ताज़ा खबर
 

तीरंदाज: टहलने वाले टहलाने वाले

पैदल यात्राओं को साइकिल, रथ और ट्रेन ने विलुप्त कर दिया और फिर हवाई यात्राएं शुरू हो गईं। अपना जनसंपर्क और जन जागरूकता बढ़ाने के लिए सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नायकों ने आसमानी यात्राएं शुरू कर दी थी।

Author Published on: September 1, 2019 1:28 AM
शाम को टहलने वाले निश्चिंत होकर निकलते हैं।

अश्विनी भटनागर

ज्यादातर लोग सुबह उठ कर सैर करना पसंद करते हैं। उनका मानना है कि सुबह की ताजा हवा सेहत के लिए बेहद लाभकारी होती है। डॉक्टरों का भी कहना है कि सुबह की चहलकदमी से कई तरह के फायदे होते हैं। पर साथ में वे कहते हैं कि अगर सुबह मुमकिन न हो पाए, तो शाम को जरूर पैरों को थोड़ा अभ्यास करा देना चाहिए। सेहतमंद रहने के लिए कुछ हजार कदम हर रोज चलना जरूरी है।
पर कुछ लोग सूरजमुखी होते हैं, तो कुछ चंद्रमुखी। दूसरे शब्दों में, कुछ सुबह तड़के ही उठ जाते हैं, जबकि बाकी अपनी दिनचर्या देर से शुरू करते हैं। जैसे जैसे दिन ढलता है, इन लोगों की ऊर्जा बढ़ती जाती है, क्योंकि उनकी सृजनशीलता निशा की गहनता के साथ जुड़ी होती है। मैं अपने को चंद्रमुखी मानता हूं और इसीलिए मेरा टहलना हमेशा शाम को ही हो पाता है।

चंद्रमुखी प्रवृत्ति के आलावा, देर शाम को घर से निकल कर ‘वॉक’ पर जाने के और भी कई लाभ हैं। सबसे बड़ा लाभ निश्चिंत संपर्क का है। अगर आप देखें तो सुबह जो लोग घूमने निकलते हैं उनका सारा ध्यान अपने पर रहता है। उन्हें अपनी दिनचर्या शुरू करनी होती है और उससे पहले उन्हें ‘वॉक’ वाला निश्चित काम पूरा करना है। उसके लिए उन्होंने एक समय सीमा तय की हुई होती है- यानी इतने किलोमीटर, इतने समय में करना है। साथ ही उनके दिमाग में आने वाले दिन में उन्हें क्या करना है और कैसे करना है की उधेड़बुन घुमड़ रही होती है। उनका सारा ध्यान फौजी तरीके से व्यायाम करने पर होता है। उनका लक्ष्य निश्चित होता है, पर मन निश्चिंत नहीं होता है।

शाम को टहलने वाले निश्चिंत होकर निकलते हैं। दिन भर की गहमागहमी पीछे छूट चुकी होती है। जो होना था वह हो चुका होता है। शाम को वे निश्चिंत होते हैं। उनके लिए यह वक्त मनन का होता है। टहलते हुए वे लंबी सांस भर कर अपने में गोता लगा सकते हैं। उन्हें घर लौट कर कहीं जाना नहीं होता, वे आराम से पैंतालीस मिनट के बजाय एक घंटा या दो घंटा भी टहल सकते हैं। वे घड़ी के गुलाम नहीं होते, बल्कि अपने मन के मालिक होते हैं। उनका जब तक मन करेगा, वे कदम बढ़ाते जाएंगे और जब मन भर जाएगा तो लौट लेंगे।

बच्चों को स्कूल भेजने से अपने आॅफिस जाने तक की जल्दी उनके दिमाग पर हावी नहीं होती है, जो कि सुबह टहलते समय होना लाजमी है, इसलिए वॉक के कई मकसद हो जाते हैं। कम से कम मेरा एक मकसद आसपास की जिंदगी और लोगों से परिचित होना है। सुबह यह मुमकिन नहीं है। सुबह वही लोग मिलते हैं, जो आप जैसे ही हैं। वे जल्दी में होते हैं। बाकी के लोग और उनकी जिंदगियां भोर में अलसाई हुई, दुबकी हुई रहती है।

इसके विपरीत, देर शाम को मजमा लगा होता है। सबके पास कुछ न कुछ कहने को होता है। वे दिन भर का रोमांच, दुख-दर्द बांटने, हंसी-ठट्ठा करने के लिए आतुर होते हैं। चलते-चलते ही आपको ऐसे मंजर दिख जाएंगे, जो आपका ध्यान बरबस ही अपनी तरफ खींच लेंगे। या फिर किसी की बातचीत की फुहार मन को होली के रंगों से पुलकित कर देगी। कहीं पास वाली गुमटी में बहस हो रही होगी, तो कहीं किसी झुग्गी में दुलार हो रहा होगा। बड़ी चमचमाती गाड़ियां फर्रांटे से गुजर जाती होंगी, तो कहीं रिक्शा वाला मुंह लटकाए सवारी का इंतजार कर रहा होगा। थोड़ी-सी दूर पर स्ट्रीट फूड पर लोग मक्खियों की तरह भिनभिना रहे होंगे, तो उसकी बगल में भी भूखे पेट पल रहे होंगे। वास्तव में जिंदगी से असल मुलाकात शाम को ही होती है। इसीलिए शाम का घूमना मन, मस्तिष्क और शरीर के स्वास्थ के लिए सबसे लाभकारी है। संध्या में ही जीवंत सत्य के दर्शन हो सकते हैं।

पैदल चलने से जागरूकता उत्पन्न होती है। जागरूकता विभिन्न प्रकार की हो सकती है- व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक या फिर राजनीतिक। पैदल चलने से अपना सच सामने आ जाता है और साथ में दूसरों का भी। अगर हम इस सच को अपने में संग्रहित कर लेते हैं, तो व्यक्ति की सच्चाई एक मशाल की तरह से हो जाती है, जिससे सैकड़ों और मशालें जल उठती हैं। आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत को पैदल चल कर नापा और वेदांत की मशाल से हमारे धर्म और समाज को रोशन किया। उनसे पहले गौतम बुद्ध थे। समकालीन इतिहास में महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से डांडी तक की पैदल यात्रा कर के आजाद हिंद की प्रस्तावना की थी। विनोबा भावे का भूदान आंदोलन उनकी यात्राओं पर आधारित था।

राजनीति के क्षेत्र में, जब 1977 में इंदिरा गांधी चुनाव में बुरी तरह से परास्त हुई थीं, तो सत्ता में लौटने की कवायद उन्होंने सुदूर बिहार में स्थित बेलची गांव पहुंचने ले लिए नदी-नाला पार करके शुरू की थी। वे बाढ़ग्रस्त नदी में घुटनों तक पानी में उतर गई थीं, जब उन्हें गांव वालों ने कहीं से एक हाथी उपलब्ध करवा दिया था। 1983 में समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने भारत के दक्षिण से दिल्ली तक की पैदल यात्रा की थी। वे इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ जनचेतना जगाना चाहते थे। इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ अभियान साइकिल यात्रा से शुरू किया था और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राम जन्मभूमि आंदोलन को अपनी रथयात्रा से संचालित किया था। राजीव गांधी ने 1990 में सत्ता से हटने के बाद ट्रेन यात्रा शुरू की थी।

पैदल यात्राओं को साइकिल, रथ और ट्रेन ने विलुप्त कर दिया और फिर हवाई यात्राएं शुरू हो गर्इं। अपना जनसंपर्क और जन जागरूकता बढ़ाने के लिए सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नायकों ने आसमानी यात्राएं शुरू कर दी थी। अब उनके पास अपनी बात कहने का सुलभ यंत्र था। पर दूसरे की बात सुनने का कोई तंत्र नहीं था। वे उड़ कर आने लगे थे, उड़ी-उड़ी बातें बांच कर हवा में गायब हो जाते थे। हवाई मंत्र यंत्र का तंत्र बन चला था। लोकतंत्र, राजतंत्र और यहां तक कि विचार तंत्र भी अब इस मंत्र के जाप पर दीर्घ आयु पा रहा था। पर हम और आप आज भी टहल रहे हैं। प्रदूषित हवा से स्वास्थ्य लाभ लेने का अपना हौसला बनाए हुए हैं। सड़क के आदमी के लिए यह एक घोर विडंबना नहीं तो और क्या है!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 वक्त़ की नब्ज़: अमन की कोशिशें तेज हों
2 किताबें मिलीं: स्वाधीन होने का अर्थ और कविता, साहित्य में अनामंत्रित, मन
3 वक्त की नब्ज: जो उनके साथ हुआ…