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दूसरी नजर: अपराध और दंड-मुक्ति

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में, जून 2017 में, सत्रह वर्षीय पीड़िता के साथ बलात्कार का आरोप सार्वजनिक जीवन में रहे एक व्यक्ति (भाजपा विधायक) और उसके साथियों पर है। दो माह बाद, पीड़िता ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर मांग की कि विधायक और उनके भाई के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाए।

Author April 22, 2018 5:27 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

दिसंबर 2012 में निर्भया के साथ बलात्कार और उस पर बर्बर हमला, और इसके बाद हुई उसकी मौत ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, जो कि इस तरह के अपराध की कोई अन्य घटना हालिया अतीत में नहीं कर सकी थी। इसे पाशविकता कह कर बयान किया गया, जो कि बहुत कम होता है। उसके साथ बलात्कार हुआ, उस के साथ बर्बरता की गई, उसे बस से बाहर निर्वस्त्र फेंक दिया गया, और मरने के लिए छोड़ दिया गया। चमत्कारिक ढंग से वह कुछ दिन जीवित रही, भयावह कहानी बताने के लिए, सिंगापुर के एक अस्पताल में अंतिम सांस लेने से पहले। बलात्कार की वजह सेक्स नहीं है। यह कल्पना करना कठिन है कि कोई किसी औरत (जो कि उससे अपनी पूरी ताकत से लड़ रही होती है) या बच्च्ची के साथ जबर्दस्ती करके यौनसुख हासिल कर सकता है। बलात्कार का संबंध स्त्री पर, खासकर स्त्री के शरीर पर पुरुष की सत्ता से है। एक असहाय बच्ची, जो कि महज कुछ महीने या कुछ ही साल की, या नाबालिग हो, उसके साथ हुए बलात्कार के मामले में हमें सेक्स और ताकत से आगे जाकर अपराधी के उस आत्म-विश्वास को समझना होगा, जो कि सारे आत्म-नियंत्रण को हटा देता है। इस तरह के लगभग सभी मामलों में, मेरा खयाल है कि आरोपी को यह अहसास रहा होगा कि वह अपराध कर रहा है, पर उसे यह भरोसा रहा होगा कि वह अपने शिकार से बहुत ताकतवर है, बलात्कार उसी ताकत का प्रदर्शन था। उसे यह भरोसा रहा होगा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां उसे दंडित नहीं करेंगी, और अगर उसे सजा देने की कोशिश की गई तो वह नाते-रिश्तेदारों या जाति-समुदाय के लोगों या पुलिस या अपनी पार्टी या अपनी सरकार से मदद का इंतजाम कर लेगा। अंतिम भरोसे का नाम है- दंड-मुक्ति। सामूहिक बलात्कार दंड-मुक्ति के भरोसे का चरम कृत्य है।

उन्नाव और कठुआ
उत्तर प्रदेश के उन्नाव में, जून 2017 में, सत्रह वर्षीय पीड़िता के साथ बलात्कार का आरोप सार्वजनिक जीवन में रहे एक व्यक्ति (भाजपा विधायक) और उसके साथियों पर है। दो माह बाद, पीड़िता ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर मांग की कि विधायक और उनके भाई के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाए। आरोप है कि अप्रैल 2018 में, मामला वापस लेने के लिए विधायक की ओर से पीड़िता के पिता को धमकियां मिलीं। स्थानीय पुलिस पर आरोप है कि वह पीड़िता के पिता को उठा ले गई, जिन्हें विधायक के भाई ने बेइंतहा मारा-पीटा। पिता को 5 अप्रैल को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, फिर सरकारी अस्पताल में। मामला 8 अप्रैल को प्रकाश में आया, जब पीड़िता और उसके परिजनों ने मुख्यमंत्री के आवास के बाहर आत्मदाह का प्रयास किया। दूसरे दिन अस्पताल में पिता की मौत हो गई। विधायक के भाई को 10 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया। मामला 12 अप्रैल को सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने 13 अप्रैल को विधायक को गिरफ्तार कर लिया। कठुआ (जम्मू व कश्मीर) में पीड़िता बेकरवाल जनजातीय समुदाय की आठ साल की बच्ची थी। आरोप है कि जनवरी 2018 में उसे एक मंदिर में हफ्ते भर बंद करके रखा गया, उसे बेहोश कर दिया गया, उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। यह सब इस इरादे से किया गया कि बेकरवाल जनजातीय समुदाय के लोग आतंकित होकर रासना इलाके से चले जाएं। मुख्य आरोपी मंदिर का रखवाला था। बाकी आरोपियों में दो पुलिस अफसर भी शामिल हैं, जिन पर आरोप है कि उन्होंने चार लाख रुपए लिये और अहम सबूत नष्ट कर दिए। राज्य की पुलिस ने तत्परता दिखाई और मुख्य आरोपी ने मार्च में आत्मसमर्पण कर दिया। हिंदू एकता मंच ने (एक भाजपा नेता की अगुआई में) रैलियां करके यह मांग उठाई कि ‘निष्पक्ष’ जांच के लिए मामला सीबीआई को सौंप दिया जाए। भाजपा से ताल्लुक रखने वाले दो मंत्रियों ने मार्च में हुई एक रैली में हिस्सा लिया। अप्रैल में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

खंडित न्याय व्यवस्था
उन्नाव और कठुआ में हुए अपराधों को अंजाम देने वाले जानते थे कि हमारी न्याय व्यवस्था खंडित हो चुकी है और जो थोड़ी-बहुत बची हुई है भी, वह भी तोड़ी-मरोड़ी जा सकती है। यह जानते हुए ही उनका यह विश्वास और पक्का हुआ था कि वे सजा से बचे रहेंगे। दंड-मुक्ति के इस विश्वास को पुख्ता करने वाले कई बयान आए। उन्नाव की घटना पर, आरोपी के एक साथी-विधायक ने कहा, ‘हो सकता है उसके पिता को कुछ लोगों ने मारा-पीटा हो, पर बलात्कार के आरोप को मानने से मैं इनकार करता हूं।’ सांसद मीनाक्षी लेखी (भाजपा प्रवक्ता) ने कहा, ‘‘कांग्रेस पहले ‘अल्पसंख्यक, अल्पसंख्यक’ चिल्लाएगी, फिर ‘दलित, दलित’, और अब ‘औरत, औरत’, और फिर किसी तरह राज्य के मुद्दों का दोष केंद्र पर मढ़ने की कोशिश करेगी।’’ चुप्पी ने दंड-मुक्ति के भरोसे को और मजबूत किया है। कठुआ में बच्ची की मौत और उन्नाव की घटना को लेकर काफी हंगामा मचने के बावजूद प्रधानमंत्री 13 अप्रैल तक कुछ नहीं बोले। भाजपा के पदाधिकारियों ने एक जैसे बने-बनाए बयान दिए, जिनमें ग्लानि का एक कतरा भी नहीं था। दोनों घटनाओं में भाजपा ने आरोपों को झुठलाने और ध्यान बंटाने की ही कोशिश की- जो कि सरासर राजनीतिकरण था- फिर भी भाजपा दूसरों को कोसती रही कि वे मामलों को राजनीतिक रंग दे रहे हैं।

दंड-मुक्ति की फितरत
स्त्रियों और बच्चियों के प्रति बढ़ रही हिंसा चिंताजनक है, पर और भी चिंताजनक यह विश्वास है कि कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, जो कि लगता है सार्वजनिक पद पर बैठे हर व्यक्ति के मन में घर कर गया है:
– यह ऐसी संस्था के हर उदाहरण में देख सकते हैं जिस पर पक्षपाती और जी-हजूरिया लोग काबिज हैं;
– एक राजनीतिक दल के हर उदाहरण में, जो चुनाव हार जाने के बावजूद राज्य में सरकार बना लेता है;
– एक मंत्री के हर अधकचरे बयान में, जो खुद को विद्वान समझते हुए दिए गए होते हैं;
– बैंकों को लूटने वाले घोटालेबाज की हिफाजत के लिए विमान की उसकी हर उड़ान में;
– विरोधियों को खरीदने या असहमति का गला घोंटने के हर प्रयास में;
– हर उस मामले में, जिसमें अभियोजन का जिम्मा सीबीआई या एनआईए का था, पर वे मामले तर्कसंगत परिणति तक नहीं पहुंच सके, क्योंकि बहुत सारे गवाह मुकर गए;
– नागरिक की आजादी या निजता का उल्लंघन करने के लिए एक एजेंसी द्वारा कानून को तोड़ने-मरोड़ने के हर खुलासे में;
– फर्जी मुठभेड़ में पुलिस द्वारा की गई हर हत्या में;
– और करोड़ों रुपए के मानहानि के हर मामले और मीडिया पर अंकुश में।
यह सब कानून के शासन की जगह दंड-मुक्ति को स्थापित करने की दिशा में ही उठाया गया कदम है। ऐसा लग सकता है कि इसे रोका नहीं जा सकता, पर यह इस पीढ़ी का कर्तव्य है कि वह इस सिलसिले को रोके और देश को दंड-मुक्ति का गणतंत्र न बनने दे।

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