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शख्सियत: अमृता प्रीतम

अमृता ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर बिताया। उन्होंने खुल कर प्रेम किया तो खुल कर इजहार भी किया। इसी वजह से अमृता का व्यक्तिगत जीवन विवादास्पद रहा।

Author Published on: August 25, 2019 3:23 AM

जन्म : 31 अगस्त, 1919
निधन : 31 अक्तूबर, 2005

अमृता प्रीतम पंजाबी भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री थीं। लेखन के अलावा वे अपने बेबाकपन और अपने व्यक्तिगत जीवन के लिए चर्चाओं में रहीं। अमृता प्रीतम का असली नाम अमृता कौर था। उनका जन्म पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। अमृता प्रीतम के पिता करतार सिंह कवि, ब्रजभाषा के विद्वान और संपादक थे। मां के निधन के बाद अमृता अपने पिता के साथ लाहौर आ गर्इं और देश विभाजन तक वहीं रहीं।

अकेलापन और लेखन
घर की जिम्मेदारियों और अकेलेपन को दूर करने के लिए अमृता ने बहुत छोटी उम्र से लिखना शुरू कर दिया। महज सोलह साल की उम्र में उनकी पहली किताब 1936 में ‘अमृत लहरें’ प्रकाशित हुई। इसी साल उनकी शादी प्रीतम सिंह से हुई और वे अमृता कौर से अमृता प्रीतम बन गर्इं। हालांकि उन्होंने रूमानी कवि के रूप में अपनी यात्रा शुरू की, लेकिन जल्द ही प्रगतिशील लेखकों के आंदोलन का हिस्सा बन गर्इं। 1944 में उन्होंने ‘लोक पीड’ लिखा, जिसमें उन्होंने 1943 के बंगाल के अकाल के बाद युद्धग्रस्त अर्थव्यवस्था की खुल कर आलोचना की। लेखन के साथ वे कई सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी रहीं।

विवादास्पद जीवन
अमृता ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर बिताया। उन्होंने खुल कर प्रेम किया तो खुल कर इजहार भी किया। इसी वजह से अमृता का व्यक्तिगत जीवन विवादास्पद रहा। प्रीतम सिंह से शादी और दो बच्चों के बावजूद उन्होंने साहिर लुधियानवी से बेपनाह मुहब्बत की। इस वजह से उन्होंने 1960 में अपने परिवार से अलग होने का फैसला किया। हालांकि अमृता को साहिर का साथ भी बहुत नहीं मिला। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम चालीस वर्ष इमरोज के साथ बिताए, जिन्होंने अमृता की अधिकतर किताबों के कवर पेज डिजाइन किए हैं और अमृता को अपने कई चित्रों का विषय बनाया।

चर्चित कृतियां
अमृता की कविताएं भावना, प्रेम और संवेदनाओं से भरी होती थीं। उन्होंने अठाईस उपन्यास, अठारह गद्य संकलन, पांच लघु कथाएं और सोलह विविध गद्य खंड लिखे। उनकी किताबों का भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया।
उपन्यास : पांच बरस लंबी सड़क, पिंजर, अदालत, कोरे कागज, उन्चास दिन, सागर और सीपियां। आत्मकथा : रसीदी टिकट। कहानी संग्रह : हीरे दी कनी, लातियां दी छोकरी। कविता संग्रह : लोक पीड़, मैं जमा तू, कस्तूरी, कागज ते कैनवस। गद्य कृतियां : किरमिची लकीरें, काला गुलाब, अग दिया लकीरा, इकी पत्तियां दा गुलाब, सफरनामा।

पुरस्कार तथा सम्मान
अमृता पंजाब रतन पाने वाली पहली रचनाकार थीं। उन्हें 1956 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। 1982 में उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2004 में उन्हें पद्म विभूषण प्रदान किया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय, जबलपुर विश्वविद्यालय, विश्व भारती सहित कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। उन्हें 1986-92 में राज्यसभा सदस्य के रूप में नामित किया गया था। जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें पाकिस्तान की पंजाबी अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया।

गुलजार का ऑडियो एलबम
गीतकार गुलजार ने 2007 में ‘अमृता रिसाइट बाय गुलजार’ नामक एक ऑडियो एल्बम जारी किया था, जिसमें उन्होंने अमृता प्रीतम की कविताओं का पाठ किया था।
निधन : लंबी बीमारी के बाद 31 अक्तूबर, 2005 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

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