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प्रसंगवश: जागीर नहीं स्त्री

महिलाओं के खिलाफ अपराधों और अत्याचारों में सजा केवल तीस प्रतिशत गुनहगारों को मिल पाती है। इस समय देश में करीब पंचानबे हजार ऐसे मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। इनका निपटरा कब होगा, दावा करना मुश्किल है।

Author May 13, 2018 06:01 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद और दहेज प्रताड़ना के मुकदमे के एक मामले में महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की कि पत्नी कोई जागीर या वस्तु नहीं, जिसे पति साथ रहने को विवश करे। एक महिला ने पति की क्रूरता से आजिज आकर उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और अदालत से गुजारिश की कि उसे तलाक चाहिए। हालांकि वह पति से न तो गुजारा भत्ता चाहती थी, न कोई मुआवजा। इसके बावजूद पति तलाक के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में सवाल लाजिमी है कि अपनी पत्नी के साथ क्रूरता से पेश आने वाला पति किस नैतिकता से उसके साथ रहना चाहता है? दांपत्य जीवन का आधार प्रेम, विश्वास और सम्मान होता है। इसका निर्वहन करके ही दांपत्य जीवन को मधुर और सुखमय बनाया जा सकता है। कभी-कभी तकरार और मनमुटाव हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समूचा दांपत्य जीवन ही दांव पर लग जाए। भारतीय परंपरा में पति-पत्नी को एक-दूसरे का सम्मान और आदर करने का उपदेश दिया गया है। पर विडंबना है कि भारतीय पुरुषवादी समाज उदात्त मूल्यों और विचारों का आदर नहीं करता। उसकी नजर में पत्नी जागीर है। यही वजह है कि उन पर शोषण और अत्याचार बढ़ता जा रहा है। नतीजा दांपत्य जीवन की चुनौतियां सघन होती जा रही हैं और पत्नी पति से अलग रहने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रही है। अचरज की बात है कि आज इक्कीसवीं सदी में भी पुरुषवादी समाज सोलहवीं सदी की मानसिकता से उबर नहीं पा रहा है। आज भी वह उसी पुरानी मान्यता पर टिका है कि एक स्त्री को बचपन में पिता के अधीन, जवानी में पति के अधीन और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहना चाहिए। पर यह नियम वह खुद पर लागू नहीं करता। पूछा जाना चाहिए कि क्या पुरुष को भी बचपन में मां के अधीन, जवानी में पत्नी के अधीन और बुढ़ापे में पुत्रवधू के अधीन नहीं रहना चाहिए? मगर वह यह तर्क सुनने को तैयार नहीं है। यानी कह सकते हैं कि सारी बंदिशें पत्नियों के लिए ही गढ़ी गई हैं। ‘जाति और योनि के कठघरे’ में डॉ लोहिया ने स्त्री को गुलाम बनाने वाली नैतिकता पर जोरदार प्रहार करते हुए लिखा है कि ‘आध्यामिकता निरपेक्ष है, पर नैतिकता सापेक्ष है। हरेक युग तथा आदमी को अपनी-अपनी नैतिकता खोजनी चाहिए।’ लेकिन अफसोसजनक है कि आधुनिक युग के पुरुषवादी समाज ने स्त्रियों के लिए नैतिकता के पैमाने तो गढ़ रखे हैं, पर खुद उस कसौटी पर खरा उतरने को तैयार नहीं। आज भी उसका विचार और दर्शन सोलहवीं सदी की तरह ही सड़ा-गला है।

इतिहास में जाएं तो स्त्रियों की स्थिति उपभोग की वस्तु जैसी ही रही है। पुरुष समाज उसे अपनी जागीर समझता रहा है। कालखंड गवाह है कि उत्तर-वैदिक काल से लेकर ब्रिटिश काल तक स्त्रियां सदैव पुरुष सत्ता की गुलाम रही हैं। मौर्यकाल में अति सुंदर स्त्रियों को विषकन्या बना कर जासूरी कराया जाता था। इस कार्य में उनके जीवन पर हमेशा संकट बना रहता था। आम्रपाली और वासवदत्ता जैसी महिलाएं नृत्यकला में पारंगत थीं। उन्हें नगरवधू बना दिया गया। वे जीवन भर देह-यातना भुगतती रहीं। सतीत्व के नाम पर एक दौर में हजारों स्त्रियों ने ‘जौहर व्रत’ ले लिया। पर अचरज की बात यह कि इतिहास में एक भी पुरुष के ‘जौहर’ का उदाहरण नहीं मिलता। आज भी स्त्रियों को गुलाम बनाने की मानसिकता ज्यों की त्यों बनी हुई है। यही वजह है कि औरतों के हित में बनाए गए तमाम कानूनों के बावजूद उन पर होने वाले अत्याचारों में कमी नहीं आ रही है। औरतें सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं हैं, बल्कि अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों से जाहिर है कि औरतों पर सर्वाधिक अत्याचार, यहां तक कि बलात्कार भी, उनके निकटस्थ लोग करते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक बलात्कार के तकरीबन पंचानबे प्रतिशत मामलों में पीड़ित लड़की बलात्कारी को अच्छी तरह जानती-पहचानती है। यानी आरोपी उसके सगे-संबंधी और रिश्तेदार-नातेदार ही होते हैं। लेकिन त्रासदी है कि वह उनके खिलाफ अपना मुंह नहीं खोल पाती। शायद वह लोकलाज से डर जाती है या फिर उसे भरोसा नहीं होता कि कानून और समाज दोषियों को दंडित कर पाएगा।

यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उजागर हो चुका है कि भारत में पंद्रह से उन्नीस साल की उम्र वाली चौंतीस प्रतिशत विवाहित महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेली है। रिपोर्ट के मुताबिक इस आयु वर्ग की सतहत्तर प्रतिशत महिलाएं कम से कम एक बार अपने पति या साथी द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने या अन्य प्रकार से यौन हिंसा का शिकार हुर्इं। लगभग इक्कीस प्रतिशत महिलाएं पंद्रह साल की उम्र से ही हिंसा झेलती रहीं। इसी आयु वर्ग की इकतालीस प्रतिशत लड़कियों ने पंद्रह साल की उम्र से अपनी मां या सौतेली मां की शारीरिक हिंसा का सामना किया, जबकि अठारह प्रतिशत को अपने पिता या सौतेले पिता के हाथों शारीरिक हिंसा झेलनी पड़ी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई थी, उनके खिलाफ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक भी थे। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च ऑन वुमन’ से उद्घाटित हुआ कि भारत में दस में से छह पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया। यह प्रवृत्ति उन लोगों में ज्यादा है जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। बावन प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें किसी न किसी रूप में हिंसा झेलनी पड़ी।

दरअसल, महिलाओं के उत्पीड़कों के मन में सजा का भय नहीं है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इन मामलों में सजा की दर बेहद कम है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों और अत्याचारों में सजा केवल तीस प्रतिशत गुनहगारों को मिल पाती है। इस समय देश में करीब पंचानबे हजार ऐसे मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। इनका निपटरा कब होगा, दावा करना मुश्किल है। भारत में हर रोज सैकड़ों महिलाओं के साथ अत्याचार होता है और बाईस महिलाओं से बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। ये वे आंकड़े हैं, जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं। अधिकतर मामलों में तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है। दूसरी ओर लोकलाज के कारण भी ऐसे मामलों को पीड़िता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जब तक महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामलों में शत-प्रतिशत गुनाहगारों को सजा नहीं मिलेगी, तब तक महिलाओं को जागीर समझने की पुरुष मानसिकता नहीं बदलेगी।

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