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उद्धरणवादी लेखन की बढ़ती प्रवृत्ति

उद्धरण सुविधानुसार चुनना और बेमेल खिचड़ी बना देना, बहुत हद तक हमारे आलोचनात्मक विवेक को कमजोर बनाता है। अपना मत स्थिर करने के लिए बहुपठित होना आवश्यक है, लेकिन उद्धरणों का आतंक पैदा करना सिरे से गलत है।

Author December 9, 2018 2:40 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

राजेश मल्ल

यों तो ज्ञान-विचार का कोई देश नहीं होता, लेकिन यह भी सही है कि कोई भी विचार-ज्ञान देश-काल निरपेक्ष भी नहीं होता। विज्ञान की बात अलग है। इस संदर्भ में महत्त्व की बात यह है कि किसी भी चिंतक-विचारक के उद्धरण को देश-काल निरपेक्ष मान कर उद्धृत किया जाए और उसकी व्याख्या करते समय विवेक मुक्त हो जाया जाए, तो यह अत्यंत निराशाजनक और भयावह स्थिति बनती है। हिंदी आलोचना आज इसी कठिन दौर से गुजर रही है। आज की समीक्षाएं, चाहे व्यावहारिक, कृति-केंद्रित हों या सैद्धांतिक, दुनिया भर के विद्वानों के उद्धरणों से अटी पड़ी हैं। हमारी कोई भी बात तब तक मान्य, महत्त्वपूर्ण नहीं होती, जब तक दो-चार विद्वानों के उद्धरणों से संपुष्ट न हो। यह एहसासे-कमतरी है या अपनी वैचारिकी पर भरोसे का अभाव, तय नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि समस्या का सीधा संबंध हिंदी आलोचना के अपने जातीय मिजाज के विकास के प्रति उदासीनता का परिणाम है। मजेदार बात यह है कि यह उत्साह सिर्फ पश्चात्य विद्वानों को उद्धृत करने का नहीं, बल्कि संस्कृत आचार्यों को लेकर भी इसी तरह का उद्धरण प्रेम दिखाई पड़ता है।

इस समस्या के विकराल रूप से आज हिंदी साहित्य-समाज आक्रांत है। उद्धरणों के बीच आलोचक का मत-विचार बिला गया है। उसका अपना रुख क्या है, पता ही नहीं चलता। ‘हर बता पे कहते हो तुम कि, तू क्या है, तुम्ही कहो कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है।’ अंदाजे गुफ्तगू का हाल यह है कि हिंदी आलोचना ने एक विशेष पद्धति पैदा की है, जिसे उद्धरणवादी पद्धति कहना ज्यादा समीचीन होगा। अजीब बात यह है कि चिंतक-विचारक का समय, देशकाल और इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि उसकी विचार प्रक्रिया का आधार कौन-सी काव्य कृति है, उसको सिरे से नकार दिया जाता है। हम सभी पूरी तरह इस बात से वाकिफ हैं कि आलोचनाशास्त्र अपने समय की रचनाओं की विशिष्टताओं के विश्लेषण से निर्मित होता है। बल्कि इसमें एक हद तक साहित्य रूपों का भी गहरे अर्थों में फर्क होता है। नाटक के संदर्भ में सृजित वैचारिकी कविता या उपन्यास के संदर्भ में नाकाफी साबित होगी। यह रूपगत विभाजन नहीं, बल्कि समय के सापेक्ष अंतर्वस्तु और यथार्थ के परख से भी गहरे जुड़ा विषय है। इसे आप यों ही छोड़ नहीं सकते। इस रूप में कोई आलोचनात्मक विवेक ज्ञान और उसकी वैचारिकी किसी कृति की प्रवृत्ति तथा विधा से जुड़ी हुई होती है। साहित्य आलोचना के सिद्धांत हवा में नहीं रचे जाते हैं। यह बात पश्चिम तथा पूरब दोनों के लिए सही है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के रचना और सिद्धांत निर्णय अपने समय के नाटकों से सृजित हुए हैं। हवा में नहीं। इसी प्रकार ग्राम्सी या वाल्टर बेंजामिन के सिद्धांत अपने समय की रचनाओं से सहमत-असहमत से निर्मित हैं।

हिंदी आलोचकों के सर्वाधिक प्रिय ग्राम्सी, लुकाच, वाल्टर बेंजामिन, अक्तावियो पाज, मार्खेज, रेमंड विलियम्स, लूसिएं गोल्डमान आदि पश्चिमी साहित्य विमर्शकार हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इनकी चिंतन पद्धति तथा वैचारिकी अलग-अलग है और सैद्धांतिकी ढेर सारी मत-भिन्नता लिए हुए है। अद्भुत है कि एक ही लेख में कई सारे उद्धरण ऐसे मिल जाएंगे, जो भिन्न-भिन्न चिंतन सारणियों वाले विचारकों के टुकड़े अपनी सहमति और सुविधानुसार चुन कर रख दिए गए हों। ऐसे में मूलभाव को पकड़ा जाना दुष्कर हो जाता है। इसी संदर्भ में हिंदी में बहुविध उद्धृत वाल्टर बेंजामिन स्वयं उद्धरण को तो महत्त्व देते हैं, लेकिन सारांश के पुनर्कथन से प्लेग की तरह बचने की चेतावनी देते हैं। ‘साहित्य आलोचना का कार्यक्रम’ निबंध में वे कहते हैं कि ‘अच्छी आलोचना दो तत्त्वों से बनती है- उद्धरण और आलोचनात्मक लेपन। खूब अच्छी आलोचना लेपन और उद्धरण के मेल से बनाई जा सकती है। पर जिससे हर हाल में प्लेग की तरह बचना है वह है सारांश का पुनर्कथन।’ लेकिन यहां बेमेल विचारों के उद्धरणों का कोलाज रचना का सीधा नकार देखा-पढ़ा जा सकता है। इसके लिए वे आलोचनात्मक लेपन जैसा पद प्रस्तावित करते हैं। यानी उद्धरणों के संयोजन के बिना अच्छी आलोचना संभव नहीं है। हिंदी आलोचना की नीव रखने वाले हमारे मान्य आचार्यों- बालकृष्ण भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल को ही लें। उन्होंने आरंभ में ही ‘कल्पना’, ‘नई-नई बातों का सूझना’, ‘कल्पना का आनंद’, ‘कविता क्या है’, ‘कवि-कर्तव्य’, ‘कवि और कविता’ आदि निबंधों में निश्चय ही यूरोप के साहित्य चिंतन का सहारा लिया, लेकिन उसे हिंदी के जातीय स्वरूप के बरक्स निर्मित किया। आचार्य शुक्ल के पहले दो निबंध ‘साहित्य’ और ‘कल्पना का आनंद’ तो क्रमश: कार्डियल न्यूमन और एडिसन के निबंधों का भावानुवाद है। आचार्य शुक्ल ने साहित्य वाले निबंध को न्यूमन के ‘आइडिया आॅफ ए युनिवर्सिटी’ के ‘लिटरेचर’ नामक निबंध के आधार पर लिखा, लेकिन अगले निबंध ‘कविता क्या है’ में वे अपने विचारों को स्थिर करते और पहले चरण में ही अलंकारवादियों और कविता के रीतिवादी रूझानों को नकारते हैं। निश्यय ही इसका स्रोत उन्हें न्यूमन और एडिसन के चिंतन में मिला, लेकिन उन्होंने उन्हें उद्धरण के रूप में नहीं, बल्कि अपने विचारों को स्थिरता देने के लिए प्रयोेग किया है। बाद में ‘लोकमंगल की भावना’ जैसा पद रच कर उन्होंने हिंदी के समस्त रीतिवादी चिंतन को ही पलट दिया।
इसी क्रम में रामचंद्र शुक्ल के बाद रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध और नामवर सिंह का उल्लेख किया जाना चाहिए। जिन्होंने हिंदी आलोचना को अपना रूप दिया। इनके भी आलोचनात्मक लेखन में उद्धरण तो मिलते हैं, लेकिन अपने विचारों की सहमति की दया याचना के लिए नहीं, बल्कि टकराते-जूझते हिंदी आलोचना के मानदंड स्थिर करने के लिए होते हैं।

उद्धरण सुविधानुसार चुनना और बेमेल खिचड़ी बना देना, बहुत हद तक हमारे आलोचनात्मक विवेक को कमजोर बनाता है। अपना मत स्थिर करने के लिए बहुपठित होना आवश्यक है, लेकिन उद्धरणों का आतंक पैदा करना सिरे से गलत है। किसी मान्य और बड़े आलोचक को ध्यान से पढ़ा जाए तो उसकी चिंतन प्रक्रिया पर तमाम अन्य वैचारिक विमर्शों के सूत्र मिल जाएंगे, लेकिन उसके दृष्टि-बोध और चिंतन की अपनी मौलिकता बनी रहती है। इस संदर्भ में जरूरी है कि अपनी निजता और मौलिकता बरकरार रखी जाए। जिस प्रकार हर रचना और रचनाकार का अपना विशिष्ट रंग होता है, उस पर उसके व्यक्तित्व की छाप होती है, उसी प्रकार आलोचना के लिए भी अपनी रचनात्मकता और आलोचक विशेष के व्यक्तित्व की छाप होती है। अगर दुनिया भर के साहित्य चिंतन से हिंदी आलोचना को व्यापक बनाना जरूरी है, तो अनुवाद कर हिंदी आलोचना को समृद्ध किया जाना चाहिए। हिंदी की चिंतन प्रक्रिया को और उन्नत तथा व्यापक किया जाना चाहिए। यह नहीं कि यहां वहां से टुकड़े उठा कर भानुमति का कुनबा बना दिया जाए। इस तरह की प्रवृत्ति घातक होगी। अगर हिंदी आलोचना के विकास क्रम को देखा जाए तो मान्य आलोचकों ने विभिन्न आचार्यों, विमर्शकारों का अध्ययन-मनन कर अपना मत स्थिर किया है। बल्कि उन विचारों से टकराते हुए अपने चिंतन को व्यापकता दी है। रामविलास शर्मा और नामवर सिंह ने इस क्रम में एक मानक स्थापित किया है। वे सर्वाधिक उद्धरणों का प्रयोग करते हैं, मगर खंडन के साथ अपने विचारों का मंडन करते हुए निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। उनके लेखन में उद्धरण व्याख्या-विवेचन तथा वैचारिक टकराहट के लिए आते हैं।

उद्धरण देने की प्रवृत्ति सर्वाधिक मार्क्सवादी आलोचना के अधकचरे लेखन तथा अस्मिता विमर्श के सबाल्टर्न रूपों में दिखती है। अस्मिता विमर्श में तो एक साथ हजारों वर्षों की यात्रा करते हुए एक ही वाक्य में मिथकों, पुराकथाओं तथा आधुनिक वैचारिकी को एक साथ ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे इसमें देशकाल का कोई भेद ही न हो। हमारे बहुत सारे साथी मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की गहराई को समझे बिना ही मार्क्स से लेकर माओ तक तथा ब्रेख्त, लूकाच से लेकर ग्राम्सी तक उद्धृत करते रहते हैं। यह स्थित काफी हद तक हास्यास्पद बन जाती है। मुक्तिबोध की तरह न तो उनके पास जगत समीक्षा की समझ है, और न ही जीवन समीक्षा की। सारत: हिंदी आलोचना को बेमेल उद्धरणों के कोलाज बना देने की प्रवृत्ति आलोचना के मौलिक और जातीय चिंतन के विकास को अवरुद्ध कर देगा।

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