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व्यक्ति, समाज और मर्यादा

राष्ट्र, समाज और संगठन के प्रति ईमानदार होना हमारी चरित्र निष्ठा का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह सही है कि वर्तमान में हमारे देश में व्याप्त भ्रष्ट परिस्थितियों से कोई भी संतुष्ट नहीं। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए जरूरी है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में ईमानदारी और कानून के नियमों का पालन हो।

Author Published on: November 10, 2019 1:14 AM
जीवन के सभी क्षेत्रों में ईमानदारी और कानून के नियमों का पालन हो।

साकेत कुमार सहाय

ईमानदारी मात्र एक गुण नहीं, बल्कि स्वस्थ आचरण है। यह परस्पर साहचर्य, विश्वास, प्रेम और प्रगाढ़ता का पर्याय है। व्यक्ति अगर अपने जीवन में ईमानदार है, तो सहज ही लोग उस पर विश्वास करेंगे। अगर हम अपने जीवन में कोई भी कार्य बेईमानी से करते हैं, तो उसका अपराधबोध जीवन भर हमारा पीछा नहीं छोड़ता। इसलिए जरूरी है कि हम ईमानदारी को अपनी जीवनशैली का अनिवार्य अंग बनाएं। इसके लिए शुरू से ही परिवार, समाज और संस्थानों को अनुशासित तथा ईमानदार जीवन निर्माण के तत्त्वों की स्थापना के लिए कार्य करना होगा। हम अपने दैनिक जीवन में रोज ही ऐसी घटनाएं देखते हैं, जिनमें काफी लोग अपने कर्तव्य और दायित्व से विमुख होते हैं। कई कर्मचारी अपने कार्यालय में देर से आते हैं, मगर पूछने पर दोष किसी और पर मढ़ते हैं।

छोटे-छोटे आचरण ही हमारे अंदर भ्रष्ट आचार-व्यवहार की नींव डालते हैं। इसलिए आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों में प्रारंभ से ही ईमानदार और अनुशासित जीवन जीने का बीज रोपें और उसे सींचे। हमारी शिक्षा-व्यवस्था अपनी जड़ों की ओर लौटे। इसके लिए शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। वर्तमान मानसिकता एक ज्ञानवान समाज के मुकाबले धनवान समाज को ज्यादा ललचायी नजरों से देखती है, जो हमारे समाज में व्याप्त बेईमानी और अन्य सामाजिक समस्याओं का कारण है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक व्यक्ति समाज में एक आदर्श प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश करे।

आज भ्रष्टाचार हमारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन का हिस्सा-सा बन गया है। बिना इसके किसी काम की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसमें आकंठ डूबा व्यक्ति अपनी गलती आसानी से दूसरे के मत्थे मढ़ देता है या उसके लिए ये सारी बातें ऐसी होती हैं, जैसे दूध में पानी मिला होता है। आज हर विभाग में भ्रष्टाचार दैत्याकार रूप ले चुका है। अब व्यक्ति की पहचान सिर्फ उसके पैसे से होती है। यह पैसा उसने किस प्रकार और कैसे कमाया, यह कोई नहीं देखता। ऐसा इसलिए भी होता है कि ज्यादातर लोग किसी न किसी रूप में यही कर रहे हैं। जो नहीं कर पा रहा, वह इसके प्रयास में है। पद, रसूख के बावजूद जो ईमानदार है, वह बिल्कुल आज के दौर में महात्मा की तरह है। पर दुर्भाग्य यह भी है कि ऐसे लोगों को कई बार परिवार, समाज भी बर्दाश्त नहीं करता। वर्तमान में लोभ-लिप्सा की वजह से भ्रष्ट व्यवस्था शीर्ष पर विराजमान है और यह व्यवस्था देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन गई है।

ईमानदार बनने के लिए हमें अपनी उन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा, जो हमें चादर से ज्यादा पांव फैलाने को उकसाती हैं। रोटी, कपड़ा और मकान हमारे जीवन की अहम जरूरत है, पर हमारी ये जरूरतें लगातार बढ़ती जाती हैं और फिर हमारी सारी शक्ति उनकी पूर्ति में लग जाती है। इस तरह इन आवश्यकताओं की पूर्ति में हम खुद एक पैसा कमाने की मशीन बन कर रह जाते हैं। युवाकाल में हमारे रचनात्मकता के स्वप्न धरे के धरे रह जाते हैं। नतीजतन आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन के प्रत्येक पक्ष में सच्ची निष्ठा और ईमानदारी का अभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन के प्रत्येक पक्ष के असली मकसद से जुड़ें। असली मकसद ही इंसान को सफलता के पथ पर अग्रसर और उसकी प्रगति को चिर स्थायी बनाता है।

यह अकाट्य सत्य है कि जिंदगी की शुरुआत शून्य से होती है और शून्य पर ही खत्म हो जाती है। अंत में हमारा मूल्यांकन सिर्फ हमारे कर्मों से होता है। उसी के दम पर हम याद किए जाते हैं, न कि पैसों की वजह से। हर इंसान का यह दायित्व बनता है कि वह जब तक जिए, इस संसार में अच्छे कर्म करे, ताकि जब वह इस संसार से विदा हो तो पूरा जग उसके लिए रोए। अच्छे कर्मों की यह सोच हमें सत्य और ईमानदारी की राह की ओर उन्मुख करेगी। इससे हमारे अंदर समाज और राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा उपजेगी।

हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि हमारे समाज में सर्वत्र भ्रष्टाचार और असत्य का बोलबाला है। पर, अगर व्यापक रूप में देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि समाज में नैतिकता और मर्यादा का तेजी से क्षरण हो रहा है। हम जैसा सोचते हैं वैसा ही बनते हैं। समाज में भ्रष्टाचार की उपज एक दिन में नहीं हुई होगी, यह सब कुछ नया भी नहीं है, बल्कि यह सब कम या ज्यादा सदा विद्यमान रही है। पर समाज में चंूकि नैतिकता का स्तर पहले अप्रतिम था तथा अनैतिक कार्यों के लिए कठोर दंड का प्रावधान था। पर समय के साथ यह स्थिति बद से बदतर होती गई।

ब्रिटिश गुलामी को भी इसके लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। पर दोषी ठहराने से क्या होगा? देश तो हम सभी का है। इसलिए यह प्रवृत्ति कि यह सब दो सौ वर्षों की गुलाम मानसिकता, सामंतवादी प्रवृत्ति आदि की उपज है। इसके लिए सबसे अधिक दोषी हमारा समाज, हमारी आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था है। आधुनिक समाज धनिकों को ही योग्य मानती है, चाहे वह धन किसी भी प्रकार से कमाया हुआ हो। शीघ्र धनवान बनने और चमक-दमक को ही तरक्की समझ लेने की मानसिकता ही हमें गलत करने को उकसाती है, जिसका परिणाम है ऐसी स्थिति। जरूरत है इस घाव के रक्त शोधन की।

समाज में ईमानदारी, निष्ठापूर्ण कार्य-व्यवहार की स्थापना के लिए जरूरी है कि भ्रष्ट परिस्थितियों के निर्माण के मूल में काम करने वाली विकृत मनस्थिति में बदलाव लाने की कोशिश की जाए। अन्यथा एक समस्या का उपचार होने से पहले ही दस नई समस्याएं उठ खड़ी होती हैं। हमें इन समस्याओं के समूल विनाश के लिए उनकी जड़ तक जाना और उनके मूल स्रोत को नष्ट करना होगा। इसके लिए पहली आवश्यकता है जनमानस में जड़ें जमाई हुई निकृष्ट स्वार्थपरकता को निरस्त करके चरित्र निष्ठा की उच्च स्तरीय आस्थाओं का प्रतिमान स्थापित किया जाए। राष्ट्र, समाज और संगठन के प्रति ईमानदार होना हमारी चरित्र निष्ठा का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह सही है कि वर्तमान में हमारे देश में व्याप्त भ्रष्ट परिस्थितियों से कोई भी संतुष्ट नहीं। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए जरूरी है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में ईमानदारी और कानून के नियमों का पालन हो।

सरकारी हो या निजी, दोनों तरह की संस्थाओं में ईमानदारी की व्यवस्था कायम होना बेहद जरूरी है। इसके लिए संवैधानिक तंत्र यानी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि समाज और व्यवस्था में ईमानदारी तथा पारदर्शिता से सभी कार्य संपन्न हों। इसके साथ यह भी महत्त्वपूर्ण है कि सभी अपने स्तर पर ईमानदारी के सिद्धांत का प्रतिबद्धता से पालन करें। ईमानदार जीवन शैली को अपना कर ही हम एक सशक्त समाज एवं राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे।

 

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