पंखों वाले घोड़े पर सरकार

‘पेगासस इजराइल के एनएसओ समूह का एक सॉफ्टवेयर है, जो अब भारत सरकार की सेवा कर रहा है और जब जरूरत पड़े (जो कि आजकल अक्सर होता है) तब यह किसी की भी गिरफ्तारी और हिरासत के लिए सरकार की असाधारण शक्ति बन सकता है।’

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प्रशांत भूषण ने पेगासस मामले को लेकर केंद्र सरकार हमला बोला है। Photo Source- Indian Express

एक मंत्री अपने पद की शपथ लेता है कि वह बिना किसी भय या पक्षपात, द्वेष या अनुराग के अपना काम करेगा। यहां तक तो ठीक है। पर क्या इसमें सच कहने, पूर्ण रूप से सच कहने और सच के सिवाय कुछ नहीं (जैसा कि अदालत के कानून में गवाह के लिए है) कहने का वादा है? स्पष्ट रूप से नहीं। सच के अपने कई रूप होते हैं और वे सार्स कोरोना विषाणु-2 की तरह बदलते रह सकते हैं। एक सच होता है, सच के एक से लेकर पचासों रंग होते हैं। एक पूर्ण सत्य होता है और एक वैकल्पिक सच होता है। मेरा मानना है कि एक मंत्री इनमें से मौके को देखते हुए ही सच का चुनाव करता है।

एक नए मंत्री ने अपने पहले भाषण में ठीक ऐसा ही किया। राजनीतिक नेताओं, जजों, पत्रकारों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों, कारोबारियों और चुनिंदा लोगों के खास दोस्तों की जासूसी का जैसे ही धमाका हुआ तो यह रहस्योद्घाटन हुआ कि हजारों मोबाइल फोन धारकों को ‘लक्षित लोगों’ की सूची में डाला गया था। इन हजारों में से सैकड़ों मोबाइल फोनों में जासूसी करने वाला प्रोग्राम स्पाईवेयर घुस चुका था और पेगासस नाम के प्रोग्राम ने इन फोनों को अपने कब्जे में कर लिया था। चुनिंदा लोगों की इस सूची में ये मंत्री महोदय भी शामिल थे!

पौराणिक कथाओं में विचरण
(यहां मिथकों में थोड़ा-सा भटकाव गलत नहीं होगा। ग्रीक मिथकों में पेगासस पंखों वाला एक घोड़ा है, जो मेडुसा के खून से उत्पन्न हुआ था। यह जेउस का सेवक बन गया और जब जरूरत होती वह उसमें तूफान और बिजली पैदा कर देता। पेगासस एक रहस्यमय प्राणी है, जो सब कुछ करने में सक्षम है, दैवीय प्रेरणा का प्रतीक है, स्वर्ग की यात्रा है। यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे मोदी है तो मुमकिन है नारा)

पेगासस इजराइल के एनएसओ समूह का एक सॉफ्टवेयर है, जो अब भारत सरकार की सेवा कर रहा है और जब जरूरत पड़े (जो कि आजकल अक्सर होता है) तब यह किसी की भी गिरफ्तारी और हिरासत के लिए सरकार की असाधारण शक्ति बन सकता है। यह ‘अच्छे दिन’ की यात्रा के लिए रास्ता भी बताता है।

कहीं से भी शायद कोई उदारता या क्षमा दिखाते हुए मंत्री जासूसी के आरोपों पर सरकार के बचाव में उठ खड़े हुए। उनके इस रक्षात्मक रुख का अनुमान पहले से था। उन्होंने कहा कि अगर कोई हमें तर्क के नजरिए से देखता है, तो कोई गैरकानूनी निगरानी नहीं हुई। यह ऐसा बचाव था, जिसकी आइआइटी कानपुर और व्हार्टन बिजनेस स्कूल के एक पूर्व छात्र से कोई भी उम्मीद कर सकता है। ऐसे साफ-सुथरे तर्क का खंडन कर पाना मुश्किल है।

हालांकि औसत शिक्षा वाला आम नागरिक ऐसे तर्कों को नहीं समझता। वह तो सीधे-सीधे इस सवाल का जवाब चाहता है कि पेगासस का इस्तेमाल कर क्या अधिकृत रूप से निगरानी की गई थी? निश्चित रूप से मंत्री कानूनी और गैरकानूनी निगरानी का फर्क जानते हैं। वे इन कुछ बुनियादी सवालों का जवाब तलाश कर नागरिकों के सवाल का जवाब दे सकते हैं।

साधारण-से सवाल
– क्या कोई सबूत है कि भारत में मोबाइल फोनों में पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर ने सेंध लगाई थी?
– क्या सरकार या इसकी किसी एजेंसी ने पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर हासिल किया था?
– इस सॉफ्टवेयर को लेने के लिए कितना भुगतान किया गया और हर फोन में डालने के लिए कितने पैसे दिए गए? (बताई गई दरें बहुत ज्यादा होती हैं, लेकिन अगर थोक में लें तो रियायत मिल जाती है।)

– क्या फोरेंसिक जांच के लिए मंत्री महोदय अपना फोन (जो संबंधित अवधि में इस्तेमाल कर रहे थे) देने की पेशकश करेंगे, ताकि यह पता चल सके कि कहीं उनके फोन में तो सेंध नहीं लगी?
एक और दिलचस्प पहलू है। मंत्री ने एनएसओ समूह के खंडन का भी हवाला दिया कि ‘ऐसी सेवाएं बाजार में किसी के लिए भी, कहीं भी और किसी भी वक्त उपलब्ध हैं और पूरी दुनिया में सरकारी एजेंसियों और निजी कंपनियों द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं।’ एनएसओ समूह ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘अपनी तकनीक पूरी तरह से जांची-परखी सरकारों की कानून प्रवर्तन और खुफिया एजेंसियों को ही बेचता है।’ एनएसओ समूह के बयान में उपलब्ध सेवाओं का जो संदर्भ है वह एचएलआर लुकअप सेवाओं से है, पेगासस से नहीं। चाहे जो भी हो, अगर पेगासस सिर्फ जांची-परखी सरकारों को बेचा जाता है, तो साधारण-सा सवाल यह है कि क्या भारत सरकार ऐसी जांची-परखी सरकार थी?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नए मंत्री को अपनी पारी की शुरुआत मुश्किल विकेट के साथ करनी पड़ी है। लेकिन फ्रांस और इजराइल अपने नतीजे निकालें और हमारे साथ साझा करें, उससे पहले ही मंत्री को जवाब मुहैया कराने चाहिए। राष्ट्रपति मैक्रों की संदिग्ध जासूसी के लिए फ्रांस की सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं और एनएसओ समूह के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए इजराइल सरकार ने आयोग की नियुक्ति कर दी है।

क्या निजता का मूल्य है?
मेरे पास उकसाने वाला एक सुझाव है। आत्मनिर्भरता के इन दिनों में यह कुछ कुछ निराश करने वाली बात है कि भारत सरकार ने अश्वमेध यज्ञ करने वाले प्राचीन भारत के राजाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले घोड़ों के नाम वाले किसी सॉफ्टवेयर के बजाय पेगासस को चुना। सरकार बीजक नाम वाले जासूसी सॉफ्टवेयर की तलाश कर सकती थी। बीजक घोड़े का जिक्र गुजराती कवि और नाटककार चीनू मोदी के नाटक अश्वमेध में है। या पुरुकुत्स, कुमारविष्णु, समुद्रगुप्त, पुलकेशिन द्वितीय और राजराजा चोल से प्रेरणा लेकर अश्वमेध यज्ञ के लिए मोदी सरकार ऐसा सफेद शक्तिशाली घोड़ा तलाश सकती थी, इस घोड़े को अपने योद्धा-भक्तों के साथ सारे राज्यों में भेजती और संपूर्ण भारत में अपनी पार्टी की प्रभुसत्ता स्थापित करती। तब सत्तारूढ़ पार्टी हर पांच साल में होने वाली चुनावों की छिटपुट परेशानियों से बच सकती थी और पूरे देश पर अपनी सत्ता कायम कर सकती थी।

जासूसी पर पूछे जाने वाले सवालों को राष्ट्र-विरोधी, विदेशी ताकतें और वाम संगठनों की अंतरराष्ट्रीय साजिश बता कर कड़ी आलोचना करते हुए इसका प्रतिकार किया जा सकता है। जासूसी को देशभक्ति के कर्तव्य तक लाया जा सकता है। और अगर सरकार द्वारा जासूसी को न्यायोचित ठहराने वालों की तादाद पर्याप्त है, तो निजता के अधिकार को भी खत्म किया जाए, तब भारत को आतंक का राज्य बनने से कौन रोक सकता है?

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