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मुद्दा: वजूद के लिए संघर्ष

समाज में सम्मानपूर्वक जीवनयापन के लिए ट्रांसजेंडरों के प्रति सामाजिक मान्यता और मानसिकता में परिवर्तन करना होगा। किन्नरों के उत्थान और विकास के लिए शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ और रोजगार के लिए अलग से कानून बनाना होगा।

Author January 6, 2019 4:12 AM
देश में अनिवार्य और निश्शुल्क शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद अधिकतर ट्रांसजेंडर निरक्षर हैं।

देवाशीष उपाध्याय

समाज का एक ऐसा वर्ग, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है, जिसे न पुरुष के रूप में, न ही महिला के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसे किन्नर, थर्ड जेंडर, ट्रांसजेंडर, हिजड़ा, ख्वाजा, सराय आदि नामों से संबोधित किया जाता है। इन्हें उपहास और परिहास की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि हमारे संविधान में सभी नागरिकों को स्वतंत्रता, समानता, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ, सुरक्षा, रोजगार, सम्मानपूर्वक जीवनयापन करने संबंधी अधिकार प्रदान किए गए हैं। पर ट्रांसजेंडरों के लिए ये सारी बातें बेमानी हैं।

दुर्भाग्य से देश में इनकी जनसंख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, क्योंकि 2011 या पहले की गई किसी भी जनगणना में केवल पुरुष और महिला के दो स्तंभ होते थे। इसके कारण इनकी अलग से जनगणना नहीं की जा सकी। गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में इनकी आबादी लगभग दस लाख होगी। किन्नर समुदाय रोजी-रोटी के लिए भीख मांगने या यौनकर्मी के रूप में काम करने को अभिशप्त हैं। यह सच है कि किन्नर आमजन को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियां और कभी-कभी अभद्रता तक कर देते हैं। इसलिए तर्क दिया जाता है कि, किन्नर तो काम करना ही नहीं चाहते हैं, भीख मांगना इनका पेशा है। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। अधिकतर किन्नर आमजन की तरह उच्च शिक्षा हासिल कर नौकरी और रोजगार प्राप्त कर सम्मानपूर्वक जीवन यापन करना चाहते हैं। वे अपना पेट पालने और जीवन निर्वाह के लिए मजबूरी में भीख मांगते हैं। रुढ़िवादी मान्यताओं के कारण खुद इनका परिवार और समाज इन्हें स्वीकार नहीं करता है। किन्नर समुदाय की शैक्षिक स्थिति बहुत दयनीय है। देश में अनिवार्य और निश्शुल्क शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद अधिकतर ट्रांसजेंडर निरक्षर हैं। किन्नरों पर किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक दस से पंद्रह प्रतिशत ट्रांसजेंडर ही साक्षर हैं। समाज की मानसिकता है कि ट्रांसजेंडर बच्चों के साथ अगर सामान्य बच्चा रहेगा तो वह भी बिगड़ जाएगा। जबकि ट्रांसजेंडर बच्चे भी शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और संवेगात्मक रूप से सामान्य होते हैं। जिस प्रकार पुरुष और महिला के बीच केवल लैंगिक भिन्नता होती है, उसी प्रकार ट्रांसजेंडर भी पुरुष और महिला से लैगिंक रूप से भिन्न होते हैं।

देश में ट्रांसजेंडर बच्चों की शिक्षा का अलग से कोई प्रबंध नहीं है, जबकि महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दिव्यांगों आदि की सुविधा के लिए अलग शिक्षण संस्थानों की स्थापना की गई है, इन्हें सामान्य शिक्षण संस्थाओं में भी प्रवेश मिलता है। ट्रांसजेंडर बच्चों की शिक्षा के लिए अलग शिक्षण संस्थानों की स्थापना के साथ-साथ सामान्य शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश मिलना चाहिए, जिससे ट्रांसजेंडर भी समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें। सामाजिक उपेक्षा और अस्वीकार्यता के कारण ट्रांसजेंडरों के लिए रोजगार के सभी दरवाजे बंद हैं। हालांकि कानूनी रूप से ट्रांसजेंडरों को रोजगार या नौकरी प्राप्त करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। संविधान में उनके लिए भी समान अवसर की बात कही गई है। इसके बावजूद उन्हें न तो सरकारी और न ही निजी क्षेत्र में सहजता से नौकरी प्राप्त होती है। हालांकि देश में कुछ गिने-चुने ट्रांसजेंडरों ने संघर्ष कर समाज की मूल धारा के विपरीत जाकर नौकरी या रोजगार प्राप्त कर लिया है, लेकिन यह अपवाद मात्र है। शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल के अभाव में ट्रांसजेंडरों को नौकरी मिल पाना मुश्किल है। सरकार आमजन के विकास और रोजगार प्राप्ति के लिए अनेक योजनाएं संचालित कर रही है, पर दुर्भाग्य से ट्रांसजेंडर किसी भी योजना का लाभ नहीं उठा पाते हैं। या तो उन्हें योजना की जानकारी नहीं होती है, या होती भी है तो सरकारी अधिकारी उन्हें योजना का लाभ नहीं प्रदान करते हैं। ट्रांसजेंडरों के आर्थिक स्वावलंबन के लिए समुचित रोजगार मुहैया कराया जाना आवश्यक है। ट्रांसजेंडर स्वास्थ संबंधी मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। संकीर्ण मानसिकता के कारण चिकित्सक ट्रांसजेंडरों को अछूत समझते हैं। इतना ही नहीं, निजी क्षेत्र के अस्पतालों में इलाज कराने पर इनसे सामान्य मरीज की तुलना में अधिक पैसे वसूले जाते हैं। सरकार देश के सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ संबंधी अनेक प्रबंध किए हैं, लेकिन सरकारी चिकित्सा सेवाओं का लाभ ट्रांसजेंडरों को नहीं मिलता।

देश में कमजोर और पिछड़े वर्ग, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दिव्यांगों, पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति और जनजाति सभी की सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई न कोई कानून बनाया गया है, लेकिन ट्रांसजेंडरों की सामजिक सुरक्षा के लिए न कोई कानून है, न ही इनके साथ होने वाली किसी अप्रिय घटना के लिए अलग से कोई निवारण तंत्र या आयोग की व्यवस्था की गई है। किन्नरों का जन्म भी हमारे ही समाज में होता है। जेनेटिक डिसऑर्डर या क्रोमोजोमल डिसऑर्डर के कारण इनमें लैंगिक या जननांगों का समुचित विकास नहीं हो पाता है। या इनमें पुरुष और स्त्री दोनों के गुण आ जाते हैं। लैगिंक रूप से पुरुष और महिलाओं से भिन्न होने के कारण इनका यौन शोषण होता है। यौन शोषण या बलात्कार की स्थिति में इन्हें सामान्य थानों से न्याय भी नहीं मिलता, उल्टे इन्हीं पर दोष मढ़ दिया जाता है। इनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। जिससे ये अपनी शिकायत लेकर थाने भी नहीं जाते हैं। विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर, किन्नर समुदाय शहर की गंदी बस्तियों या किराए के मकान में रहने को बाध्य हैं। इन्हें सरकार की किसी भी लोककल्याणकारी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता है। सरकार भी इनके कल्याण या पुनर्वास के लिए कोई पहल नहीं करती है। स्थायी निवास के अभाव के कारण इनके पास सरकारी पहचान पत्र जैसे- वोटर कार्ड, राशन कार्ड, आधार कार्ड या पासपोर्ट आदि कोई भी वैधानिक दस्तावेज नहीं होते हैं। इनको पैतृक संपत्ति में भी अधिकार नहीं मिलता है।

स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उनके प्रति होने वाले भेदभाव, तिरस्कार, अन्याय, उपेक्षा, अत्याचार आदि को विभिन्न मंचों पर लगातार उठाया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ट्रांसजेंडरों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता प्रदान की और सरकार को हर जगह पुरुष और महिला के अलावा थर्ड जेंडर का कॉलम बनाने का निर्देश दिया है। पर मात्र तृतीय लिंग के रूप में मान्यता प्राप्त होने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। न्यायालय ने सरकार को ट्रांसजेंडरों को शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश और नौकरी में आरक्षण देने का निर्देश दिया है। उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के राधाकृष्णन और एके सिकरी की पीठ ने कहा था कि किन्नर समाज आज भी अछूत बने हैं। आमतौर पर स्कूलों और शिक्षण संस्थाओं में इन्हें दाखिला नहीं मिल पाता है। उनके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। समाज में सम्मानपूर्वक जीवनयापन के लिए ट्रांसजेंडरों के प्रति सामाजिक मान्यता और मानसिकता में परिवर्तन करना होगा। किन्नरों के उत्थान और विकास के लिए शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ और रोजगार के लिए अलग से कानून बनाना होगा। 1994 में पहली बार ट्रांसजेंडरों को मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ। पर बच्चा गोद लेने और संपत्ति के अधिकार से ट्रांसजेंडर अभी वंचित हैं। ट्रांसजेंडरों की सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए संरक्षण कानून बनाने के साथ-साथ इनके कल्याणार्थ योजनाएं और आम जनमानस में जागरूकता पैदा करना होगा। संसद ट्रांसजेंडरों के अधिकारों और संरक्षण विधेयक 2016 द्वारा इनके अधिकारों की रक्षा का प्रावधान कर रही है। लेकिन सबसे जरूरी है समाज की नकारात्मक मानसिकता और दृष्टिकोण में परिवर्तन होना और ट्रांसजेंडरों को भी सामान्य नागरिक समझना।

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