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दूसरी नजर: एक जोरदार और स्पष्ट संदेश

पहली घटना पार्टी की ताकत की हेकड़ी को और दूसरी लोगों की ताकत के दृढ़ निश्चय वाले फैसले को बताती है। ऐसी दिलचस्प घटनाएं और प्रसंग मेरा ध्यान आकृष्ट कर लेते हैं। किसी व्यक्ति या संस्थान की तुलना में ये घटनाएं ज्यादा बताती हैं कि यह भारत की जनता ही है जो सरकार की निर्दयता, अक्षमता और झांसे को समझ जाएगी।

Author March 18, 2018 3:31 AM
पीएम मोदी के साथ अमित शाह

बुधवार चौदह मार्च 2018 को दो ऐसी घटनाएं हुर्इं, जिनका स्पष्ट रूप से एक दूसरे से कोई संबंध नहीं था। सारी अनुदान मांगों को बिना बहस के मंजूरी दे दी गई और लोकसभा में वित्त विधेयक 2018 बिना किसी चर्चा के पारित हो गया। उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं ने उन उम्मीदवारों के पक्ष में निर्णायक वोट दिए, जिन्होंने भाजपा के उम्मीदवारों को हराया। पहली घटना पार्टी की ताकत की हेकड़ी को और दूसरी लोगों की ताकत के दृढ़ निश्चय वाले फैसले को बताती है। ऐसी दिलचस्प घटनाएं और प्रसंग मेरा ध्यान आकृष्ट कर लेते हैं। किसी व्यक्ति या संस्थान की तुलना में ये घटनाएं ज्यादा बताती हैं कि यह भारत की जनता ही है जो सरकार की निर्दयता, अक्षमता और झांसे को समझ जाएगी। महाराष्ट्र से लेकर गुजरात, फिर राजस्थान से उत्तर प्रदेश और बिहार तक स्पष्ट रूप से एक आंधी-सी चली है। ग्रामीण भारत गंभीर संकट में है और शहरी भारत असहाय गरीबों, मध्य वर्ग और ‘पालकी ढोने वाले’ वर्गों में बंटा हुआ है जो किसी भी सत्ता के साथ हो लेगा।

संकट में खेती
हम ग्रामीण भारत से शुरू करते हैं। साठ फीसद आबादी अपनी जीविका के मुख्य स्रोत कृषि पर निर्भर है, जिसका जीडीपी में हिस्सा मात्र सोलह फीसद है। इसमें छोटे किसान, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, दैनिक मजदूर, ग्रामीण उद्योग, ग्रामीण बाजारों के छोटे विक्रेता, छोटे दुकानदार और छोटे सेवा प्रदाता शामिल हैं। ये सब गरीब हैं। इनकी गरीबी इनके जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है, बच्चों की शिक्षा से उनके स्वास्थ्य और उपयुक्त रोजगार पाने तक को। जब कृषि पर असर पड़ता है तो साठ फीसद आबादी प्रभावित होती है। जब कृषि आय में गिरावट आती है तो उन लोगों की आय में भी गिरावट आती है जो गैर कृषि क्षेत्र में काम कर रहे होते हैं। पिछले चार साल में एनडीए सरकार का रिकार्ड क्या रहा? 2017-18 के आर्थिक सर्वे में कहा गया है- ‘वास्तविक कृषि जीडीपी और वास्तविक कृषि आय अभी तक भी स्थिर बने हुए हैं।’ इससे पता चलता है कि एनडीए सरकार के चार साल के कार्यकाल में कृषि की स्थिति क्या है। ऐसा क्यों हुआ? चार साल से एनडीए सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) बढ़ाती रही, जो मुश्किल से मामूली ही होता था। कृषि में सकल पूंजी निर्माण में गिरावट आई। 2013-14 में यह जीडीपी का 2.9 फीसद था, जो गिरता हुआ 2016-17 में 2.17 फीसद पर आ गया। वर्ष 2016-17 में मानसून अच्छा रहा था, लेकिन जब किसान अपनी फसल को बाजार में लेकर जाने की तैयारी में थे, तभी विमुद्रीकरण (नोटबंदी) ने जोरदार झटका दे दिया और कृषि उत्पादों के दाम एकदम से गिर गए। गैर कृषि रोजगार के लिए ग्रामीण नौजवानों की तलाश इसलिए फिजूल साबित हुई, क्योंकि नोटबंदी और खामियों से भरी हुई जीएसटी ने लघु और मध्यम कारोबारी क्षेत्र में लाखों रोजगार खत्म कर दिए। इसमें क्या कोई आश्चर्य है कि महाराष्ट्र में अपना प्रतिरोध दर्ज कराने के लिए तीस हजार किसानों ने एक सौ सत्तर किलोमीटर पैदल मार्च निकाला? उनकी मांगें कोई गैर मामूली नहीं हैं। इनमें खेती कर्ज को माफ करना, पैदावार का उचित लाभकारी मूल्य, बिना सहमति के भूमि अधिग्रहण नहीं, गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों की पेंशन बढ़ाना, ओलावृष्टि या कीटों के हमलों से होने वाले फसल के नुकसान का मुआवजा और वनाधिकार कानून के तहत मिलने वाले अधिकार जैसी मांगें शामिल हैं। किसानों की इस व्यथा को सुनने के लिए न तो संसद और न ही राज्य विधानसभाएं तैयार हैं और न कुछ करने को। किसानों का यह विरोध राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी तेजी से फैलेगा।

उपचुनावों का आश्चर्य
गोरखपुर और फूलपुर दूसरी कहानी कहते हैं, जिनमें एक विशाल ग्रामीण इलाका है और दूसरा मुख्यरूप से शहरी। गोरखपुर तथाकथित लोकतांत्रिक राज्य में एक अधिकारवादी क्षेत्र है। वहां नैतिक पुलिस (हिंदू युवा वाहिनी) का जन्म हुआ। भाजपा सरकार के राज में राज्य ने एक धर्म के प्रति झुकाव और संदिग्ध अपराधियों को मुठभेड़ में मार देने के राज्य के ‘अधिकार’ का बहुत ही निर्लज्जता के साथ बचाव किया। विकास या रोजगार को लेकर सरकार थोड़ा-सा भी कुछ करती शायद ही नजर आई। मतदाताओं, खासकर दलित, ओबीसी, अल्पसंख्यक और बेरोजगारों ने विद्रोह कर दिया है। अररिया (बिहार) में दूसरे किस्म की बगावत हुई। यह बगावत भ्रष्टाचार-विरोधी योद्धा के उस नैतिक मुखौटे के खिलाफ थी जो सत्ताधारियों ने अपनी मूर्खता, नाकामी, अवसरवाद और विकास के वादों को पूरा कर पाने में नाकाम रहने की वजह से छिपाने के लिए लगा रखा था। बिना चर्चा के वित्त विधेयक को पास कराना लोकतंत्र पर दूसरा बड़ा प्रहार है। यह सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह सदन को चलाए और सरकार से संबंधित कामकाज निपटाए। इस जिम्मेदारी से अलग हटते हुए और लोकसभा में पूर्ण बहुमत का आनंद लेते हुए सरकार विपक्ष को तिरस्कार की दृष्टि से देखती रही है, खासतौर से लोकसभा में विधेयकों को पारित कराते वक्त। सिर्फ राज्यसभा में सरकार ने विपक्ष के प्रति कुछ सम्मान दिखाया है, लेकिन एक धन विधेयक (मनी बिल) के मामले में न्यूनतम सम्मान भी नहीं दिया, जहां राज्यसभा कुछ नहीं कर सकती।

जनता की नजर
लोग नजर रखे हुए हैं। अच्छे दिन की बात अब और नहीं होती। हर वादा- पंद्रह लाख जमा कराने, हर साल दो करोड़ रोजगार देने, किसानों की आमद दुगनी करने, दो अंक वाली विकास दर, कश्मीर समस्या का स्थायी समाधान और पाकिस्तान को आखिरी सबक सिखाने- खोखला निकला और लोग इसे जान भी गए हैं। लोग यह भी जानते हैं कि मौजूदा हालात में एक भी अकेली पार्टी ऐसी नहीं है जो भाजपा को हटा सके। इसलिए वे उन उम्मीदवारों को वोट दे रहे हैं जो भाजपा उम्मीदवारों को हरा सकें। लोग मजबूत विकल्प की तलाश में हैं। यह विकल्प कर्ज माफी, कृषि उत्पादों के लिए लाभदायी मूल्य, अच्छी साख, छोटे और मझौले कारोबारों को फिर से खड़ा करके, निजी क्षेत्र के लिए स्थायी और लाभदायक कारोबारी माहौल तैयार करके, रोजगार सृजन करके और गरीब और समाज के अतिसंवेदनशील तबकों को सुरक्षा मुहैया करा कर खड़ा किया जा सकता है। औसत मतदाताओं ने जो संदेश दिया है वह जोरदार और स्पष्ट है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को यह सुनना चाहिए।

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