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अब कम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव

चुनाव आयोग का जो सबसे ज्यादा खराब काम रहा, वह पश्चिम बंगाल में चुनाव कार्यक्रम को आठ चरणों और तैंतीस दिन में फैला देने का रहा। तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी की कुल चार सौ चार सीटों का चुनाव एक दिन में छह अप्रैल को हो सकता है। तो फिर पश्चिम बंगाल की दो सौ चौरानवे सीटों के लिए आठ दिन की जरूरत क्यों पड़ी? संदेह यह है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए और ज्यादा दिन दे सकें।

stateसांकेतिक फोटो।

मैंने 1977 में पहली बार जब चुनाव प्रचार किया था, तब स्थिति इतनी खराब नहीं थी। उस चुनाव में कुछ अप्रिय चीजें थीं, लेकिन उतनी खराब नहीं जितनी आज हम देख रहे हैं। साल 1977 था और राज्य तमिलनाडु। इंदिरा गांधी ने चुनाव करवाए थे, आपातकाल में बंदी बनाए गए नेताओं को रिहा कर दिया गया था और फिर से उठ खड़े हुए विपक्ष का सामना किया था। 1972 में एमजी रामचंद्रन ने द्रमुक से अलग होकर अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक बनाई थी और लोकसभा का निर्णायक उपचुनाव जीता था और लोकप्रियता व चापलूसी की अप्रत्याशित लहर उनके पक्ष में थी। कांग्रेस (आइ) ने अन्नाद्रमुक के साथ हाथ मिलाया था और द्रमुक का सामना किया था जो आपातकाल का विरोध करने वालों में सबसे आगे थी। ज्यादातर लोगों को हैरानी में डालते हुए जो आपातकाल विरोधी लहर उत्तर भारत में फैली थी, वह विंध्य क्षेत्र को पार नहीं कर सकी।

अच्छा और बुरा पक्ष
वह चुनाव शालीन, निष्पक्ष और स्वतंत्र था। चुनाव आयोग बेहद स्वतंत्र था। उदाहरण के लिए उसने अन्नाद्रमुक के सभी उम्मीदवारों को साझा चुनाव चिह्न आवंटित करने के तर्क को मान लिया (हालांकि यह मान्यता प्राप्त पार्टी नहीं थी और सिर्फ एक ही उपचुनाव जीता था)। चुनाव प्रचार, पोस्टरों, परचों और सभाओं के लिए उम्मीदवारों ने गाड़ियों पर पैसा खर्च किया और इसके अलावा कुछ नहीं। यह सही मायने में वोटों के लिए अभियान और प्रचार था। मतदाताओं को घूस देने की अफवाह तक नहीं थी। बुरा पक्ष यह था कि चुनावों में प्रमुख जातियां हावी थीं, सामान्यतौर पर जमींदारों का वर्ग। बेहद गरीब, दलित और आदिवासियों के सामने बहुत ही कम विकल्प थे, लेकिन प्रमुख जातियों और जमीदारों की मर्जी से ही वोट पड़े। अल्पसंख्यक चुप थे, लेकिन भयभीत नहीं और अपने समुदाय के नेताओं के कहे अनुसार ही उन्होंने वोट दिया था। वैधानिक रूप से यह स्वतंत्र चुनाव था लेकिन वैसा निष्पक्ष नहीं जैसा कि एक सच्चे लोकतंत्र में होना चाहिए।

तेजी से 2021 पर आते हैं। चुनाव निश्चित रूप से ज्यादा लोकतांत्रिक इस मायने में हैं कि लोगों के किसी भी वर्ग को किसी भी दूसरे वर्ग का खौफ नहीं है। जाति महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, पर उतनी नहीं जितनी कि पहले करती थी। वर्ग व्यापक रूप से अप्रासंगिक हो चुका है, गरीबों को अमीरों का कोई डर नहीं है और वह स्वतंत्र होकर मतदान करता है।

तकलीफदेह प्रवृत्तियां
नई बुराइयों में धन और व्यापक स्तर पर यह धारणा बन जाना है कि चुनाव आयोग की सही मायने में अब कोई स्वतंत्रता नहीं रह गई है। दोनों लोकतंत्र के लिए गहरा आघात हैं। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु में चुनाव आयोग पैसे के वितरण को रोक पाने में नाकाम रहा। हर मतदाता को पैसा दिया जाता है और वह उसे लेता है।

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की हर रैली पर भारी पैसा खर्च हो रहा है। विशालकाय मंच बन रहे हैं, एलईडी स्क्रीन लगे हैं, लोगों को रैली में लाने के लिए सैकड़ों गाड़ियां किराए पर ली जा रही हैं और उन लोगों को पैसा और खाना भी दिया जा रहा है। विज्ञापनों, सोशल मीडिया, लघु संदेशों, फोन कॉल और पेडन्यूज (जिसे पैकेज कहा गया है) पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। कोई भी इससे इंकार नहीं करता कि राजनीतिक दल करोड़ों रुपए फूंक रहे हैं, लेकिन पार्टी या उम्मीदवार के खर्च या प्राप्ति में यह कहीं नहीं दिखाया जाता।
वोट मांगने के लिए प्रचार और संपर्क के पुराने तरीके अब गायब हो गए हैं। मुझे नहीं लगता कि ऐसा फिर कभी होगा। चुनाव अब लोकतंत्र का उत्सव नहीं रह गया है, बल्कि मंच का आयोजन बन गया है।

दूसरी दुखदायी बात चुनाव आयोग के संदिग्ध झुकाव की है। मैं मतदान केंद्रों में तैनात पीठासीन अधिकारियों, ईवीएम और वीवीपैट का रखरखाव करने वाले तकनीशियनों और मतदान के दिन मतगणना अधिकारियों के काम और ईमानदारी की तारीफ करूंगा। हालांकि चुनाव आयोग ने सामान्य जिम्मेदारियों और नियंत्रण का जिस तरह से निर्वाह किया, उसे लेकर मुझे गंभीर आपत्तियां हैं।

पैमाने झुक गए हैं
बिना विचारे बोलने और आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए द्रमुक के ए राजा पर अड़तालीस घंटे तक चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन भाजपा के हेमंत बिस्वा सरमा जिन्होंने राजा जैसी ही आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं, उनके प्रतिबंध को अड़तालीस घंटे से घटा कर चौबीस घंटे कर दिया गया। क्यों?

ममता बनर्जी को चेताने और नोटिस जारी करने के लिए उनके हर भाषण को आधार बनाया गया और आखिरकार चौबीस घंटे तक के लिए चुनाव प्रचार करने पर पाबंदी लगा दी गई। क्या चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के भाषणों में कुछ गलत नहीं लगा? प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बारे में क्या कहा जाएगा कि अगर अल्पसंख्यकों से उनके वोट नहीं बंटने देने का आह्वान किया जा रहा है तो ऐसी स्थिति में बहुसंख्यकों को क्या करना चाहिए? दीदी ओ दीदी- जैसे चिड़ाने वाले सड़क छाप संवाद के बारे में क्या कहा जाएगा? क्या यही तरीका है जिसमें किसी प्रधानमंत्री को एक मुख्यमंत्री के लिए ऐसी भाषा इस्तेमाल करनी चाहिए? मैं सोच भी नहीं सकता कि जवाहरलाल नेहरू या मोरारजी देसाई या वाजपेयी ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया होगा।

चुनाव आयोग का जो सबसे ज्यादा खराब काम रहा, वह पश्चिम बंगाल में चुनाव कार्यक्रम को आठ चरणों और तैंतीस दिन में फैला देने का रहा। तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी की कुल चार सौ चार सीटों का चुनाव एक दिन में छह अप्रैल को हो सकता है। तो फिर पश्चिम बंगाल की दो सौ चौरानवे सीटों के लिए आठ दिन की जरूरत क्यों पड़ी? संदेह यह है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए और ज्यादा दिन दे सकें।

चुनाव आयोग को एक टीएन शेषन की जरूरत है। उन्हें एक जिद्दी और साहसी व्यक्ति कहा जाता था। लेकिन वे ऐसे साहसी थे जो अपने आकाओं से न कभी डरे, न उन्हें उपकृत किया। फिर भी मैं चुनाव आयोग को संदेह का लाभ दूंगा। लेकिन अब से दो मई के बीच चुनाव आयोग का आचरण कैसा रहता है, यह देखना होगा।

लोकतंत्र का बच पाना लोगों की इच्छाशक्ति के खुले उपयोग पर निर्भर करता है। लोगों की यह इच्छाशक्ति कितनी आजादी के साथ प्रयोग में आ पाती है, यह चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर निर्भर करता है।

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