ताज़ा खबर
 
title-bar

तीरंदाज: पूर्वाग्रह के पांव

विवेकशील प्रतीत होने वाले व्यक्ति भी ज्यादातर नासमझ और तर्कशून्य होते हैं और वे सामान्य लोगों की तरह ही अपने बने-बनाए मत को बदलने से बचते हैं। मसलन, अगर किसी कारण से हम मानने लगें कि सूरज पूरब से नहीं, बल्कि पश्चिम से निकलता है, तो सारी दलीलों और तथ्यों को सुनने के बाद भी हम अपना मत नहीं बदलेंगे।

Author April 21, 2019 4:13 AM
मनुष्य जितना अंतमुर्खी होगा उतना ही वह भौतिक जगत का उपभोग कम करेगा।

अश्विनी भटनागर

लगभग पैंतालीस साल पहले, 1975 में, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक अध्ययन किया था, जो आज की परिस्थितियों को समझने के लिए बेहद उपयोगी है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह जानना था कि अगर हम कोई धारणा, विचार या मत बना लेते हैं, तो बाद में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उसको बदलने के लिए तैयार होते हैं या नहीं।  यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने अपने शोध में पाया कि एक बार जो धारणा हम बना लेते हैं, उसे तब भी नहीं बदलते, जब नई जानकारी यह साबित कर देती है कि हमारा मत एकदम गलत था। उनका कहना था कि हम अपनी धारणा से चिपके रहते हैं, चाहे हमारे सामने कोई भी तर्कपूर्ण दलील कितने भी प्रभावी तरीके से क्यों न रखी जाए। इस अध्ययन से एक और चौंकाने वाली बात निकल कर आई थी कि आमतौर पर हममें तर्क और प्रमाण के आधार पर सोचने की कुव्वत न के बराबर है।

कुछ समय पहले अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘न्यू यॉर्कर’ ने इस संबंध में एक लेख छापा था, जिसमें कई और अध्ययनों के आधार पर कहा गया था कि विवेकशील प्रतीत होने वाले व्यक्ति भी ज्यादातर नासमझ और तर्कशून्य होते हैं और वे सामान्य लोगों की तरह ही अपने बने-बनाए मत को बदलने से बचते हैं। मसलन, अगर किसी कारण से हम मानने लगें कि सूरज पूरब से नहीं, बल्कि पश्चिम से निकलता है, तो सारी दलीलों और तथ्यों को सुनने के बाद भी हम अपना मत नहीं बदलेंगे।

पर ऐसा क्यों है? अमूमन यह कहा जाता है कि मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो विवेकशील और तर्कनिष्ठ है। हजारों सालों से अनवरत चली आ रही विज्ञान और दर्शनशास्त्र में प्रगति इस बात का पक्का सबूत है कि मनुष्य जाति अपने विवेक के कारण अन्य प्राणियों से अलग है। वह अपना मत बदलती है और विवेक के आधार पर नई परिकल्पनाओं को ठोस आकार देती है।

संज्ञानात्मक विज्ञान (कॉग्निटिव साइंस) के विशेषज्ञ ह्यूगो मर्सिएर और डेन स्पर्बर ने अपनी किताब ‘द एनिग्मा आॅफ रीजन’ में बताया है कि मानव चेतनता, जिसे औवित्य या अंग्रेजी में रीजन कहा जाता है, क्रमागत उन्नति का लक्षण है। दूसरे शब्दों में चेतनता एक ‘इवॉल्वड ट्रेड’ है, जिसकी क्रमागत उन्नति ठीक उसी तरह से हुई है जैसे कि हमारा चार के बजाय दो पैरों पर चलना हुआ है। उनका कहना है कि मनुष्य जाति की विशेषता उसकी एक-दूसरे के साथ मिल कर काम करने की प्रवृत्ति है। पर सहयोग स्थापित करना और फिर उसको चलाए रखना एक टेढ़ी खीर है। तर्क, विवेक या रीजन की उत्पत्ति और विकास गूढ़ प्रश्नों का अर्थ समझने के लिए नहीं, बल्कि समूह में सहयोग बनाए रखने के लिए और उससे उपजी समस्याओं से निपटने के लिए हुआ था। शोधकर्ताओं के अनुसार, चूंकि मनुष्य अति सामाजिक प्राणी है, इसलिए जो विचार बुद्धिवादी दृष्टि से बचकाने लगते हैं, वे वास्तव में सामाजिक विमर्श और क्रिया के नजरिए से चतुर होते हैं और उपयोगी भी।

इस संदर्भ में पुष्टि पूर्वाग्रह (कन्फर्मेशन बायस) को ही ले लीजिए। यह जनमानस की वह प्रवृत्ति है, जो उस सूचना, तथ्य आदि को तो तुरंत ग्रहण कर लेती है, जो हमारे पूर्वाग्रह से मेल खाते हैं, पर उन सब तथ्यों को नकार देती है, जो पूर्वाग्रह से मेल नहीं खाते हैं। कन्फर्मेशन बायस को साबित करने के लिए स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कई शोध हुए हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि हम तथ्यों की पूरी जानकारी के बावजूद उनके निष्कर्षों से अपनी आंखें मोड़ लेते हैं, जो हमारे पूर्वाग्रहों के विपरीत है।

वास्तव में हम अपने पूर्वाग्रहों, चाहे वे सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक या आर्थिक हों, के प्रति इस कदर समर्पित हैं कि उनको लगातार और मजबूत करने के लिए सहायक तथ्यों की तलाश में रहते हैं और विपरीत परिदृश्य को अनदेखा करते रहते हैं। इसी वजह से, शोधकर्ताओं का कहना है, हम अमूमन दूसरों के तर्क और विचारों में तो फौरन त्रुटि पकड़ लेते हैं, पर अपनी कमी नहीं पकड़ पाते हैं। यह प्रवृत्ति ठीक उस चूहे जैसी है, जो अपने पूर्वाग्रह की वजह से आश्वस्त है कि आसपास बिल्ली नहीं है और उसकी अपने तरीके से पुष्टि करने के चक्कर में बिल्ली के झपट्टे में आ जाता है। वह वास्तविक तथ्य कि बिल्ली पास ही में है, को बिल्कुल तवज्जो नहीं देता है।

अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि हम एकल व्यक्ति की तरह नहीं सोचते हैं। हमारी सोच सहकारिता पर आधारित है। एक व्यक्ति का विशेष ज्ञान, सामान्य क्रिया के रूप में औरों को उपलब्ध होता है। मसलन, कार बनाने का ज्ञान कुछ ही लोगों के पास है, पर उन्होंने इसको हर व्यक्ति के लिए सरल बना कर सामाजिक उपयोग के लिए उपलब्ध करा दिया है। हमको यह जानने की जरूरत नहीं है कि कार कैसे चलती है। हमें महज उसे चलाने से मतलब है। इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञान के बढ़ने के साथ अज्ञानता भी उसी दर से बढ़ती गई है। हम एक-दूसरे से पूछ कर काम चला लेते हैं और इसी पूछताछ की वजह से पूर्वाग्रह स्थापित और विकसित हो जाते हैं। ‘बड़े बूढ़े कह गए हैं’ जैसे पूर्वाग्रह इस प्रवृत्ति की मिसाल हैं।

यहां तक तो ठीक है, पर असली समस्या राजनीति, लोकनीति और राष्ट्रनीति के क्षेत्र में आती है। लोगों में मजबूत धारणाएं अमूमन गहरी जानकारी की वजह से नहीं बनती, बल्कि समाज में प्रचलित पूर्वाग्रहों से जन्म लेती हैं। यह पूर्वाग्रह प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में आम लोगों में निहित रहते हैं और चाहे कितनी भी वैज्ञानिक तथ्यपरक जानकारी दी जाए, हम अपनी धारणा बदलने में अक्षम रहते हैं। टीकाकरण अभियान इसका सबसे बड़ा उदहारण है। विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि टीकाकरण से कोई नुकसान नहीं होता है, पर आज भी दुनिया के हर कोने में ऐसे समुदाय हैं, जो अपनी धारणा पर कायम हैं और बच्च्चों को टीकाकरण से दूर रखते हैं।

एक और रोचक बात यह है कि हम जिन मुद्दों को जितना कम जानते हैं, उन पर हमारी राय उतनी ही तीखी होती है। शोधकर्ताओं के अनुसार धारणा जानकारी पर निर्भर नहीं होती है। कोई एक व्यक्ति पूर्वाग्रह की वजह से किसी मुद्दे पर अपनी आधारहीन धारणा बना लेता है और फिर अपने ही तरीके के दूसरे व्यक्ति को उस धारणा को हस्तांतरित कर देता है, जो कि उसे तीसरे को बिना सोचे-परखे आगे बढ़ा देता है। इस तरह तथ्यहीन धारणा का घेरा बन जाता है, जिसके अंदर बैठे लोग आत्मतुष्ट होकर प्रस्तुत तथ्यों को नकारते रहते हैं। वैकल्पिक तथ्य वास्तविक तथ्यों का स्थान ले लेते हैं।

जब आत्मतुष्ट लोगों का घेरा बहुत बड़ा हो जाता है, तो लोकनीति और जनसंवाद अपने सच को नकार कर तथ्यहीन पूर्वाग्रहों के बल पर चल निकलता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि टीवी चैनल इसी वजह से किसी मुद्दे को समझाने के बजाय उस पर बहस आयोजित करते हैं, जिससे राजनीतिक एजेंडा वाले पूर्वाग्रह जनमानस में और मजबूत हो जाएं। इसका उद्देश्य कन्फर्मेशन बायस से जुड़ा है। हमें अच्छा लगता है जब हमारी धारणा की तस्दीक और लोग करते हैं। शोध के अनुसार, जब कोई हमारी हां में हां मिलाता है, तो खुशी का तत्त्व डोपामाइन रिलीज होता है। इसी वजह से हम अपनी जैसी धारणा रखने वालों से बातचीत करते हैं तो प्रसन्न हो जाते हैं। प्रसन्नता समाज के लिए अच्छी बात है, पर जब ज्यादा हो जाती है तो उसके लिए घातक हो जाती है। आत्ममुग्ध समाज जल्दी ही सयानी बिल्ली का भोजन बन जाता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App