गायब नौकरियों की हकीकत

लोगों के पास नौकरियां और आमद होनी चाहिए। कोई भी आर्थिक ‘सुधार’ जिसमें नौकरियों का स्तर अपने पुराने स्तर तक नहीं आ जाता और उस स्तर से आगे नहीं निकलता, तो वह सुधार लोगों के लिए बेमानी है। प्रौद्योगिकी, नई मशीनें, नए तरीके और कृत्रिम मेधा से वृद्धि तो ला सकते हैं, लेकिन अगर उस वृद्धि से पुरानी नौकरियां बहाल नहीं होतीं या नई नौकरियां नहीं बनतीं तो हमारे सामने विकट समस्या खड़ी हो जाएगी।

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सीएमआईई के डेटा के मुताबिक पिछले साल अप्रैल महीने में करीब 12.2 करोड़ भारतीयों की नौकरी छिन गई थी। (एक्सप्रेस फोटो: ताशी तोब्ग्यल)

सन 1947 के बाद से दस या इससे ज्यादा कर्मचारी रखने वाली भारतीय कंपनियों में रोजगार बढ़ा है? यह वही है, जिसे हम ‘एक बहुत आसान काम’ कहते हैं। जवाब है हां। संदर्भ वर्ष बदल कर 2013-14 कर लें। तब भी जवाब हां ही होगा, जब तक कि युद्ध, भुखमरी या प्राकृतिक आपदाओं की वजह से अर्थव्यवस्था तबाह नहीं हो जाती। अपने रास्ते जा रहा पानी का जहाज सामान्य स्थिति में आगे बढ़ता ही जाएगा, भले नियंत्रण करने वाला बहुत काबिल न हो।

असल सवाल यह नहीं है कि यूपीए सरकार के आखिरी साल 2013-14 से कुल रोजगार बढ़ा है या नहीं। भाजपा ने हर साल दो करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया था। सात साल में अर्थव्यवस्था के उनके ‘दक्ष’ प्रबंधन को संगठित और असंगठित क्षेत्र में चौदह करोड़ रोजगार पैदा करने चाहिए थे, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

कितनी नौकरियां?
कुछ दिन पहले श्रम और रोजगार मंत्रालय ने नौ क्षेत्रों में दस या इससे ज्यादा कर्मचारी रखने वाली कंपनियों के सर्वे की रिपोर्ट जारी की थी। नौ क्षेत्रों की ये कंपनियां संगठित क्षेत्र के कुल रोजगार का पचासी फीसद हिस्सा रखती हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2013-14 (छठी आर्थिक जनगणना) के दो करोड़ सैंतीस लाख रोजगार के मुकाबले यह आंकड़ा बढ़ कर तीन करोड़ आठ लाख हो गया है, यानी सात साल में इकहत्तर लाख रोजगार बढ़े।

दूसरे क्षेत्रों को शामिल कर लिया जाए तो यह आंकड़ा चौरासी लाख तक पहुंच जाएगा। लगता है रिपोर्ट में असंगठित क्षेत्र या कृषि क्षेत्र को शामिल नहीं किया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सबसे जोरदार वृद्धि बाईस फीसद (विनिर्माण) से लेकर अड़सठ फीसद (परिवहन) और आईटी-बीपीओ क्षेत्र में तो एक सौ बावन फीसद तक रही। लेकिन याद रखें, इन सबको मिला कर आकड़ा सिर्फ इकहत्तर लाख नौकरियों तक ही पहुंचा है!
जबसे सरकार ने श्रमिक सर्वे बंद किया है, तबसे हम दूसरे स्रोतों की ओर देखने को मजबूर हो गए हैं। सरकार के इन शब्दों ‘प्रमाण आधारित नीति निर्माण और सांख्यिकी आधारित क्रियान्वयन’ का हवाला देने के लिए आंकड़े जरूरी और महत्त्वपूर्ण हैं।

अन्य विश्वसनीय आंकड़े
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) ने रोजगार और बेरोजगारी पर जो आंकड़े इकट्ठे करके प्रकाशित किए हैं, वे सबसे भरोसेमंद हैं। सिंतबर के तीसरे हफ्ते के आखिर में महेश व्यास ने आंकड़ों के जरूरी नतीजों को संक्षिप्त रूप में सामने रखा।

सीएमआइई सही है, जब वह यह कहती है कि ‘कोविड-19 की पूर्णबंदी के बाद से भारत में सुधार तेज, आंशिक और थका देने वाला… रहा है’। थका देने वाला शब्द पर गौर करें। किसी भी तरह के सुधार, चाहे वह वी या फिर अन्य अक्षर के आकार वाला हो, में से गंभीर बिंदु उस वक्त गायब ही रहेंगे हैं जब तक कि हम कुल रोजगार के उस स्तर तक नहीं पहुंच जाते, जो 2019-20 में हासिल किया था और या फिर उस स्तर से ज्यादा तथाकथित सुधार एक भ्रम है।

लोगों के पास नौकरियां और आमद होनी चाहिए। कोई भी आर्थिक ‘सुधार’ जिसमें नौकरियों का स्तर अपने पुराने स्तर तक नहीं आ जाता और उस स्तर से आगे नहीं निकलता, तो वह सुधार लोगों के लिए बेमानी है। प्रौद्योगिकी, नई मशीनें, नए तरीके और कृत्रिम मेधा से वृद्धि तो ला सकते हैं, लेकिन अगर उस वृद्धि से पुरानी नौकरियां बहाल नहीं होतीं या नई नौकरियां नहीं बनतीं तो हमारे सामने विकट समस्या खड़ी हो जाएगी। सरकार ने जिद में आकर यह मानने से ही इनकार कर दिया है कि वास्तव में भारत के सामने ऐसी कोई समस्या है भी, समस्या से निपटने की बात तो दूर की है।

घटता श्रम बल, गिरती दर
श्रम बल में कमी आना दूसरी गंभीर समस्याओं का संकेत देता है। फरवरी 2020 की समान अवधि की तुलना में अगस्त 2021 में श्रम बल भागीदारी की दर (एलएफपीआर) और रोजगार की दर में उल्लेखनीय रूप से गिरावट आई है। तार्किक निष्कर्ष यह है कि बड़ी संख्या में लोग श्रम बाजार से बाहर हो गए हैं (यानी नौकरियां तलाशनी बंद कर दी हैं) और कामकाजी (कार्यरत) लोगों की संख्या में गिरावट आई है। जब तक ये दो अनुपात पलटते नहीं हैं, तब तक जीडीपी को तेजी से दुगना करने या जर्मनी या जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ने का कोई उपाय नहीं है।

सीएमआइई ने सितंबर 2020 से सितंबर 2021 के बीच कुल रोजगार में संचयी वृद्धि का भी हिसाब लगाया है और यह बहुत ही कम यानी चौवालीस हजार चार सौ तिरासी रही। नौकरियां चली गई थीं और जा रही हैं। नई नौकरियां सृजित हो रही हैं, लेकिन अगर बारह महीनों में कुल जमा चौवालीस हजार चार सौ तिरासी की ही बढ़ोतरी हुई है, तो इससे अर्थव्यवस्था के प्रबंधन और मंत्रियों तथा आर्थिक सलाहकारों के दिखावटी दावों के बारे में क्या पता चलता है? महेश व्यास का प्रासंगिकता के साथ मानना है कि यह सुधार प्रक्रिया की समयपूर्व थकान का संकेत है। यह गंभीर बात इसलिए है कि जब अतिरिक्त नौकरियों का सृजन रुक गया है वैसे में कामकाजी उम्र वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

अगर आंकड़ों का लिंग आधारित विश्लेषण करें या ग्रामीण बनाम शहरी के चश्मे से देखें या नौकरियों की गुणवत्ता के लिहाज से देखें, तो नतीजे और ज्यादा निराश करने वाले हैं। कृषि क्षेत्र तारणहार साबित हुआ है। मार्च 2020 से अगस्त 2021 के बीच इस क्षेत्र ने छियालीस लाख अतिरिक्त श्रमिकों को खपाया है, लेकिन इसी अवधि में ग्रामीण भारत में पैंसठ लाख गैर-कृषि रोजगार चले गए। लोग गैर-कृषि से कृषि से जुड़े रोजगार की तरफ आ गए। लेकिन यह सिर्फ बनावटी बेरोजगारी हो सकती है।

मैं कामना करता हूं कि अगली मन की बात में प्रधानमंत्री बेरोजगारी और नौकरियों के मुद्दे पर बोलेंगे। वे वित्त मंत्रालय की साफ-सुथरी और संक्षिप्त रिपोर्टों को एक तरफ कर दें और उन असल व्यक्तियों की बात करें, जिनकी नौकरियां चली गई हैं और वे नौजवान जो नौकरी की तलाश कर रहे हैं। वही उन्हें कड़वी सच्चाइयों से रूबरू करवा सकते हैं।

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