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दूसरी नजर: इस दिमाग के पीछे बेरहम दिल

बजट ने देश के सशस्त्र बलों को निराश किया है। वित्तमंत्री ने अपने एक घंटे पैंतालीस मिनट के भाषण में ‘प्रतिरक्षा’ शब्द एक बार भी नहीं बोला, जो हैरानी भरा है।

Economyवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और बजट तैयार करने वाली उनकी टीम के सदस्य। (फोटो- पीटीआई)

बजट 2020-21 सरकार और विपक्ष के बीच मतभेदों को खत्म करने का अवसर था। साथ ही यह उन अनुच्छेदों में संशोधन करने का भी मौका था, जो सरकार की नीतियों, काम और नाकामी की वजह से गलत समझे गए, जैसे गरीब तबकों, किसानों, प्रवासी मजदूरों, एमएसएमई क्षेत्र, मध्यवर्ग और बेरोजगारों की दीनहीन स्थिति। जिनको सबसे ज्यादा जरूरत है, उन्हें भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया। चूंकि मुझे कोई उम्मीदें नहीं थीं, इसलिए मैं निराश नहीं हूं, लेकिन अन्य लाखों लोगों को लग रहा है कि वे छले गए हैं। बजट ने बेहद अमीरों और अन्य लोगों के बीच खाई और चौड़ी कर दी है।

बजट प्रासंगिक है
यह तमिल व्याकरण का नियम है- स्थान, विषय और अवसर उसी तरह निरर्थक हो जाते हैं जैसे किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के हाथ में लैंप। इसका अर्थ यह है कि स्थान, विषय और अवसर (वक्त) से ही काम करने वालों और काम का आकलन किया जाना चाहिए। यही संदर्भ फैसलों की खूबियों को बताता है। वित्तमंत्री असाधारण परिस्थितियों में 2021-22 का बजट पेश कर रही थीं, जिनमें-

– 2018-19 और 2019-20 में गिरती विकास दर के दो साल (आठ फीसद से चार फीसद),
– एक अप्रैल 2021 से शुरू मंदी का एक साल,
– हरेक के जीवन में भारी समस्याएं, खासतौर से गरीबों के जो हर गांव, पंचायत, कस्बे और शहर की औसत आबादी का तीस फीसद हैं,
– लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए और बढ़ते कर्ज के बोझ तले दब गए,
– लाखों लोगों का रोजगार या आजीविका छिन गई,
– छह करोड़ सैंतालीस लाख लोग श्रम बल से बाहर हो गए, जिनमें 22.6 फीसद महिलाएं थीं,
– दो करोड़ अस्सी लाख लोग सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश में हैं, और
– करीब पैंतीस फीसद एमएसएमई इकाइयां स्थायी रूप से बंद हो गई हैं।

उपर्युक्त आर्थिक कारणों के इसके अलावा दो और कठोर सत्य हैं- (1) भारत की जमीन पर चीन के अवैध कब्जे ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर दिया है, और (2) स्वास्थ्य क्षेत्र संरचना को दुरुस्त करने के लिए भारी-भरकम निवेश की जरूरत है।

एक को छोड़ सभी में नाकामी
यह उस संदर्भ में है, जिसमें मैंने दो आवश्यक (स्वास्थ्य और रक्षा क्षेत्र) तथा दस चाहतों की सूची रखी थी (देखें ‘न उम्मीदें, न निराशा’, जनसत्ता 31 जनवरी, 2021)। बजट दस्तावेजों की छानबीन और वित्तमंत्री के भाषण को पढ़ने के बाद मेरा स्कोर कार्ड यह बनता है-

दो आवश्यक- दो में से शून्य
चाहतों की सूची- दस में से एक
सिर्फ एक बिंदु है, जिस पर बजट ‘पास’ हुआ है और वह है सरकार के पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी (गहरी छानबीन का विषय है यह)

बजट ने देश के सशस्त्र बलों को निराश किया है। वित्तमंत्री ने अपने एक घंटे पैंतालीस मिनट के भाषण में ‘प्रतिरक्षा’ शब्द एक बार भी नहीं बोला, जो हैरानी भरा है। 2021-22 के बजट में प्रतिरक्षा क्षेत्र के लिए तीन लाख सैंतालीस हजार अट्ठासी करोड़ रुपए रखे गए हैं, जबकि मौजूदा वित्त वर्ष के लिए यह संशोधित अनुमान तीन लाख तैंतालीस आठ सौ बाईस करोड़ रुपए है, यानी सिर्फ तीन हजार दो सौ छियासठ करोड़ रुपए ज्यादा। मुद्रास्फीति का प्रवाधान करके यह आबंटन अगले साल कम है।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी वित्तमंत्री ने बड़ी चतुराई दिखाई। उन्होंने गर्व के साथ एलान किया कि अगले साल आबंटन 94452 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 223846 करोड़ रुपए किया यानी एक सौ सैंतीस फीसद बढ़ाया जा रहा है। कुछ ही घंटों में यह झांसा समझ में आ गया, बजट प्रभाग ने ‘बजट एक नजर में’ (पेज 10) में सही आंकड़ों का खुलासा कर दिया था। यह था- 2020-21 के लिए संशोधित अनुमान 82445 करोड़ रुपए और 2021-22 के लिए बजट अनुमान 74602 करोड़ रुपए। आकर्षक वृद्धि से कहीं दूर यह आबंटन घटा दिया गया। जादूगर ने बड़ी चतुराई से आंकड़े बढ़ाने के लिए चुपचाप एक बार के टीकाकरण का खर्च, पेयजल और स्वच्छता विभाग को किया गया आबंटन और राज्यों को पेयजल और स्वच्छता और स्वास्थ्य के लिए दिए जाने वाले वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुदान को भी इसमें जोड़ दिया।

दो जरूरी क्षेत्रों जिन पर कोई समझौता नहीं हो सकता, को छोड़ कर वित्तमंत्री ने अर्थव्यवस्था के सबसे निचले तबके के बीस-तीस फीसद परिवारों या एमएसएमई और उनमें काम करने वालों के बारे में एक शब्द नहीं बोला। उन्होंने दूरसंचार, बिजली, खनन, उड्डयन और यात्रा, पर्यटन और मेजबानी जैसे बीमार क्षेत्रों के लिए किसी क्षेत्र-विशेष के लिए पैकेज की घोषणा नहीं की। उन्होंने जीएसटी की दरों में कोई कमी नहीं की, बजाय इसके उन्होंने पेट्रोल, डीजल सहित कई तरह के उत्पादों पर उपकर थोप दिए, जो राज्यों की वित्तीय स्थिति के लिए झटके से कम नहीं है। पूंजीगत खर्च को छोड़ कर हर मामले में उन्होंने लोगों को निराश किया।

सिर्फ अमीरों के लिए
पूंजीगत खर्च में भी कोई साहस या कल्पनाशीलता नजर नहीं आती। 31 मार्च, 2021 तक वित्तमंत्री 1052318 करोड़ रुपए की अतिरिक्त उधारी लेंगी, लेकिन पूंजीगत खर्च सिर्फ 27078 करोड़ रुपए होगा! पूंजीगत संपत्तियों के निर्माण के लिए मदद में हम अनुदानों को जोड़ सकते हैं, जो अतिरिक्त 23876 करोड़ रुपए था। बाकी रकम 380297 करोड़ रुपए के राजस्व खर्च, 465773 करोड़ रुपए की राजस्व प्राप्तियों में कमी और 178000 करोड़ रुपए से होने वाले विनिवेश के लक्ष्य की भरपाई के लिए रख ली गई।

वित्तीय घाटे (साढ़े नौ फीसद) को साधने के लिए वित्तमंत्री के खर्च, खर्च और खर्च के दावे के उलट सच्चाई यह है कि उन्होंने कर और गैर-कर राजस्व संग्रह को शामिल नहीं किया जिसे उन्होंने बजट में रखा था। न ही बजटीय राशि में राजस्व खर्च को रखा। उनके पास कोई विकल्प नहीं था सिवाय भरपाई के लिए उधार लेने के अलावा।

गरीब, प्रवासी मजदूर परिवार, दिहाड़ी मजदूर, छोटे किसान, एमएसएमई के मालिक, बेरोजगार (और उनके परिवार) और मध्यवर्ग अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। चूंकि अखबारों में उनके लिए कोई जगह नहीं बची है, इसलिए वे सोशल मीडिया पर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं।

मैं इससे इनकार नहीं करूंगा कि इसके पीछे जरूर कोई चतुर खोपड़ी रही होगी, जिसने कहा होगा कि गरीबों को दफन करने तथा अमीरों को और अमीर बनाने वाला बजट बनाया जाए। इसमें कोई शक नहीं कि बजट हृदयहीन है।

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