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तीरंदाज: हठ और होड़

अमेरिका ने जब अपोलो यान चांद पर उतारा था, तो वह रूस से होड़ की वजह से छोड़ा था। 1960 के दशक में दोनों देशों में चंद खिलौना पाने की जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा थी। अमेरिका रूस को अंगूठा दिखाना चाहता था।

Author Published on: September 8, 2019 1:00 AM
चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम के अंतिम क्षणों में जमीनी स्टेशन से संपर्क टूटा फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

अश्विनी भटनागर

मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं।
जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं॥

भक्त सूरदास की ये प्रसिद्ध पंक्तियां जहां एक तरफ कृष्ण के बाल हठ को दर्शाती हैं वहीं दूसरी तरफ इंसान की गगनचुंबी महत्त्वाकांक्षाओं की भी प्रतीक हैं। इस दोहे में कृष्ण अपनी माता यशोदा से कह रहे हैं कि उनको चांद चाहिए, जिससे वे एक खिलौने की तरह खेल सकें। वे कहते हैं कि वे यशोदा मइया की गोदी में तभी चढ़ेंगे, जब वे दूर गगन में रौशन अपने खिलौने को लेकर पुन: धरती पर लौटेंगे। कृष्ण विष्णु के अवतार थे। बाल अवस्था होने के बावजूद उनमें यह सामर्थ्य थी कि आसमान में टंके चंद्रमा को धरती पर उतार सकें। सामान्य मनुष्य में ऐसी सामर्थ्य नहीं है, पर गगन में गमन और चांद सितारों को अपनी मुठ्ठी में कर लेने की महत्त्वाकांक्षा उसमें लगातार हिलोरें मारती रही है।

वास्तव में हम अपनी हदों में बंधे रहना नहीं चाहते हैं। शायद प्रस्तुत हद के खंूटे से बंधे रहना मानव प्रवृत्ति के विरुद्ध है। हम अपनी परिधि को लांघने के लिए स्वत: आंदोलित रहते हैं। ये सीमाएं व्यक्तिगत, सामाजिक हो सकती हैं या फिर व्यापक संदर्भ में भी हो सकती हैं। चंद खिलौना लेने का मासूम-सा हठ आगे चल कर एक ऐतिहासिक क्रिया भी बन सकता है। अपोलो के एस्ट्रोनॉट नील आर्मस्ट्रांग जब चंद्रमा पर उतरे थे, तो कहा था कि उनका चांद पर पहला छोटा-सा कदम मानवता के लिए एक लंबी छलांग है। सच में, चांद की तरफ चकोर की तरह सिर्फ देखने और फिर उस तक पहुंचने का सपना केवल मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा ही पूरा कर सकती है। हमारी जो कुछ भी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक उपलब्धि है, वह हमने अपनी प्रस्तुत सीमाओं को पार करके प्राप्त की है।

महत्त्वाकांक्षी होना अच्छी बात है। हर व्यक्ति और समाज को महत्त्वाकांक्षी होना चाहिए। पर महत्त्वाकांक्षा और होड़ में एक बड़ा बुनियादी फर्क है। आम जिंदगी में हम होड़ में लगे रहते हैं। कौन कितना आगे निकल गया और हम उसको कैसे पछाड़ें के खेल में फंस जाते हैं। इस प्रतिस्पर्धा को अंग्रेजी में रैट रेस यानी चूहा दौड़ कहा जाता है। इसमें हमारा कोई अपना निश्चित लक्ष्य नहीं होता है। हम बस इस बात पर केंद्रित रहते हैं कि हमसे आगे वाला आगे क्यों है और हम उसको कैसे पीछे छोड़ें। रैट रेस विवेकहीन होती है, इसलिए अंधी होती है।

अमेरिका ने जब अपोलो यान चांद पर उतारा था, तो वह रूस से होड़ की वजह से छोड़ा था। 1960 के दशक में दोनों देशों में चंद खिलौना पाने की जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा थी। अमेरिका रूस को अंगूठा दिखाना चाहता था। पर कुछ और अपोलो मिशन के बाद इस रैट रेस का कोई मतलब नहीं रह गया था और चंद्रयान जाने बंद हो गए थे। हां, इससे कुछ वैज्ञानिक फायदे हुए थे, जिनमें सबसे बड़ा सेटेलाइट युग की शुरुआत थी। आज की अति आधुनिक सेटेलाइट आधारित संचार व्यवस्था परोक्ष रूप से अंतरिक्ष कार्यक्रम की देन है। अगर हम चांद पर नहीं जाते, तो मोबाइल पर कैसे बात कर पाते? पर चांद का मुआयना करने के बाद वहां और श्रम करने का प्रयास दोनों- अमेरिका और रूस- ने त्याग दिया था।

अक्सर समाज की आकांक्षा व्यक्ति की महत्त्वाभिलाषा की दास हो जाती है। ग्रीस आज से तेरह सौ साल पहले चौतरफा विकास के पथ पर था। वह एक बड़ा और समृद्ध राष्ट्र ही नहीं था, बल्कि उसमें अरस्तू और प्लेटो जैसे महापंडित भी पुष्पित हो रहे थे। फिर सिकंदर आया और वह दुनिया जीतने की होड़ में लग गया। हाथ में तलवार लिए वह ग्रीस से हिंदुस्तान तक अपना जयघोष करता हुआ चला आया। हजारों लोग उसका शिकार हुए और लाखों घर उजड़ गए। पर सिकंदर के लिए सिर्फ जीत एकमात्र उपलब्धि थी। वह केवल ग्रीस का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का राजा बनना चाहता था। सेना उसके साथ थी- वह उसको अपना महानायक मानती थी।

सिकंदर हिंदुस्तान तक पहुंच गया। कहीं भी नहीं हारा था, पर हिंदुस्तान में जीत के बाद वह टूट गया। उसके अपनों ने ही विद्रोह कर दिया था और विश्वनायक को उनके आगे घुटने टेकने पड़े थे। सिकंदर लौट गया, पर घर का मुंह नहीं देख पाया था। वह रास्ते में ही मर गया। उसकी मौत के बाद ग्रीस का वैभवशाली साम्राज्य बिखर गया था। विश्वविजयी होने की लालसा में उसने अपने घर को ही जला दिया था। न वह कहीं का रहा था और न ही ग्रीक साम्राज्य किसी काबिल बचा था।

तो क्या महत्त्वाकांक्षा की भी कोई हद होनी चाहिए? क्या व्यक्ति की लालसा देश और काल पर हावी होनी चाहिए? एक तरह से देखें तो नायक, नायक तभी बन पाता है, जब उसे समुदाय की स्वीकृति मिलती है। वह नेतृत्व करने की स्थिति में तब आता है, जब लोग उसके पीछे लामबंद हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, नायक वही बन पाता है, जो हमारे अनकहे भावों को जुबान देता है। हमारे दिल में छिपी बात को पहचान कर उसको प्रकट कर देता है।

हम उसको ऐसा करने पर दाद भी देते हैं, क्योंकि अपनी बात कहने की हमारी खुद की हिम्मत नहीं होती है। उसकी हिम्मत में अपने साहस की अनुभूति कर हम प्रफुल्लित हो जाते हैं। शायद उसके पीछे दुबकने में ही अपना शौर्य समझते हैं। समाज में मातहत की प्रवृत्ति तरह-तरह के नायक बनाती है। ऐसे नायक समाज की महत्त्वाकांक्षा का अपहरण कर लेते हैं। व्यक्तिनिष्ठ समाज अपने खुद के लिए घातक होता है। इसके विपरीत जन-केंद्रित, संस्था-निष्ठ समाज और देश हमेशा स्वस्थ और विवेकशील रहता है।

संस्थाएं समाज की महत्त्वाकांक्षाओं को संगठित बुद्धिमत्ता से तोलती हैं और नायकों की महत्त्वाभिलाषा को खरे खूंटों से बांधती हैं। वे निजी स्वार्थ की सीमाएं निर्धारित करती हैं और देशहित को व्यापक रूप से परिभाषित करती हैं। संस्थाएं चंद खिलौना लैहौं वाला हठ नहीं करती हैं, बल्कि अपनी धरती से अच्छी फसल उगाने की मशक्कत में हल-बैल लेकर जुटी रहती हैं। वे सिकंदर को टूटने से बचाती हैं। साम्राज्य की महत्त्वाकांक्षा से स्वराज के यथार्थ की ओर उन्मुख करती हैं। प्रतिस्पर्धा से हटा कर श्रेष्ठता की वैजंती प्रदान करती हैं।

 

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