ज्यादा बड़ी विपत्ति

ज्यां द्रेज ने पंद्रह राज्यों के एक हजार तीन सौ बासठ परिवारों पर एक और अध्ययन किया, जिसमें यह सामने आया कि ग्रामीण भारत में आठ फीसद बच्चे ही थे, जिनकी पहुंच ऑनलाइन तक थी, जबकि कम से कम सैंतीस फीसद ने पढ़ाई छोड़ दी थी।

अस्‍पताल में उपचाराधीन कोविड के मरीज। फाइल फोटो।

कोविड-19 एक ऐसी अप्रत्याशित स्वास्थ्य आपदा थी और है, जिस पर इंसान या दुनिया की सरकारें थोड़ा ही काबू कर पाईं। विषाणु की उत्पत्ति के लिए किसी भी सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सरकारों को सिर्फ महामारी से निपटने में जैसे देश में महामारी के फैलाव, संक्रमितों और मौतों के आंकड़े, टीकाकरण कार्यक्रम और नागरिकों की मदद के मामले में सक्षमता या अक्षमता के लिए ही जिम्मेदार ठहरा सकते हैं।

मिलाजुला रिकार्ड
इस मामले में भारत दुनिया में बीच में आता है। विषाणु के प्रसार के मामले में यह लड़खड़ा गया था, पर बाद में सुधार आ गया, लोगों के सामाजिक व्यवहार में लापरवाही को संक्रमितों की संख्या बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, मौतों के आंकड़े को बुरी तरह से कम करके बताया गया, शुरुआती महीनों में टीकों की आपूर्ति और आबंटन के कारण ‘सभी वयस्कों का टीकाकरण’ कार्यक्रम दर्दनाक तरीके से धीमा पड़ गया था, लेकिन पिछले तीन हफ्तों में इसमें तेजी आती दिखी है, और जहां तक गरीबों को मदद की बात है तो सरकार की उपेक्षा क्रूर थी।

इन नतीजों को आंकड़ों या पैसे के लिहाज से मापा जा सकता है। हालांकि जो कुछ सामने दिख रहा है, उससे कहीं अलग ऐसा नतीजा भी सामने है, जिसे खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता। मैं इस नतीजे को एक ऐसी बड़ी विपत्ति कहूंगा, जिस पर कम ध्यान दिया गया। मैं हमारे स्कूली बच्चों की शिक्षा का जिक्र कर रहा हूं। बच्चों वाले शहरी परिवारों को पता है कि घरों में बच्चों को बंद रखना कितना चुनौती भरा है। पहले कुछ महीनों के बाद ग्रामीण परिवारों ने उन्हें गावों की सड़कों-गलियों में निकलने और खेतों में जाने की इजाजत दे दी थी। सारे परिवार बीमारी के खौफ में जकड़ गए थे। खौफ के पहले दौर में लोगों ने बच्चों के स्कूल न जाने पर खास चिंता नहीं की। लेकिन जैसे हफ्ते महीनों में और महीने साल में तब्दील होने लगे और जबरन स्कूल नहीं भेजने का सिलसिला दूसरे साल में प्रवेश कर गया तो परिवारों में घबराहट बढ़नी शुरू हो गई।

भारी कीमत चुकाई
उनका जो सबसे ज्यादा खौफ अपने बच्चों की शिक्षा या इसकी कमी को लेकर था, वह सही साबित हुआ। यह बताने के लिए आंकड़े हैं कि अठारह महीने तक जबरन स्कूलों को बंद रखने की देश ने भारी कीमत चुकाई है। शिक्षा की सालाना स्थिति (ग्रामीण) 2020 के बारे में एक फरवरी, 2021 को रिपोर्ट जारी की गई थी। यह ग्रामीण बच्चों में सीखने की क्षमता में कमी की याद दिलाती है, जिसका जिक्र 2018 की शिक्षा की स्थिति पर सालाना रिपोर्ट में किया गया था। जब स्कूल बंद कर दिए गए थे, तब पूर्णबंदी के प्रभाव की जांच की गई। अभिभावकों की शिक्षा, स्मार्टफोन से लेकर किताबों और सीखने की सामग्री की उपलब्धता आदि के बारे में आंकड़ों का विश्लेषण करने पर जो नतीजे सामने आए, वे इस प्रकार थे

  • कुल मिलाकर सिर्फ पैंतीस फीसद बच्चों ने अपने स्कूल से सीखने की सामग्री मिलने की बात कही,
  • बहत्तर फीसद बच्चों को सीखने की सामग्री सिर्फ वाट्सऐप से मिल रही थी। बच्चों का बड़ा वर्ग (पचपन फीसद) ऐसा था, जो गरीब परिवारों से आते थे, इसलिए उनके पास स्मार्टफोन नहीं था, ऐसे में सीखने की जो भी सामग्री दी जा रही थी, उस तक उनकी पहुंच सीमित रही होगी,
  • सीखने में हुए नुकसान को लेकर कराए गए विश्व बैंक के एक अध्ययन में सामने आया है कि अगर सात महीने स्कूलों को बंद रखा जाए तो बच्चे स्कूल में साल भर में जितना सीखते, उतना नुकसान हो जाएगा।
  • स्कूलों को बंद करने से सीखने का भारी नुकसान होगा, और जो बच्चे पहले ही से शिक्षा से वंचित हैं, उनके लिए यह और भारी होगा। इसका नतीजा यह होगा कि अमीर और गरीब बच्चों के बीच शिक्षा को लेकर भारी असमानता पैदा हो जाएगी।
  • जब भी स्कूल खुलेंगे तो सारे बच्चों को कुछ सुधार की जरूरत होगी।
    सुधारात्मक शिक्षा
    कर्नाटक, जिसे स्कूली शिक्षा प्रदान करने के मामले में बेहतर राज्यों में से एक माना जाता है, के चौबीस ग्रामीण जिलों में बच्चों के पढ़ने और गणितीय ज्ञान को लेकर एक सर्वे करवाया गया। इसके बहुत ही निराशाजनक नतीजे सामने आए-
  • 2018 से 2020 के बीच बच्चों के सीखने की क्षमता में भारी गिरावट आई,
  • पांचवीं कक्षा के बच्चों में छियालीस फीसद बच्चे ही थे, जो दूसरी कक्षा की किताब पढ़ पाने में सक्षम थे, लेकिन 2020 में यह अनुपात गिर कर 33.6 फीसद पर आ गया (सर्वे का तरीका पहली से आठवीं तक का वही था।)
  • इसी तरह 2018 में गणित में पांचवी कक्षा में सिर्फ 34.5 फीसद बच्चे ही घटाना और 20.5 फीसद भाग कर पाए। लेकिन 2020 में यही अनुपात गिर कर 32.1 और 12.1 फीसद पर आ गया। (सर्वे का तरीका पहली से आठवीं तक का वही था।)
    ज्यां द्रेज ने पंद्रह राज्यों के एक हजार तीन सौ बासठ परिवारों पर एक और अध्ययन किया, जिसमें यह सामने आया कि ग्रामीण भारत में आठ फीसद बच्चे ही थे, जिनकी पहुंच ऑनलाइन तक थी, जबकि कम से कम सैंतीस फीसद ने पढ़ाई छोड़ दी थी।
    अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन, जीवन रक्षक प्रणाली, दवाइयां, एंबुलेंस, अंतिम संस्कार के लिए जगह और टीकों की उपलब्धता को लेकर काफी बहस हो चुकी है। अदालतों ने सरकारों पर और ज्यादा कदम उठाने के लिए दबाव डाला। कई सरकारें सतर्क थीं और उन्होंने वाकई काफी कुछ किया भी। हालांकि दुर्भाग्यवश स्कूली बच्चों की शिक्षा के नुकसान और उनके सुधारात्मक उपायों पर देश भर में शायद ही बहस हुई और कोई कदम उठाए गए।
    तात्कालिक संकट से बेपरवाह सरकार ने शिक्षा में असमानता मिटाने का लक्ष्य हासिल करने के लिए नेशनल डिजिटल आर्किटेक्चर अभियान शुरू किया। प्रधानमंत्री शिक्षा प्रणाली को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी और नौजवानों को भविष्य के लिए तैयार करना चाहते हैं। वाकई ये शानदार लक्ष्य हैं और इरादा नेक है, लेकिन इसके पहले क्या हमें बच्चों को पहले पढ़ने और जोड़-घटाना सीखने के लिए तैयार नहीं करना चाहिए?
    तत्काल जरूरत सुधारात्मक शिक्षा की है। शिक्षकों को ज्यादा घंटों तक काम करने के लिए पैसा और प्रोत्साहन दिया जाए और बच्चों को शिक्षा के नुकसान से उबारा जाए। हर बच्चे को पूरी स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करने में होने वाला कोई भी खर्च बहुत ज्यादा नहीं है। प्रधानमंत्री ने जो बड़े वादे किए हैं, उनके लिए इंतजार किया जा सकता है, पर सरकार को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर पत्तल या थाली में रोटी, चावल और सब्जी तो हो।

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