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किताबें मिलीं: गंगा तीरे, तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है, आजादी और राष्ट्रवाद

इस किताब में निजी अनुभव, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, लेखक के मन में उठते सवाल और उन सवालों को आधुनिक संदर्भों में देखने की कोशिश की गई है। लेखक का गंगा से करीब साठ साल का नजदीक का वास्ता रहा है। इस दौरान गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन और उनकी संस्कृति को उन्होंने नजदीक से समझा है।

Author September 23, 2018 1:51 AM
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गंगा तीरे
इस किताब में निजी अनुभव, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, लेखक के मन में उठते सवाल और उन सवालों को आधुनिक संदर्भों में देखने की कोशिश की गई है। लेखक का गंगा से करीब साठ साल का नजदीक का वास्ता रहा है। इस दौरान गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन और उनकी संस्कृति को उन्होंने नजदीक से समझा है। गंगा को जिस-जिस रूप में उन्होंने देखा, गंगा के बारे में जो-जो सुना और अनुभव किया, सबका वर्णन इस पुस्तक में है। गंगा गोमुख से निकलने वाली भागीरथी भर नहीं है, बल्कि गोमुख से निकल कर कई नदियों को अपने में समाहित करती हुई भागीरथी और बदरीनाथ से आने वाली अलकनंदा, मंदाकिनी, नंदाकिनी, पिंडर आदि जब सब नदियां मिल जाती हैं तब यह गंगा बनती है। गंगा नाम भी इसके समुद्र मिलन तक कायम नहीं रहता। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा एक बार फिर भागीरथी के नाम से जानी जाती है, जबकि हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम हुगली है। इसका मतलब यह कि गंगा का उद्गम गोमुख माना जाता है, लेकिन इसे गंगा नाम करीब सवा दो सौ किलोमीटर की यात्रा करने के बाद देवप्रयाग में मिलता है।

इसी तरह सागर से इसका मिलन गंगासागर में माना जाता है। पर इसका गंगा नाम मुर्शिदाबाद में ही खत्म हो जाता है। गंगा के बारे में एक और बात पुस्तक से पता चलती है कि वह सिर्फ वाराणसी में उत्तर वाहिनी नहीं है। बल्कि खुद गंगोत्री, कुर्था (गाजीपुर), सुल्तानगंज, कहलगांव (भागलपुर) जैसी दूसरी कई जगहों पर भी यह उत्तर वाहिनी है। गंगा के किनारे का ग्राम्य जीवन और साधु-संन्यासी’- ऐसे ही कई रहस्यों और किवदंतियों को तार्किक तरीके से स्पष्ट करते इस यात्रा-वृत्तांत में गंगा की असीम पावनता के कारकों को समझने का अवसर मिलता है।
गंगा तीरे : अमरेंद्र कुमार राय; राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू भवन, 5, वसंत कुंज इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।

तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है
जब पहली बार इंसान बेहतर खाना-पानी और जिंदगी की तलाश में घर से निकला होगा, जब आदमी रोमांच और नई दुनिया की ललक में पागल यायावर हुआ होगा, जब इंसान अपनी दुनिया को पहचानने-समझने अपने घर से निकला होगा, उस पहले इंसान ने अपनी अगली पीढ़ियों को एक सौगात उनके डीएनए में दी होगी यायावरी की, घुमक्कड़ी की, रोमांच और साहस की। बार्थोलोमियो डियाज, क्रिस्तोफर कोलंबस, वास्को डिगामा, इब्न बतूता, मार्को पोलो, फाहियान, ह्वेन त्सांग, यूरी गागरिन, अलबरूनी, निकिटिन, निकोलो कोंती, रोमा जिप्सी, कश्यप मार्तंग, महेंद्र संघमित्रा, हिलरी तेंजिंग… कितने नाम हैं। कोई सिल्क रूट, कोई समंदर में बलसे की नाव पर थॉर हाईदर्दाल की कॉन टिकी, कोई अमंडसन की दक्षिणी ध्रुव की यात्रा, चांद पर नील आर्मस्ट्रांग का उतरना, जिप्सियों बंजारों का पूरी दुनिया में घुल-मिल फैलना, बर्फीले प्रदेश में सिर्फ अपनी हिम्मत की बदौलत निकल पड़ना। कैसी अदम्य लालसा है! कितना उत्सुक उम्मीदों भरा चाहत का संसार!

किसी अनजाने को जानने का सुख ही तो है। अपने भीतर यात्रा में उतरते जाना कि हरेक यात्रा हमें कहीं से बदल देती है, बेहतर बना देती है। प्रस्तुत कथा-यात्रा लेखिका उन पुरखों के नाम करती है जो घुमक्कड़ हुए, जाने कहां से आए और आगे कहां जाएंगे। और उन आने वाली पीढ़ियों के नाम जो शायद किसी भविष्य में स्टारट्रेक के, ‘टू गो वेयर नो मैन हैज गॉन बिफोर’ की तर्ज पर कौन जाने किसी और ग्रह के बाशिंदे हों।
तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है : प्रत्यक्षा; आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला; 250 रुपए।

आजादी और राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद यूरोपीय पुनर्जागरण की देन है। राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का चलन सत्रहवीं शताब्दी में वेस्टफेलियाई संधि के बाद हुआ। यह वही दौर है जब यूरोप में रेनेसां, वैज्ञानिक उन्नति और औद्योगिक प्रगति का सिलसिला शुरू हुआ। इस औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यूरोपीय देशों द्वारा उपनिवेशवाद की शुरुआत हुई। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में अपने उपनिवेश बसाने में यूरोपीय शक्तियों के बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हुआ। इसका परिणाम राष्ट्रवाद का विकास और राष्ट्रराज्य की संकल्पना के रूप में हुआ।
तीसरी दुनिया के औपनिवेशिक देशों में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रवाद का विकास हुआ। भारत में राष्ट्रीय चेतना या राष्ट्रबोध का उद्भव 1857 के स्वाधीनता आंदोलन की विफलता के बाद हुआ। भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में देश प्रेम रहा है।

साहित्यकारों, पत्रकारों, वकीलों और विशेषकर प्रबुद्धवर्ग ने देशप्रेम की भावना से भारत के विभिन्न समूहों, समुदायों, संस्कृतियों आदि विविधताओं को एक सूत्र में पिरोकर एक राष्ट्र की संकल्पना पेश की। आगे चल कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी के नेतृत्व में साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद से मुक्ति की आकांक्षा से राष्ट्रवाद का विकास हुआ। आज एक अलग किस्म के राष्ट्रवाद को जनमानस में फैलाया जा रहा है। यह राष्ट्रवाद यूरोपीय राष्ट्रवाद से प्रेरित है। प्रस्तुत पुस्तक को तीन खंडों में बांटा गया है। पहले खंड में राष्ट्रवाद पर सैद्धांतिक विमर्श और उसके इतिहास और स्वरूप पर केंद्रित आलेख हैं। दूसरे खंड में राष्ट्रवाद के हिंदूवादी एजेंडे, उसकी विसंगतियों और समकालीन संदर्भ से संबंधित आलेख शामिल किए गए हैं। तीसरा खंड साक्षात्कार पर आधारित है।
आजादी और राष्ट्रवाद : संपादक- रविकांत; अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 350 रुपए।

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