनएसओ और स्थानीय सर्वे- पक्षी और कीड़े- ने जमीन पर एक जैसी तस्वीर देखी। यह सुखद तालमेल है, जिसने वित्तमंत्री और मुख्य आर्थिक सलाहकार को एक-दूसरे की हां में हां मिलाने को छोड़ दिया है।

करने योग्य, पर क्या हो पाएगा
कड़वे तथ्य ये हैं कि 2017-18 से स्थिर मूल्यों और प्रति व्यक्ति जीडीपी के आंकड़े नीचे आए हैं:
जीडीपी प्रति व्यक्ति
(करोड़ रुपए में) (करोड़ रुपए में)
2017-18 131,75,160 1,00,268
2018-19 140,03,316 1,05,525
2019-20 145,69,268 1,08,645
2020-21 134,08,882 99,694
एक संपूर्ण राष्ट्र और एक औसत भारतीय फिर से उसी हालत में आ गया है, जहां वह 2017-18 में था। अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, पहले विध्वंसकारी नीतियों (नोटबंदी और गलत तरीके से लागू जीएसटी) के कारण, दूसरा कोविड महामारी से और तीसरा आर्थिक कुप्रबंधन की वजह से।
2017-18 की ओर फिर से बढ़ना धीमा होगा। लेकिन यह किया जा सकता है तब जब सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, रिजर्व बैंक, मशहूर अर्थशास्त्रियों और विपक्षी दलों के समुचित तर्कों और सुविवेचित सलाह को सुनेगी और उस पर अमल करेगी।

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