ताज़ा खबर
 

वक्त की नजर: शिक्षा की कमजोर बुनियाद

हमारी शिक्षा संस्थाएं आज भी उसी रास्ते पर चल रही हैं, जो रास्ता अंग्रेजों ने बनाया था। इस रास्ते को तैयार किया गया था गुलाम कौम के लिए, किसी स्वतंत्र, गौरवान्वित देश के लिए नहीं।

Author July 15, 2018 3:31 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Express Photo)

शुरू करती हूं एक वाक्य आपको सुना कर। हुआ यह पिछले दिनों कि प्रसिद्ध लेखक अमीश त्रिपाठी को महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में बतौर मुख्य अथिति आमंत्रित किया गया था। अपना भाषण उन्होंने शुरू किया दो सवालों से। पहला सवाल था कि उपस्थित छात्रों में से कितनों ने गणित पढ़ी है। सभा में बैठे हर छात्र ने हाथ ऊपर किए। फिर उन्होंने पूछा कि उनमें से कितनों ने भास्कराचर्य का नाम सुना है। एक ही छात्र ने हाथ ऊपर किया। अमीशजी ने बाद में मुझे बताया कि उनको बहुत दुख हुआ सुन कर कि बारहवीं सदी के इस महान गणितज्ञ के बारे में नौजवान भारतीय इतना कम जानते हैं। दुख हम सबको होना चाहिए। यह वह दौर है, जिसमें हमारे हिंदुत्ववादी शासक कहते नहीं थकते कि हमको गर्व से कहना चाहिए कि हम हिंदू हैं, लेकिन ऐसा कहने से पहले क्या उन्होंने ध्यान इस बात पर दिया है कि प्राचीन भारत के बारे में न भारतीय स्कूलों में खास पढ़ाया जाता है और न ही कॉलेजों में। सो, हिंदू होने का गर्व कैसे पैदा होगा?

HOT DEALS
  • Honor 8 32GB Pearl White
    ₹ 12999 MRP ₹ 30999 -58%
    ₹1500 Cashback
  • Honor 7X Blue 64GB memory
    ₹ 15390 MRP ₹ 17990 -14%
    ₹0 Cashback

नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे 2014 में तो मेरे जैसे कई लोग थे, जिन्हें पूरी उम्मीद थी कि शिक्षा के क्षेत्र में मोदी ऐसी नीतियां लाएंगे, जिनसे वह खामियां दूर हो जाएंगी, जो अंग्रेजों के जमाने से चलती आई हैं हमारी शिक्षा प्रणाली में। स्वतंत्रता मिलने के बाद अगर देश के पहले प्रधानमंत्री ने शिक्षा प्रणाली में भारतीयता लाई होती, तो आज यह हाल न होता कि गांव-गांव में अब प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल दिखने लगे हैं। कोई हर्ज नहीं होता ऐसा होने में अगर अंग्रेजी के अलावा इन स्कूलों में थोड़ा-बहुत प्राचीन भारत के महापुरषों के बारे में भी सिखाया जाता। ब्रिटिश राज में जानबूझ कर इतिहास की किताबों में से इनके नाम गायब रखे गए थे, क्योंकि गुलाम कौम को गुलाम रखने का सबसे अच्छा तरीका है उसको अपने देश, अपनी संस्कृति से वंचित रखना। पंडित नेहरू जब शिक्षा नीति में परिवर्तन नहीं लाए तो उनके बाद आने वाले कांग्रेस प्रधानमंत्री कैसे ला सकते थे? सो, पहला मौका परिवर्तन लाने का तब आया जब अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के पहले प्रधानमंत्री बने थे। उनके शिक्षामंत्री उस समय मुरली मनोहर जोशी थे और उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान पर ज्यादा ध्यान दिया और इतिहास की किताबों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन लाने का प्रयास किया, लेकिन उससे आगे नहीं बढ़ पाए, क्योंकि ‘सेक्युलर’ राजनेताओं ने खूब हल्ला मचाना शुरू कर दिया था कि शिक्षा नीति का भगवाकरण हो रहा है। ऊपर से समस्या यह भी थी कि वाजपेयी के पास पूर्ण बहुमत नहीं था।

नरेंद्र मोदी के पास पूर्ण बहुमत भी है और अब ऐसा दौर आ गया है कि भारत के तकरीबन हर बड़े राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। सो, अगर शिक्षा नीतियों में परिवर्तन लाना चाहते, तो उनको कोई रोक नहीं सकता था। इसलिए समझ में नहीं आता कि उन्होंने परिवर्तन लाने की कोशिश क्यों नहीं की है अपने कार्यकाल में। इतना जरूर हुआ है कि संघ परिवार के लोगों को दखल देने की इजाजत मिल गई है इस विभाग में। उनका असर तब भी दिखता था जब स्मृति ईरानी मानव संसाधन विकास मंत्री थीं और अब भी जब उनकी जगह प्रकाश जावडेकर आ गए हैं। समस्या यह है कि संघ परिवार में बहुत कम लोग हैं, जो जानते हैं कि असली परिवर्तन तब आएगा जब धर्म-मजहब की बातों से आगे निकल कर प्राचीन भारत के इतिहास को देखा जाएगा। असली फर्क तब आएगा, जब धर्मगुरुओं के अलावा उन महपुरुषों और महान लेखकों के बारे में आज के बच्चों को सिखाया जाएगा, जिन्होंने प्राचीन भारत को ज्ञान की ज्योति से रोशन किया था। अमीश त्रिपाठी का कहना है कि अज्ञान का अंधेरा आज की शिक्षा संस्थाओं के हर विभाग में दिखता है, सो अगर वास्तुकला के बारे में वे कहीं भाषण देने जाते हैं तो ऐसे छात्र मिलते हैं, जो जानते ही नहीं कि वास्तुकला की बुनियाद क्या है। इतना थोड़ा ज्ञान है प्राचीन भारत के बारे में कि आज के मेडिकल स्कूलों में सुश्रुत के बारे में वे छात्र भी नहीं जानते, जो सर्जन बनने जा रहे हैं। सुश्रुत की तकनीकों के बारे में आज अमेरिका के मेडिकल स्कूलों में पढ़ाया जाता है और इंटरनेट पर उनके बारे में फिल्में भी हैं, जिनसे मालूम होता है कि जिस तरह नाक पर ऑपरेशन सुश्रुत किया करते थे, वही तकनीक आज भी इस्तेमाल करते हैं सर्जन।

मोदी के दौर में हिंदुत्व को लेकर खूब हल्ला मचा है, लेकिन जमीनी तौर पर इस मुहिम को आगे बढ़ाने वाले सिर्फ गोरक्षक रहे हैं। गौमाता को बचाने के नाम पर हिंसा हर भाजपा शासित राज्य में दिखी है, इतनी ज्यादा कि हिंदुत्व शब्द बदनाम-सा हो गया है और हिंदुओं में दरारें बन गई हैं, क्योंकि गोरक्षकों ने मुसलमानों के अलावा हिंदू दलितों को भी निशाना बनाया है। प्रधानमंत्री ने अपने तौर पर इस हिंसा की निंदा की है दो बार, लेकिन हिंसा रुकी नहीं है, क्योंकि उनके कई साथी खुल कर गले मिले हैं दंगाइयों से। काश, हिंदुत्व विचारधारा का हिंसक रूप कम देखने को मिला होता पिछले चार वर्षों में और उसका दूसरा रूप देखने को मिला होता जिसमें ज्ञान, सभ्यता और इस देश की पुरानी संस्कृति है। अब उम्मीद हम सिर्फ यही कर सकते हैं कि अगर मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं अगले साल, तो शिक्षा प्रणाली में वह परिवर्तन लाने का प्रयास करेंगे, जो बहुत पहले लाया जाना चाहिए था।
हमारी शिक्षा संस्थाएं आज भी उसी रास्ते पर चल रही हैं, जो रास्ता अंग्रेजों ने बनाया था। इस रास्ते को तैयार किया गया था गुलाम कौम के लिए, किसी स्वतंत्र, गौरवान्वित देश के लिए नहीं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App