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वक्त की नब्ज: संघ का नया अवतार

बहुत कुछ है करने को संघ जैसी संस्था के लिए, अगर वह वास्तव में रचनातमक ढंग से भारतीय संस्कृति के लिए काम करना चाहती है। परिवर्तन आ गया है संघ में अगर तो उसका स्वागत है।

Author September 23, 2018 4:17 AM
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत। (फोटोः पीटीआई)

संघ परिवार के साथ मेरा रिश्ता अच्छा नहीं रहा है, सो जब मुझे उनके ‘परम पूजनीय सरसंघचालक’ की व्याख्यानमाला के लिए निमंत्रित किया गया, तो हैरान हुई। फिर तय किया कि विज्ञान भवन जाना होगा जरूर, मोहन भागवत को सुनने और यह जानने कि अचानक आरएसएस को इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। हमेशा परदों के पीछे रहने वाली इस संस्था में परिवर्तन आ रहा है क्या? मैंने कई बार कोशिश की है भागवत जी से मिलने की, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने, लेकिन कभी मिल नहीं पाई, क्योंकि मैंने संघ का विरोध काफी किया है अपने लेखों में। विरोध इसलिए कि मेरा मानना है कि आरएसएस की सोच के कारण भारत के मुसलमानों को भारतीय न होने का अहसास दिलाया गया है। संघ के अनुयायी नरेंद्र मोदी की सरकार में हैं और इन्होंने खुल कर कहा है कि मुसलमानों की जगह पाकिस्तान में है, भारत में नहीं। समस्या यह है कि मुसलमानों की आबादी इस देश में इतनी बड़ी है कि उनका अलग देश अगर बनेगा, तो इंडोनेशिया के बाद सबसे बड़ा मुसलिम देश बन सकता है। संघी सोच के लोग शायद जानते नहीं हैं कि उनकी ‘देशभक्ति’ के कारण भारत मां के एक बार फिर दो हिस्से हो सकते हैं।

संघ को इसलिए भी मैं पसंद नहीं करती, क्योंकि मैं मानती हूं कि इसने भारतीय संस्कृति को ठीक से समझा नहीं है, वरना इतनी महान विरासत को धर्म-मजहब तक नहीं सीमित रखता। ऐसा करके देश की सेवा करने के बदले देश की छवि को बिगाड़ा है। ऊपर से मेरा अनुभव रहा है बहुत सारे हिंदू-मुसलिम दंगे देखने के बाद कि जहां भी दंगे होते हैं वहां हिंदू दंगाइयों में हमेशा पाए जाते हैं बजरंग दल या विश्व हिंदू परिषद के सदस्य। मोदी के दौर में दंगे नहीं हुए हैं, लेकिन गोरक्षकों द्वारा हिंसा जरूर हुई है, जिसमें निहत्थे, बुजुर्ग मुसलमानों को पीट-पीट कर जान से मारा गया है गोरक्षा के बहाने। इस हिंसक मुहिम के शिकार दलित भी हुए हैं और इतनी घटनाएं हुई हैं पिछले चार वर्षों में कि निजी तौर पर मोदी बदनाम हुए हैं दुनिया की नजरों में। सो, पिछले हफ्ते मैंने तीन शामें विज्ञान भवन में इसलिए बितार्इं, क्योंकि मैं भागवत जी से जानना चाहती थी कि वास्तव में संघ में नई सोच पैदा हो रही है कि नहीं। पहले दिन बड़े मंच पर भारत माता की बड़ी तस्वीर को फूल चढ़ाने के बाद संघ के सरसंघचालक ने संघ का इतिहास हमको समझाने का प्रयास किया। संघ के संस्थापक हेडगेवार की देशभक्ति के गुण गाए। सच पूछिए तो पहले दिन भागवत जी का भाषण मुझे थोड़ा-सा बोरिंग लगा, सो दूसरे दिन गई सिर्फ इसलिए कि मैंने ठान लिया था कि तीनों दिन जाऊंगी।

अच्छा हुआ कि मैंने जाने का फैसला किया, क्योंकि दूसरे दिन भागवत जी ने ऐसी बातें कहीं अपने भाषण में जिनको सुनने के बाद स्पष्ट हो गया कि संघ में जो परिवर्तन आया है उसको ऐतिहासिक कहा जा सकता है। एक तो भारत के संविधान को सरसंघचालक ने स्वीकार किया, जबकि उनसे पहले तकरीबन जितने सरसंघचालक रहे हैं उन्होंने साफ किया है कि संविधान से उनको तकलीफ है। इसके बाद भागवत ने एक और बात ऐसी कही, जिससे हम सब चौंक गए। हिंदुत्व का मतलब समझाते हुए उन्होंने कहा कि बिना मुसलमानों के हिंदुत्व ही नहीं है। हिंदू शब्द से तकलीफ है, तो भारतीय कह लें। यह बात आश्चर्यजनक इसलिए है, क्योंकि संघ के जो दूसरे सरसंघचालक बने थे, गुरु गोलवलकर, उन्होंने लिखा था अपनी एक किताब में कि भारत में मुसलमानों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए जैसा हिटलर ने यहूदियों के साथ किया था। तीसरे दिन प्रश्न-उतर वाले सत्र में जब भागवत जी इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ऐसा गुरुजी ने अलग परिस्थितियों में कहा था। अब समय बदल गया है और संघ कोई बंद संस्था नहीं है, जो समय के साथ नहीं बदल सकती, सो गोलवलकर की ‘बंच आफ थॉट्स’ का नया प्रकाशन संघ द्वारा हुआ है, जिसमें यह बात नहीं है। तो क्या कहा जा सकता है कि संघ का भविष्य में नया रूप देखने को मिलेगा? आशा तो हमको करनी चाहिए, क्योंकि भारतीय संस्कृति को लेकर बहुत कुछ है करने को।

शिक्षा के क्षेत्र में जहां संघ काफी सक्रिय रहा है, परिवर्तन लाने की सख्त जरूरत है। भारतीय बच्चों को अब भी उसी प्रणाली के तहत तालीम दी जा रही है, जिसको ब्रिटिश राज ने बनाई थी भारतवासियों को बेहतर गुलाम बनाने के लक्ष्य से। सो, भारतीय संस्कृति को ऐसा गायब किया स्कूलों और कॉलेजों में कि सुश्रुत और भास्कराचार्य जैसे महापुरुषों के बारे में भी भारत के बच्चे नहीं जानते हैं। बल्कि जो बेहतरीन इंग्लिश मीडियम स्कूल हैं वहां तो न भारतीय भाषाएं सिखाई जाती हैं और न ही भारतीय संस्कृति के बारे में। नाम के वास्ते इन शिक्षा संस्थाओं को हम भारतीय कह सकते हैं, क्योंकि भारत की धरती पर हैं लेकिन हैं ये पूरी तरह से पश्चिमी। यहां भारतीय बच्चों को पूरी तरह ट्रेनिंग दी जाती है कि किस तरह वे नकली अंग्रेज या अमेरिकी बन सकते हैं। भारतीय साहित्य की इतनी महान विरासत होने के बावजूद तकरीबन जितने भी बड़े लिटरेरी फेस्टिवल होते हैं हर साल भारत में, वहां अहमियत दी जाती है सिर्फ उन भारतीय लेखकों को जो अंग्रेजी में लिखते हैं। यानी बहुत कुछ है करने को संघ जैसी संस्था के लिए, अगर वह वास्तव में रचनातमक ढंग से भारतीय संस्कृति के लिए काम करना चाहती है। परिवर्तन आ गया है संघ में अगर तो उसका स्वागत है।

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