ताज़ा खबर
 

मोदी बनाम दीदी और दूसरे मुकाबले

एक बार फिर यह साबित हो गया कि क्षेत्रीय दलों का लोगों से जुड़ाव ज्यादा है। राष्ट्रीय दलों का स्वरूप काफी बड़ा होता है, वे सबसे बुद्धिमानों में से होते हैं, लेकिन उनमें बदलाव काफी धीमा होता है। कांग्रेस ने बदलाव की कोशिश की, लेकिन किसी एक या अन्य कारण से यह खुद को नए रूप में खड़ा कर पाने में नाकाम रही।

पीएम नरेंद्र मोदी तथा पश्चिम बंगाल की सीएम और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस फाइल)

चार राज्यों के विधानसभा और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव नतीजे घोषित हुए एक हफ्ता गुजर चुका है। हर दल ने अगर पूरी जीत नहीं, तो कुछ हद तक समर्थन का दावा किया, और भाजपा से ज्यादा किसी ने नहीं। सुखद सच्चाई तो यह है कि चार राज्यों में स्थायित्व वाली सरकारें आई हैं, जो जीते हैं उन्हें पूर्ण बहुमत मिला है और जो हार गए हैं उन्हें सदन में विपक्ष के रूप में बैठने के लिए सम्मानजनक संख्या मिल गई। विजयी जनता हुई है। लोगों के अलावा पार्टियों या मोर्चों में जिनकी जीत पर कोई सवाल नहीं है, उनमें तृणमूल कांग्रेस, वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) हैं। भाजपा असम में जीत गई, पर केरल और तमिलनाडु में बुरी तरह से हार गई। कांग्रेस को असम और केरल में मुख्य विपक्षी दल के रूप में बैठने का अधिकार मिला है, लेकिन पश्चिम बंगाल में वह पूरी तरह से साफ हो गई।

इन सभी मुकाबलों में सबसे दिलचस्प मोदी बनाम दीदी का था। ‘दीदी ओ दीदी’ जैसे सड़क छाप तंज से मोदी की जो छवि सामने आई, वह पूर्ण रूप से प्रधानमंत्री की गरिमा के खिलाफ थी। उन्होंने यह कह कर सफाई दी कि वे तो सीधे-सीधे दो बार दीदी शब्द बोल रहे थे, लेकिन यह नहीं बता पाए कि ‘ओओओओओओ’ का मकसद और मतलब क्या था। ममता बनर्जी की छवि पहिए वाली कुर्सी के सहारे प्रचार की थी। सस्ते और सड़कछाप शब्दों पर पहिए वाली कुर्सी भारी पड़ी और जीत गई। केरल के लिए भी मुकाबला कम दिलचस्प नहीं था, जहां संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) से 0.8 फीसद वोटों से हार गया।

बड़े दल और बदलाव
मेरा मानना है कि एक बार फिर यह साबित हो गया कि क्षेत्रीय दलों का लोगों से जुड़ाव ज्यादा है। एक क्षेत्रीय दल उस राज्य के लोगों की भाषा में कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण तरीके से अपनी बात रखता है, उनकी संस्कृति को ज्यादा बेहतर ढंग से समझता है, तेजी से जनसांख्यिकीय बदलावों के अनुरूप हो लेता है, समाज के बदलते मूल्यों को जल्द ही पहचान लेता है और चतुराई से अपने को इन बदलावों के अनुरूप ढाल लेता है। राष्ट्रीय दलों का स्वरूप काफी बड़ा होता है, वे सबसे बुद्धिमानों में से होते हैं, लेकिन उनमें बदलाव काफी धीमा होता है।

कांग्रेस ने बदलाव की कोशिश की, लेकिन किसी एक या अन्य कारण से यह खुद को नए रूप में खड़ा कर पाने में नाकाम रही। सिर्फ बदलाव लाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। नए स्वरूप वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्व कद्रदान पर्यवेक्षकों को दिख रहे हैं।

भाजपा बहुत ही जल्दी बहुत बड़ी पार्टी हो जाने और सत्तावादी नेता को स्वीकार कर लेने की कीमत चुका रही है। भाजपा को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की तरह ही ‘एक पार्टी’ बना डालने से और शी जिंग पेंग की तरह उसका नेता बन जाने से ज्यादा नरेंद्र मोदी को कोई खुशी नहीं होगी। इसके रास्ते में जो आड़े आ रहे हैं वे संविधान और अलग-अलग समय पर होने वाले राज्य विधानसभाओं के चुनाव हैं। जहां तक दूसरे बिंदु की बात है, कई लोगों को ‘एक देश एक चुनाव’ का नारा लुभा रहा है।

संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का मोदी का मकसद अपने को लेकर जनमत संग्रह करवाना है। जहां तक संविधान की बात है तो मोदी धैर्यपूर्वक राज्यसभा में दो-तिहाई और भाजपा की सरकारों वाले राज्यों में डेढ़ बहुमत आने तक इंतजार करेंगे। हालांकि मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उनके तौर-तरीके देख चुका है और उन्हें कभी बहुमत नहीं देगा। इसके अलावा सशक्त सुप्रीम कोर्ट भी है।

अगले तीन साल 2021 से ज्यादा अलग नहीं होंगे। अगले साल यानी 2022 में उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा होंगे। उसके अगले साल यानी 2023 में नगालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे। 2024 में लोकसभा चुनाव होगा। हम मोदी को प्रधानमंत्री से कहीं ज्यादा एक प्रचारक के रूप में देखेंगे।

दुर्गति और मौत
महामारी की दो लहरों ने अर्थव्यवस्था चौपट कर डाली है। इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि तीसरी या चौथी लहर नहीं आएगी। गिरती अर्थव्यवस्था लोगों को मार रही है। कारोबार बंद करवाए जा रहे हैं, नौकरियां जा रही हैं (बेरोजगारी दर आठ फीसद है), और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई बढ़ रही है। पूंजी भारत से बाहर जा रही है। सरकार के पास कोई विकल्प नहीं है, लेकिन खर्च बढ़ाने के लिए और उधारी का रास्ता है, पर इससे भी हालात बदल जाएंगे, कहा नहीं जा सकता।

सबसे बड़ा सबक तो मध्यवर्ग को मिला है। इस तबके ने ‘मोदी है तो मुमकिन है’ में भरोसा किया, अपने समुदायों/ कालोनियों के दरवाजे बंद कर लिए, थालियां बजार्इं और दीये जलाए, घर से काम किया, और गरीबों खासतौर से दिहाड़ी मजदूरों और प्रवासी मजदूरों की पीड़ा से आंखें मूंद लीं। आज सरकार की अक्षमता के कारण वे (मध्यवर्ग) अपने को अस्पतालों के दालान में पड़ा पा रहे हैं और आॅक्सीजन सिलिंडर और अस्पताल में बिस्तर की भीख मांग रहे हैं। रोजाना ही किसी न किसी की मौत की खबर आ रही है, चाहे परिवार में हो, रिश्तेदारी में हो, दोस्त हो, परिचित हो, या कोई अन्य जो अपने काम के लिए मशहूर रहा हो। मौत हम में से कभी भी किसी के इतने करीब नहीं रही है।

खौफनाक भविष्य
महामारी और अर्थव्यवस्था दोनों पर से सरकार का नियंत्रण खत्म हो चुका है। जीवन और आजीविका दोनों को बचाने की जरूरत है। दोनों के लिए भारी-भरकम पैसा चाहिए, जिसकी आपूर्ति कम है। सरकार के पास विकल्प नहीं है, लेकिन राजकोषीय घाटा बढ़ाया जा सकता है। मोदी में ऐसा कर पाने का साहस नहीं है। उनकी वित्तमंत्री भी इतनी डरपोक हैं कि उन्हें इसकी सलाह नहीं दे सकतीं। और उनके सलाहकार तो बुरी तरह से नाकाम हो चुके हैं। इसका नतीजा अप्रत्याशित त्रासदी के रूप में सामने आया, जिसने लाखों परिवारों को तबाह कर डाला।

सम्राट और उनके आदमी नंगे हो चुके हैं। दुनिया का मीडिया इनकी कड़ी आलोचना कर रहा है। भारत के मीडिया में भी हलचल दिखने लगी है। हर चुनाव में लोग अपने गुस्से का इजहार करने लगे हैं (उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव)। 2021 में मैं एक और हारे हुए साल का इंतजार कर रहा हूं, लेकिन 2022 और 2023 में इसी तरह की हार के असर की कल्पना से मैं कांप उठता हूं।

Next Stories
1 दुश्चक्र में जनता
2 कार्य-संस्कृति की शिथिलता
3 सच के सामने
ये पढ़ा क्या?
X