कारोबार सिर्फ सरकारों के साथ

पेगासस के रहस्योद्घाटन के मुद्दे पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया उदार लोकतंत्र जैसे फ्रांस या इजराइल जैसा सुलझे लोकतंत्र और हंगरी जैसे संदिग्ध लोकतंत्र से एकदम उलट है।

Spyware Pegasus, Ravish Kumar, NDTV
कई देशों में पेगासस के जरिये जासूसी का आरोप लग रहा है (Photo- Indian Express)

राजनेताओं (विपक्षी सदस्यों और मंत्रियों), जजों, नौकरशाहों, छात्रों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और उद्योगपतियों की जासूसी के लिए स्पाईवेयर के इस्तेमाल पर बहस को शीर्षक के चार शब्दों से परिभाषित किया जाना चाहिए। ये चार शब्द खोटी नीयत से भरपूर पेगासस बनाने वाले और उसके मालिक एनएसओ समूह को लिखे गए संवाद में हैं।

यह बयान उस पहले वाले बयान के बाद का है, जिसमें एनएसओ ने कहा था कि ‘एनएसओ अपनी तकनीकियों को पूरी तरह से जांची-परखी सरकारों की कानून प्रवर्तन और खुफिया एजेंसियों को बेचता है।’ हालांकि उसी समय एनएसओ समूह ने इसके असल इस्तेमाल से अपनी दूरी बना ली थी, जिसके लिए यह जासूसी सॉफ्टवेयर इसने अपने ‘ग्राहकों’ जो कि सरकारें थीं, को दिया था। कुछ ग्राहक-सरकारों ने इस सॉफ्टवेयर का गलत इस्तेमाल किया। भारत के संदर्भ में कुछ सवाल हैं। मैं इनकी सूची बनाऊं, उससे पहले एक चेतावनी यह है कि तकलीफदेह सवाल उन लोगों के लिए नहीं हैं, जो सुकरात या तर्क या तर्कसंगत बहस को पसंद नहीं करते हैं।

कोई सीधा जवाब नहीं
1- क्या भारत सरकार या इसकी कोई एजेंसी एनएसओ समूह की ग्राहक है?
यह साधारण-सा और सीधा-सपाट सवाल है। इसका जवाब सिर्फ हां या ना में हो सकता है, लेकिन कुछ मुश्किल कारणों की वजह से सरकार ने सीधा जवाब देने से इंकार कर दिया है। जिस तरह सरकार अड़ गई है और सवाल का जवाब देने से इंकार कर दिया है, उससे दिनोंदिन संदेह गहराता जा रहा है।
2- अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं की रिपोर्ट, जिसमें कहा गया है कि एनएसओ समूह का एक भारतीय ग्राहक है, के आधार पर द वायर की रिपोर्ट ने सरकार के संभावित जवाब को जटिल बना दिया है। अगर ग्राहक भारत की सरकार नहीं थी तो कौन था?

सरकार कह सकती थी कि ‘ग्राहक हम नहीं हैं’, लेकिन इससे फिर यह सवाल निकलता कि तब भारतीय ग्राहक कौन था? सरकार कह सकती थी कि हमें नहीं पता। पर इस जवाब से यह सवाल पैदा होता कि ‘क्या आपको यह जानने की चिंता नहीं है कि भारतीय ग्राहक कौन है?’ सरकार को यह पता ही नहीं है कि इस सवाल का जवाब दिया कैसे जाए, क्योंकि सवाल-दर-सवाल खड़े होते चले जाएंगे, जिनका जवाब देने के लिए सरकार तैयार नहीं है।

3- अगर भारत सरकार या इसकी कोई एजेंसी एनएसओ की ग्राहक थी, तो उसने यह जासूसी सॉफ्टवेयर कब हासिल किया?
यदि सरकार को यह भरोसा होता कि वह निर्दोष है तो वह पहले सवाल का जवाब ‘ना’ में देती और इस सवाल से कोई सवाल नहीं निकलता। एक बार फिर, कुछ अकथनीय कारणों से सरकार ने इस सवाल का भी जवाब देने से इंकार कर दिया और इसी कारण संदेह तेजी से बढ़ता गया।

विचित्र अनदेखी
4- एमनेस्टी इंटरनेशनल और फॉरबिडन स्टोरीज की जांच में खास लोगों की सूची का खुलासा हुआ। इस सूची को हम किनारे रख दें और सिर्फ उन नामों पर गौर करें, जिनके फोनों में वाकई सेंध (जैसा कि आरोप है) लगाई गई थी। ‘द वायर’ के मुताबिक इसमें अश्विनी वैष्णव और प्रहलाद पटेल का नाम भी है। दोनों मंत्री हैं। इस रहस्योद्घाटन से सरकार परेशान क्यों नहीं है?

नागरिक होने के नाते हम जानना चाहते हैं कि क्या मंत्रियों के फोन में सेंध लगी थी। सरकार बेफिक्र होने का दिखावा क्यों कर रही है? क्या सही कदम यह नहीं होता कि सरकार संबंधित मंत्रियों से 2017 से 2019 के बीच इस्तेमाल किए उन फोनों को फोरेंसिक जांच के लिए जमा कराने को कहती? सरकार ने यह जानने के लिए कि आखिर सच क्या है, कोई चिंता नहीं दिखाई, यहां तक कि उत्सुकता भी नहीं। और इस तरह की उदासीनता और बेफिक्री सरकार पर संदेह की काली छाया को और गहरा करती है।

जांच से थोड़े-थोड़े करके नतीजे सामने आ रहे हैं। संकेतशब्द सचेत करने वाले दिखते हैं। भारत सरकार इन सावधानियों के पीछे छिपने की जगह तलाश रही है। इन चेतावनियों और सावधानियों में ऐसा कुछ नहीं है, जो इस कड़वी सच्चाई को कमजोर कर सके कि एनएसओ समूह का भारतीय ग्राहक था और भारत में कुछ फोनों में सेंध लगाई गई थी। मुझे इस बात का पक्का भरोसा है कि भारतीय ग्राहक का नाम जल्द ही सामने आएगा। यह भी संभव है कि भारत में खास लोगों की सूची में से और भी लोग फोन की फोरेंसिक जांच के लिए पेशकश करें, जिससे यह खुलासा हो कि उनमें से कुछ फोनों की पेगासस द्वारा जासूसी की गई थी। ऐसे में तब सरकार क्या करेगी?

भारत बनाम अन्य देश
पेगासस के रहस्योद्घाटन के मुद्दे पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया उदार लोकतंत्र जैसे फ्रांस या इजराइल जैसा सुलझे लोकतंत्र और हंगरी जैसे संदिग्ध लोकतंत्र से एकदम उलट है।

आरोपों को फ्रांस ने बहुत ही गंभीरता से लिया, राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने आपात सुरक्षा बैठक बुलाई, कई स्तरों पर जांच करने को कहा, इजराइल के प्रधानमंत्री बेनेट से बात की और बेनेट ने उन्हें भरोसा दिया कि इजराइल जो जांच कर रहा है, उसके नतीजे वे उनके साथ साझा करेंगे। इसके कुछ ही समय बाद इजराइल के रक्षामंत्री फ्रांस पहुंचे, संभवत: फ्रांस के साथ शांति कायम करने के लिए।

इजराइल ने अपनी नेशनल सिक्योरिटी कांउसिल को एनएसओ समूह के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करने का आदेश दिया है। इजराइल सरकार के अधिकारियों ने एनएसओ समूह के दफ्तरों का ‘दौरा’ किया और जांच का काम शुरू कर दिया।

हंगरी में न्यायमंत्री ने कहा- हर देश को ऐसे उपायों की जरूरत होती है, लेकिन उन्होंने पेगासस पर कोई टिपप्णी करने से इंकार कर दिया। विपक्षी नेता, मेयर और पत्रकार भी उन लोगों में शामिल थे, जिनके फोनों में सेंध लगाई गई थी। सरकार से इस्तीफे की जोरदार मांग की गई, लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा।
भारत में सरकार ने किसी भी तरह की जांच का विरोध किया और संसद में बहस कराने से मना कर दिया। संसदीय समिति की बैठक में भाजपा सासंदों ने हाजिरी रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया और समिति की कार्यवाही में अड़चनें पैदा की।
आज की तारीख में भारत हंगरी जैसा है। क्या आपको इस पर गर्व है? ra

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