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संप्रभु, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक

जेपी नड्डा का हालिया बयान कि ‘केवल भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में छोड़ कर छोटे दल गायब हो जाएंगे’ सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से अधिक है। यह एक ऐसा विचार है, जिसे भाजपा की नर्सरी में सावधानीपूर्वक पोषित किया जाता है।

संप्रभु, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक
संसद भवन परिसर में विरोध जताते विपक्षी सांसद। (एक्सप्रेस फोटो)

पाठकों के जेहन में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में दिए गए तीन शब्द- संप्रभु, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक सदा बने रहते हैं। इन्हीं तीन शब्दों से एक आधुनिक गणराज्य के पारिभाषिक गुण प्रकट होते हैं। ऐसे ही गणतंत्र की स्थापना के लिए भारत ने 15 अगस्त, 1947 को अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की थी। कल देश आजादी की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाएगा। मुझे यकीन है कि राष्ट्र सौवीं वर्षगांठ और कई अन्य वर्षगांठें मनाने के लिए मौजूद रहेगा। मगर मैं यह सवाल बड़ी घबराहट के साथ पूछना चाहता हूं कि क्या 2047 में गणतंत्र संप्रभु, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक रह पाएगा?

कहां की संप्रभुता?

सदियों से, भारत के अधिकांश हिस्से केवल इस अर्थ में संप्रभु थे कि उन पर विदेशी राजाओं और रानियों का शासन नहीं था। राज्य ‘संप्रभु’ था, लेकिन लोग नहीं थे। कई शासक निरंकुश, अक्षम थे और उन्होंने लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं किया। एक गणतांत्रिक संविधान के तहत, केवल राज्य संप्रभु नहीं होता, लोग भी संप्रभु होते हैं। शासकों को बदलने की शक्ति संप्रभु लोगों की पहचान होती है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोगों का संप्रभु अधिकार है। हालांकि, हाल के कुछ वर्षों में इस अधिकार को जैसे बादलों ने ढंक लिया है।

आजकल चुनाव बड़े पैमाने पर पैसे से तय होते हैं और भारतीय जनता पार्टी के पास सबसे ज्यादा पैसा है। वास्तव में, भाजपा सरकार ने राजनीतिक दलों को दान में मिले धन का लगभग पंचानबे प्रतिशत हासिल करने के लिए एक शैतानी, चतुर और अपारदर्शी साधन (इलेक्टोरल बांड) का आविष्कार किया। चुनाव जीतने के लिए भाजपा के पास अन्य साधन भी हैं- मीडिया को वश में कर लिया गया है, संस्थानों पर कब्जा कर लिया गया है, कानूनों का अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाने लगा है और एजेंसियां को बहला-फुसला कर अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

और अगर भाजपा कहीं चुनाव हार जाती है, तो उसके पास ‘आपरेशन लोटस’ नामक अंतिम हथियार है, जिसे उसने बेशर्मी से गोवा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में इस्तेमाल किया और राजस्थान में प्रयास करती रही है।

क्या हम उस मुकाम पर पहुंच जाएंगे, जब चुनाव स्वतंत्र या निष्पक्ष नहीं रह जाएंगे? मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा। मगर उस खतरे से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता। कांग्रेस मुक्त भारत केवल कांग्रेस को निशाना बनाने वाली गोली नहीं है। जेपी नड्डा का हालिया बयान कि ‘केवल भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में छोड़ कर छोटे दल गायब हो जाएंगे’ सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से अधिक है। यह एक ऐसा विचार है, जिसे भाजपा की नर्सरी में सावधानीपूर्वक पोषित किया जाता है।

लोग एक झटके में अपनी संप्रभुता नहीं खोएंगे। यह धीमा जहर के फैलने जैसा होगा। क्षरण की शुरुआत थोड़ी-थोड़ी करके, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, बोलने और लिखने की स्वतंत्रता, असहमति का अधिकार, विरोध करने का अधिकार, निजता, यात्रा करने की स्वतंत्रता और अंतत: भय से मुक्ति से होगी। अपने आप से पूछिए कि भारत किस दिशा में जा रहा है?

कहां है पंथनिरपेक्षता?

भारत कुछ वर्षों में दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश हो जाएगा और जनसंख्या एक सौ साठ करोड़ तक पहुंच जाएगी। चूंकि प्रजनन दर बढ़ रही है, जनसंख्या की धार्मिक संरचना वर्तमान अनुपात से उल्लेखनीय रूप से नहीं बदलेगी: हिंदू 78.4 प्रतिशत, मुसलिम 14.4, ईसाई 2.2, सिख 1.7 और अन्य 3.3 प्रतिशत। दो हजार वर्षों तक भारत एक बहुल देश था और आज, भारत एक बहुल देश है, लेकिन हम अपने बहुलवाद को तेजी से नकारने में लगे हुए हैं।

इसके विपरीत, यूएस, कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड, दूसरों के बीच, अपने बहुल समाज होने के बड़े लाभों को गर्व से स्वीकार करते हैं। अदालतों, मीडिया और विश्वविद्यालयों सहित उनके संस्थान सक्रिय रूप से अपने रैंक में विविधता की तलाश करते और उसे बढ़ावा देते हैं। वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट में मुसलिम और ईसाई समुदायों में से एक-एक माननीय न्यायाधीश हैं और सिखों में से कोई भी नहीं है। ऐसी आशंका है कि पदधारी के सेवानिवृत्त होने तक किसी अन्य मुसलिम या ईसाई न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं की जाएगी।

आप खुद से पूछें, क्या भारत पंथनिरपेक्ष के अलावा और कुछ भी हो सकता है? अपने संगीत, साहित्य, सिनेमा, खेल, विज्ञान, चिकित्सा, कानून, शिक्षण संस्थान और सिविल सेवाओं में से अगर हम मुसलमानों और ईसाइयों को बाहर कर दें, तो ये और खराब हो जाएंगी। भाजपा और आरएसएस के नेताओं ने पंथनिरपेक्षता को बदनाम किया है। उन्होंने इसे ‘तुष्टिकरण’ कहा, और जम्मू-कश्मीर, चुनावी प्रतिनिधित्व, आरक्षण, भाषा, भोजन की आदतों, पहनावे और व्यक्तिगत कानून पर उनके दृष्टिकोण और नीति को विकृत कर दिया है।

पंथनिरपेक्षता की मृत्यु और एक हिंदू राष्ट्र (राष्ट्र) की घोषणा भारत के विचार के लिए एक बड़ा झटका होगी और लोकतंत्र की मृत्यु को तेज कर सकती है। अधिकांश भारतीय ऐसे परिणाम की कामना नहीं करते, लेकिन भाजपा समर्थकों का भारी बहुमत हिंदू राष्ट्र चाहता है। जब एक अप्रतिरोध्य बल (हिंदुत्व विश्वासी) एक अचल धड़े (उदार और सहिष्णु भारतीय) से मिलता है, तो मुझे नहीं पता कि कौन प्रबल होगा।

लोकतंत्र कहां?

लोकतंत्र का मतलब सिर्फ हर पांच साल में एक बार मतदान कराना नहीं होता। संवाद, चर्चा, वाद-विवाद और असहमति के माध्यम से हर दिन लोकतंत्र का अभ्यास करना होता है। उस मानक के अनुसार, भारत में लोकतंत्र सांस के लिए हांफ रहा है। वर्ष में ऐसे कम दिन होते हैं, जब संसद और विधानसभाओं की बैठकें होती हैं।

स्वीडन स्थित वी-डेम इंस्टीट्यूट ने भारत को ‘चुनावी निरंकुश’ कहा और डेमोक्रेसी इंडेक्स 2021 में भारत की रैंक को तिरपन तक कम कर दिया। हर क्षेत्रीय दल अपने गृह-राज्य में अपनी जगह बचाने के लिए लड़ता है, लेकिन अन्य राज्यों के क्षेत्रीय दल उनकी जगह की रक्षा करने या भाजपा के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों की मदद करने को अनिच्छुक दिखते हैं।

यह एक दुस्वप्न जैसा लगता है, पर हम एकदलीय प्रणाली के उद्भव से इनकार नहीं कर सकते (जैसा कि नड्डा भक्तिपूर्वक चाहते हैं)। उनकी पार्टी दावा करेगी कि हम एक लोकतंत्र हैं, लेकिन क्या उसमें भारतीय विशेषताएं होंगी! कल, जब आप तिरंगे को सलाम करेंगे, तो कृपया इसके डिजाइनर, पिंगली वेंकैया को याद करें, और यह कि वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में, तिरंगा संप्रभुता, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करता है।

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