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काम न कल्याण, सिर्फ दौलत

बजट का संदेश यही है कि बेहद गरीब तबके को कोई नगदी हस्तांतरण या मुफ्त राशन नहीं, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में कोई वृद्धि नहीं, बच्चों में कुपोषण या बौनेपन जैसी समस्याओं से लड़ने के लिए कुछ नहीं, पिछले दो सालों में स्कूली बच्चों की पढ़ाई का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए कुछ नहीं, मध्यवर्ग को कोई कर राहत नहीं और उपभोक्ताओं को कोई जीएसटी राहत नहीं।

Finance Secretary TV Somanathan
वित्त सचिव टीवी सोमनाथन और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (फोटो- @ANI)

जब से मैं समाजवाद के आदर्शवादी सपने से निकला हूं, मेरा मानना रहा है कि एक प्रगतिशील, खुशहाल और बहुलतावादी देश बनाने के लिए तीन प्रेरक शक्तियों की जरूरत होती है- रोजगार, कल्याण और संपत्ति। इनमें से कोई भी अन्य दो से कम या ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है।

निश्चित रूप से संदर्भ अलग होंगे। पिछले तीस सालों में हमने नाटकीय रूप से विभिन्न आर्थिक परिदृश्य देखे हैं- 1991 का आर्थिक संकट, 1997 में वैश्वीकरण, 2002-03 में सूखा, 2005-08 वैश्विक अर्थव्यवस्था में वृद्धि, 2008 में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट, 2012-13 (अमेरिकी बांड बाजार की हलचल), 2016-17 में नोटबंदी और सूखा और 2020-22 में महामारी और मंदी।

हरेक संदर्भ के लिए भिन्न और बारीकी से समझी-बूझी गई प्रतिक्रिया की जरूरत होगी, खासतौर से तब जब बजट पेश किया जा रहा हो। लेकिन काम, कल्याण और संपत्ति को बढ़ावा देने वाले बुनियादी दर्शन को बदला नहीं जाना चाहिए।

काम क्यों?
आज के इंसान (होमो सेपियन) अब सिर्फ शिकारी और भोजन जुटाने वाले नहीं रह गए हैं। जैसे-जैसे उनकी इच्छाएं और जरूरतें बढ़ीं, उन्होंने कामकाज की संस्कृति शुरू की। आधुनिक युग में रोजगार जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। एक विकासशील देश में एक महत्त्वपूर्ण संकेतक पंद्रह साल और इससे ऊपर के लोगों की संख्या होती है, जो कार्यबल को प्रदर्शित करती है।

कार्यबल में एलएफपीआर (कार्यबल भागीदारी दर) आबादी का वह अनुपात होता है, जो वर्तमान में कामकाजी है या रोजगार तलाश रही है। भारत में कार्यबल का मौजूदा आंकड़ा चौरानबे करोड़ है और एलएफपीआर साढ़े सैंतीस फीसद जो बावन करोड़ के बराबर है। (स्रोत- आर्थिक सर्वे, परिशिष्ट)

भारत जो युवाओं की आबादी वाला देश है और औसत आयु 28.43 साल है, जिस सबसे गंभीर आर्थिक चुनौती का सामना कर रहा है, वह बेरोजगारी है। नरेंद्र मोदी जब सत्ता पाने की कोशिश में थे, तब इसे समझ रहे थे। लेकिन बाद के सालों में लगता है उनका दर्शन बदल गया।

हर साल दो करोड़ रोजगार पैदा करने के उनके वादे ने नौजवानों में जोश भर दिया था। बाद में उन्होंने कहा कि पकौड़ा बेचना भी एक रोजगार है! पिछले सात सालों में बेरोजगारी बढ़ी है। महामारी और पूर्णबंदी ने बेरोजगारी और बढ़ा दी। लाखों लोगों का रोजगार चला गया, जिसमें वेतनभोगी और अस्थायी कामगार दोनों हैं।

स्वरोजगार जैसे दर्जी, बिजली मिस्त्री, प्लंबर आदि के कामंधंधे चौपट हो गए। ऐसे कामों में लगे लोगों में से तो कई फिर से काम शुरू नहीं कर पाए हैं। शहरी बेरोजगारी की दर आठ फीसद और ग्रामीण की छह फीसद है। इसके अलावा जो लोग काम पर लौटे, उन्हें वेतन कटौती जैसे संकट का सामना करना पड़ रहा है।

पिछले दो सालों में चौरासी फीसद परिवारों की आय घट गई है। इस पृष्ठभूमि में बजट में अगले पांच साल में साठ लाख रोजगार पैदा करने का वादा किया गया है। जहां हर साल बारह लाख नए रोजगार पैदा होंगे, वहीं हर साल कार्यबल में शामिल होने वालों का आंकड़ा साढ़े सैंतालीस लाख का होगा (स्रोत- लेबर ब्यूरो)। मेरा निष्कर्ष- बेरोजगारी बढ़ेगी, खासतौर से कम पढ़े-लिखे तबके में।

कल्याण क्यों?
कल्याण एक व्यापक अवधारणा है जिसमें आजीविका, नौकरी, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा तथा आराम और मनोरंजन आदि शामिल हैं। कल्याणकारी कदमों का मकसद इन चुनौतियों का रास्ता निकालना है।

उदाहरण के लिए, मनरेगा का उद्देश्य आजीविका की समस्या को हल करना है, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून भुखमरी के संकट से निपटने के लिए है, मुफ्त सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं और स्वास्थ्य बीमा का मकसद स्वास्थ्य देखभाल की चुनौती का हल निकालना है, शिक्षा का अधिकार का उद्देश्य शिक्षा की चुनौती से जुड़ा है, आदि। बजट ने क्या किया? आवंटन पर जरा गौर करें- कुल सबसिडी बिल में सत्ताईस फीसद तक की भारी कटौती कर दी गई है!

बजट का संदेश यही है कि बेहद गरीब तबके को कोई नगदी हस्तांतरण या मुफ्त राशन नहीं, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में कोई वृद्धि नहीं, बच्चों में कुपोषण या बौनेपन जैसी समस्याओं से लड़ने के लिए कुछ नहीं, पिछले दो सालों में स्कूली बच्चों की पढ़ाई का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए कुछ नहीं, मध्यवर्ग को कोई कर राहत नहीं और उपभोक्ताओं को कोई जीएसटी राहत नहीं। मेरा निष्कर्ष है- कल्याण की बात को तो हवा में उड़ा दिया गया है।

संपत्ति क्यों?
मैं संपत्ति सृजन का समर्थक हूं। संपत्ति नई पूंजी और फिर नए निवेश का स्रोत होती है। करों के बाद आय बढ़ने से संपत्ति बढ़ेगी। आय और संपत्ति दोनों ही निवेश बढ़ाने, जोखिम लेने, कुछ नया करने, शोध एवं विकास, दान और अन्य इस्तेमाल को बढ़ाने वाले होते हैं।

मेरा विरोध संपत्ति सृजन को लेकर नहीं है, बल्कि संपत्ति के संग्रह को लेकर है, जिसकी वजह से समाज में असमानता बढ़ती जा रही है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां असमानता सबसे ज्यादा है।

एक ऐसा बजट जो पूंजी आधारित निवेश, उन्नत विज्ञान और तकनीक, पूंजी को बाहर करने के लिए डिजिटलीकरण और परिष्कृत पारिस्थिकी, प्रौद्योगिकी और श्रम को ध्यान में रख कर बनाया गया हो, वह उन करोड़ों गरीबों के साथ मजाक है जिनको अपनी आजीविका के लिए रोजगार की जरूरत है।
अगर गरीबों की मदद के लिए और संसाधनों की जरूरत है तो उसके लिए सही रास्ता अमीरों की संपत्ति से संसाधन जुटाना होगा। भारत में एक सौ बयालीस लोग बेहद अमीर हैं, जिनकी संपत्ति तिरपन लाख करोड़ रुपए है, जिसका इस्तेमाल गरीबों के कल्याण के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रमों के लिए संसाधन जुटाने में हो सकता है।

मेरा निष्कर्ष है- यह पूंजीवादी बजट है, जिसमें गरीबों की अनदेखी कर दी गई है। मीडिया और संसद में चल रही बहस ने खास तबके और वंचित तबके के बीच चौड़ी होती खाई को सामने ला दिया है। पूंजी बाजार इस बजट को सलाम कर सकता है, लेकिन गरीब और मध्यवर्ग बजट बनाने वालों को माफ नहीं करेगा।

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