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जिम्मेदारी लें, सलाह करें और योजनाएं बनाएं

सरकार को योजना बनाने के लिए दुश्मनी को मिटा देना चाहिए और एक ऐसे समर्पित समूह की स्थापना करनी चाहिए जो अप्रत्याशित घटनाओं का अनुमान लगा कर किसी भी तरह के हालात से निपटने के लिए योजनाएं बना सके।

कोरोना वायरस के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए सड़क पर आर्ट बनाते हुए युवक। (फोटोः पीटीआई)

टीकाकरण का गड़बड़झाला इतिहास में अपने निशान छोड़ चुका है। सात जून को टेलीविजन पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो गलतियों को सुधारा। मुझे लगता है कि गलतियों को स्वीकारने का यह उनका अपना तरीका है। राज्य सरकारों और विपक्ष को अपनी तरफ से आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमें गड़बड़ियां दूर करते हुए उन लक्ष्यों को हासिल करना चाहिए, जो महामारी और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने तय किए हैं। हालांकि पिछले पंद्रह महीनों में जो गलतियां की गई हैं, उन पर गौर फरमाना जरूरी होगा।

भूल-चूक
1- केंद्र सरकार यह मान बैठी थी कि विषाणु की पहली लहर सिर्फ लहर ही होगी और घरेलू आपूर्ति से ही धीरे-धीरे टीकाकरण करके इससे निपट लिया जाएगा। इसने दूसरी लहर की चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। फिर, इसने पूर्णरूप से तेजी से टीकाकरण की जरूरत को भी नहीं समझा।
2- सरकार दो देशी निर्माताओं और उनके मुनाफे की सुरक्षा को लेकर जरूरत से ज्यादा ही उत्साह दिखाती रही। दूसरे टीकों को आपात इस्तेमाल की मंजूरी देने के मामले में हीलाहवाली करती रही और उनके उत्पादकों को भारत में मंजूरी के लिए आवेदन करने को लेकर तेजी से हतोत्साहित भी किया गया (उदाहरण के लिए फाइजर को)।

3- सरकार ने पहला आर्डर सीरम इंस्टीट्यूट को 11 जनवरी, 2021 को दिया था। जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप और जापान टीका निर्माता कंपनियों को मई-जून, 2020 में ही ऑर्डर दे चुके थे। फिर जो आर्डर दिया, वह केवल एक करोड़ दस लाख खुराक का ही था। भारत बायोटेक को आर्डर बाद में दिया गया, जिसकी तारीख और मात्रा के बारे में पता नहीं है।

4- पूंजी अनुदान या सरकारी अनुदान की सीरम की मांग के बावजूद दोनों देशी निर्माताओं को आपूर्ति के लिए कोई अग्रिम भुगतान नहीं किया गया। सीरम को तीन हजार करोड़ और भारत बायोटेक को डेढ़ हजार करोड़ रुपए के अग्रिम भुगतान की मंजूरी 19 अप्रैल, 2021 को दी गई।

5- सरकार इस बात का सटीक अनुमान ही नहीं लगा पाई कि दोनों देशी कंपनियां 2020 और 2021 में हर महीने के हिसाब से कितना उत्पादन कर पाएंगी, न ही उसने इन कंपनियों पर उत्पादन बढ़ाने के लिए दबाव बनाया।

बिना विमर्श की नीति
6- सरकार ने राज्य सरकारों से बिना कोई सलाह-मशविरा किए एकतरफा टीकाकरण नीति बना ली और लागू कर दी। सुप्रीम कोर्ट भी टीकाकरण नीति को मनमानी और बेतुकी करार दे चुका है।

7- केंद्र सरकार ने टीकों को हासिल करने की व्यवस्था का विकेंद्रीकरण कर दिया और अठारह से चौवालीस साल वाले वर्ग के टीकाकरण का बोझ राज्यों पर डाल दिया। जो भी या जिसने भी इस विकेंद्रीकरण की व्यवस्था के लिए प्रेरित किया, यह भारी गलती थी। जैसे कि पहले ही पता था, राज्य सरकारों की बोली में कोई कंपनी नहीं आई। टीकों को हासिल करने को लेकर भारी गफलत पैदा हो गई।

8- केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों के लिए टीकों के अलग-अलग दाम तय करके सरकार ने भारी गलती की है। दामों में इस भारी अंतर का नतीजा यह हुआ कि निजी अस्पतालों को टीकों की आपूर्ति सरकारी अस्पतालों की कीमत पर हो रही है और इससे सरकारी अस्पतालों में टीकों की कमी हो गई। टीकों की कमी के कारण ही कुछ राज्यों में टीकाकरण बंद कर दिया गया है। अब भी विवाद इसलिए बना हुआ है क्योंकि सरकार ने निजी अस्पतालों को कोविशील्ड के लिए सात सौ अस्सी, स्पूतनिक के लिए एक हजार एक सौ पैंतालीस और कोवैक्सीन के लिए एक हजार चार सौ दस रुपए प्रति खुराक के हिसाब से दाम तय कर दिए हैं।

9- पंजीकरण और टीकाकरण के लिए कोविन ऐप का सरकार का आग्रह भेदभाव भरा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कोविन ऐप के आग्रह ने डिजिटल खाई पैदा कर दी है और यह भेदभावपूर्ण है।

हम इन गलतियों को एक तरफ रख देते हैं। टीकों के उत्पादन और आपूर्ति में सुधार हुआ है। रूसी टीके स्पूतनिक से मदद मिली है। छह जून से शुरू हुए सप्ताह में टीकाकरण की औसत संख्या भी तीस से चौंतीस लाख रोजाना तक पहुंच गई है। लेकिन इस रफ्तार से भी इस साल के बाकी बचे दिनों में सिर्फ साठ करोड़ लोगों का टीकाकरण हो पाएगा। नब्बे से सौ करोड़ वयस्कों को टीके की दोनों खुराक देने का लक्ष्य इससे तो पूरा नहीं होने वाला। पांच करोड़ से कम वयस्कों को ही टीके की दोनों खुराकें मिली हैं।

यह रॉकेट विज्ञान नहीं
जून 2021 के पहले केंद्र सरकार को अगले कदम पूरे कर लेने चाहिए। मैं इनकी सूची यहां दे रहा हूं-
1- जुलाई से दिसंबर से बीच हर देशी टीका निर्माता (दो या तीन या और ज्यादा) के उत्पादन कार्यक्रम का मासिक आधार पर पुख्ता खाका तैयार किया जाए। स्पूतनिक का आयात बढ़ाया जाए। जिसे भी टीका बनाने का लाइसेंस दिया जाए, चाहे अनुबंध पर हो या अनिवार्य रूप से, उसका हर महीने का उत्पादन कितना होगा, यह तय हो।

2- विश्व स्वास्थ्य संगठन से मंजूर फाइजर, बायोएनटेक, मॉडर्ना, जॉनसन एंड जॉनसन और सिनोफार्म के टीकों के लिए तत्काल ऑर्डर दिए जाएं। इन्हें अग्रिम भुगतान किया जाए और समय पर आपूर्ति का अनुबंध हो। कुल आपूर्ति के लिए इनकी संख्या बढ़ाई जाए।

3- टीकों को खरीदने की पूरी जिम्मेदारी ली जाए (सात जून को प्रधानमंत्री पचहत्तर फीसद टीकों की खरीद पर सहमत हुए) और हर राज्य को उसकी जरूरत और टीकाकरण की रफ्तार के हिसाब से टीकों का वितरण किया जाए। सरकार और निजी अस्पतालों के बीच टीकों के आबंटन को लेकर राज्यों को पूरी तरह से छूट दे दी जानी चाहिए।

4- चूंकि जरूरत के मुकाबले टीकों की उपलब्धता में कमी की संभावना है, ऐसे में सरकार को सार्वजनिक रूप से यह एलान करना चाहिए कि इस कमी को दूर करने के लिए वह क्या कर रही है। अगर दिसंबर 2021 के पहले यह कमी दूर नहीं हो पाती है तो फिर केंद्र को चाहिए कि वह राज्यों के साथ सलाह-मशविरा कर टीकाकरण की प्राथमिकता को नए सिरे से तय करे।

5- केंद्र और राज्य सरकारों को अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या सहित स्वास्थ्य ढांचे को निरंतर बेहतर बनाए रखना चाहिए।
ये पांचों कदम कोई रॉकेट विज्ञान नहीं हैं। इनके लिए योजना की जरूरत है। योजना आयोग को खत्म कर दिए जाने के बाद तो मोदी सरकार इसके लिए अभिशप्त दिखती है। लेकिन दूसरे देश तो अपना काम किए जा रहे हैं। सरकार को योजना बनाने के लिए दुश्मनी को मिटा देना चाहिए और एक ऐसे समर्पित समूह की स्थापना करनी चाहिए जो अप्रत्याशित घटनाओं का अनुमान लगा कर किसी भी तरह के हालात से निपटने के लिए योजनाएं बना सके। अब हमें देखना यह है कि केंद्र सरकार अपने सामने इस चुनौती भरे काम को कैसे पूरा करती है।

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