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वक्त की नजर: गरिमा के प्रतिकूल

अब स्थिति यह है कि आम चुनाव इतने करीब आ गए हैं कि नई दिशा की बातें भी करना बेकार है। शायद नई दिशा का अभाव ही मुख्य वजह है कि जिस युवराज को मोदी शहजादा कह कर मजाक उड़ाया करते थे 2014 के चुनाव अभियान में, आज उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि वे मोदी को व्यक्तिगत तौर पर चुनौती दे रहे हैं।

Author May 13, 2018 6:12 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स- पीटीआई)

कर्नाटक के चुनाव प्रचार में जिस अंदाज में हमारे राजनेता पेश आए, उसे देख कर यह कहना गलत न होगा कि अपनी प्रिय भारतमाता का भविष्य रौशन नहीं दिख रहा है। राजनेताओं को लीडर कहते हैं हम जैसे मामूली बंदे, इस उम्मीद से कि उनको याद रहे कि उनका काम है मार्गदर्शन करना, नेतृत्व करना। ऐसा किसी भी राजनेता ने कर्नाटक के विधानसभा चुनाव प्रचार में नहीं दिखाया। उल्टा, बातें इतनी बेतुकी हुर्इं कि स्कूल के बच्चे चुनाव लड़ रहे होते तो वे भी शर्मिंदा होते। ज्यादातर बातें ऐसी सुनने को मिलीं- झूठ बोल रहे हो तुम। नहीं, झूठ तुम बोल रहे हो। वादे आपने नहीं पूरे किए पिछले चार सालों में। वादे आपने नहीं पूरे किए सत्तर सालों में। आप भ्रष्ट हैं, आपकी पूरी पार्टी भ्रष्ट है। आपके साथ मंच पर जब खड़े होते हैं रेड्डी बंधु, आप होते कौन हैं भ्रष्टाचार की बातें करने वाले। राजनेता जब इस अंदाज में पेश आते हैं, तो जाहिर है कि उनके प्रवक्ता और भी नीचे स्तर की बातें करेंगे। सो, भारतीय जनता पार्टी के संबित पात्रा ने खूब जोश में आकर कोई बीस मिनट सिर्फ कर्नाटक के मुख्यमंत्री की अदृश्य घड़ी पर बातें की- क्या आप चीन में फलां भगोड़े से मिले थे? क्या उसने आपको एक तोहफा दिया? क्या वह तोहफा एक घड़ी थी? क्या उस हुबलोट घड़ी की कीमत चालीस लाख रुपए थी? क्या उस घड़ी को आपने तोशाखाने में डाली? संबितजी, यह नाटक करने से पहले आपने ध्यान दिया होता अपने साथियों की घड़ियों की तरफ, तो शायद दिखता आपको कि कितनों ने इसी किस्म की महंगी घड़ियां पहन रखी हैं। कांग्रेस की तरफ से सामने आए गांधी परिवार के पुराने वफादार राजीव देसाई, जिन्होंने गर्व से टीवी पर कहा, ‘भारतीय जनता पार्टी हमेशा सोचती है कि हमसे दो कदम आगे है, लेकिन लिंगायत समाज को विशेष दर्जा देकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने ऐसी बाजी मारी कि उनके होश अभी तक ठिकाने नहीं आए हैं।’

जातिवाद अक्सर तब चुनाव प्रचार का अहम हिस्सा बनता है, जब असली मुद्दों का अभाव होता है। सो, ऐसा इस चुनाव अभियान में हुआ। पूरे देश को अब मालूम हो गया है की लिंगायत कौन हैं और वोक्कालिंगा कौन। लेकिन इस जानकारी के साथ हम यह भी जान गए हैं कि कर्नाटक का भला यह जानकारी हासिल करने से नहीं होने वाला है। भला होता अगर एक-दूसरे पर निजी हमले करने के बदले हमारे राजनेताओं ने नेतृत्व दिखाया होता। सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है प्रधानमंत्री का। उनसे उम्मीद नहीं थी कि पंडित नेहरू को नीचा दिखाने के लिए वे इतिहास को बदल कर पेश करेंगे। सो, दोष लगाया उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री पर कि उन्होंने जनरल थिमय्या और जनरल करियप्पा का अपमान किया। यह आरोप जब बेबुनियाद साबित हुआ तो उन्होंने कहा कि पंडितजी ने भगत सिंह से मिलने की कोशिश भी नहीं की। यह आरोप भी बेबुनियाद निकला। माना प्रधानमंत्रीजी, कि आपको नेहरू-गांधी परिवार से शिकायत है। मुझे भी है और कई बार लिख चुकी हूं नेहरूवी समाजवाद के खिलाफ। मेरी शिकायत यह भी है कि पंडितजी ने प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर इतना कम ध्यान दिया कि इसका खमियाजा यह गरीब देश आज तक भुगत रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं जब आला दर्जे की होती हैं तब औजार बन जाती हैं गरीबी हटाने की।

ऐसा कहने के बाद लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि इतिहास की नजरों में पंडितजी की गिनती दुनिया के महान राजनेताओं में होती है। वह दौर था महान राजनेताओं का। भारत के राजनेताओं का कद छोटा तबसे होने लगा, जबसे पंडित नेहरू की बेटी ने कांग्रेस पार्टी को विरासत में दे दिया अपने बेटों को। संजय गांधी को पहले और उनकी मौत के बाद राजीव को। राजीव गांधी को जब भारतवासियों ने आलीशान बहुमत दी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, तो अन्य राजनेता भी अपने बच्चों को अपना चुनाव क्षेत्र विरासत में देने लगे, चाहे उनके बच्चे पैसा कमाने की मंशा से आए हों राजनीति में, जनता की सेवा करने नहीं। इन खराबियों को देखते ही नरेंद्र मोदी को 2014 में भारत के मतदाताओं ने प्रधानमंत्री बनाया, जिनको पूर्ण बहुमत दी, इस विश्वास पर कि वे वास्तव में परिवर्तन और विकास लाकर दिखाएंगे। ऐसा कर भी सकते थे वे, लेकिन न जाने क्यों उन्होंने नई दिशा में देश को ले जाने के बदले उसी दिशा में रखा, जिसमें सत्तर वर्षों से हम आम लोगों की बुनियादी जरूरतें नहीं पूरा कर सके हैं। कर्नाटक में मोदी ने खुद ध्यान दिलाया कि शर्म की बात है कि सत्तर सालों की आजादी के बाद भी अठारह हजार से ज्यादा गांव थे भारत में, जहां बिजली नहीं पहुंची थी। उनकी सरकार ने इस अभाव को पूरा किया पिछले महीने। सो, क्यों नहीं उन्होंने देश की आर्थिक दिशा को बदलने की कोशिश की अपने कार्यकाल में? क्यों नहीं उनको दिखा कि देश की गरीबी को नारों और खैरात बांटने के बहुत सारे विफल प्रयास हो चुके हैं, सो गरीबी हटाने के बदले उनको संपन्नता लाने के लिए नीतियां बनानी चाहिए थीं? अब स्थिति यह है कि आम चुनाव इतने करीब आ गए हैं कि नई दिशा की बातें भी करना बेकार है। शायद नई दिशा का अभाव ही मुख्य वजह है कि जिस युवराज को मोदी शहजादा कह कर मजाक उड़ाया करते थे 2014 के चुनाव अभियान में, आज उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि वे मोदी को व्यक्तिगत तौर पर चुनौती दे रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने लगे हैं राहुल गांधी।

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