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परिवार की जगह

बेटा-बेटी में अंतर नहीं करने का दावा करने वाले इक्कीसवीं सदी के समाज में भी जाति, लैंगिक भेदभाव, पुत्र जन्म की उच्च महत्त्वाकांक्षा इतनी हावी है कि पूरा परिवार मौत को गले लगाने को तैयार हो जाता है।

Author July 7, 2019 2:10 AM
किसी न किसी बच्ची से बलात्कार की खबरें रोजाना आती रहती हैं।

ज्योति सिडाना

हाल की कुछ घटनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि परिवार एक स्वाभाविक और पवित्र इकाई के रूप में अपना महत्त्व खो रहा है। पहले परिवार में जिम्मेदारी का भाव केंद्रीय भूमिका निभाता था और अब परिवार में विचलन की संभावनाएं उत्पन्न हुई हैं। बेटा-बेटी में अंतर नहीं करने का दावा करने वाले इक्कीसवीं सदी के समाज में भी जाति, लैंगिक भेदभाव, पुत्र जन्म की उच्च महत्त्वाकांक्षा इतनी हावी है कि पूरा परिवार मौत को गले लगाने को तैयार हो जाता है। या कहें कि परिवार के अंदर महिला उत्पीड़न के पक्ष इतने हावी हो गए हैं कि पीड़ित को सामूहिक आत्महत्या ही एकमात्र हल दिखाई देता है। पिछले कुछ दिनों की खबरों के मुताबिक अपने सबसे करीबी और भरोसेमंद माने जाने वाले पुरुष संबंधी द्वारा लड़कियों या महिलाओं का बलात्कार समाज की संवेदनहीनता और रिश्तों में विश्वासघात की कहानी कहती नजर आती हैं। सवाल है कि क्या परिवार आज भी प्रासंगिक हैं? परिवार का दायित्व है सदस्यों का भरण-पोषण, समाजीकरण, शिक्षण और सुरक्षा प्रदान करना। तो आज यह किस तरह का भरण-पोषण और सुरक्षा है?

हाल ही में राजस्थान के बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में एक महिला ने पारिवारिक कलह से परेशान होकर अपनी तीन बेटियों के साथ टांके में कूद कर जान दे दी। दूसरी घटना में बाड़मेर के चौहटन में पुत्र न होने के कारण मां अपनी पांच बेटियों को टांके में धकेल खुद भी कूद गई। तीसरी घटना में बीकानेर की बिज्जू तहसील में पारिवारिक कलह से तंग आकर मां ने तीन बच्चों (दो लड़की और एक लड़का) सहित पानी में कूद कर जान दे दी। क्या इन घटनाओं में वृद्धि के बाद समाज में ‘परिवार की समाप्ति’ की घोषणा की जा सकती है?

नारीवादी डोर्थी स्मिथ का कहना है कि समाज को यह समझने या स्वीकार करने की आवश्यकता है कि महिला के पास केवल शरीर नहीं है, बल्कि वह भी ज्ञान, अर्थतंत्र, राजनीति, शक्ति संबंध, विचार आदि में प्रभावी सहभागिता करती है। जबकि पुरुष या समाज उसके शरीर को केंद्र में रख कर इन सभी प्रक्रियाओं में उसके हस्तक्षेप को दरकिनार करता है, उसे कम-दिमाग समझता है या उसकी उपेक्षा करता है। महिला कोई निष्क्रिय इकाई नहीं है, बल्कि एक सक्रिय प्राणी है। इसलिए उसे इंसान समझना, पुरुष के बराबर का दर्जा देना उपर्युक्त समस्याओं के समाधान की ओर एक कदम कहा जा सकता है।

यह एक तथ्य है कि पुरुष अपने लिए तो हर दृष्टि से खुलेपन और स्वतंत्रता का पक्षधर होता है, लेकिन महिला के खुलेपन के प्रयास या मित्रवत व्यवहार को वह बेशर्मी की संज्ञा देता है। ऐसी भेदभावमूलक मानसिकता के पीछे क्या कारण है? क्यों महिला के शिक्षित हो जाने, आत्मनिर्भर बन जाने, निर्णय प्रक्रिया में सहभागिता करने, परिवार और दफ्तर के दायित्वों को बखूबी निभाने के बाद भी इस प्रकार की मानसिकता में बदलाव नहीं आ पाया? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिन पर चिंतन करना आवश्यक है।

महिलाओं के दमन-उत्पीड़न की घटनाओं को हम शायद हल्के में लेने लगे हैं, क्योंकि हम एक ऐसे संवेदनहीन समाज का हिस्सा बन गए हैं जहां अब कोई भी घटना हमें झकझोरती नहीं है, चाहे वह बलात्कार, तेजाबी हमला, लैंगिक हिंसा की हो या फिर रोड रेज और मॉब लिंचिंग की। दरअसल, हमने यह मान लिया है कि ये सामान्य घटनाएं हैं और यही महिलाओं की भी नियति है। क्या राज्य की इन घटनाओं के प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती? होना तो यह चाहिए कि राज्य इस बात को सुनिश्चित करे कि नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकार प्रभावी ढंग से प्राप्त हों और इसके लिए बनाए गए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन संबद्ध संस्थाओं द्वारा हो!

यह एक तथ्य है कि विभिन्न क्षेत्रों में ये सभी त्रासद घटनाएं इसलिए घट रही हैं कि जो समाज सुधार आंदोलन प्राचीन, मध्ययुगीन और आधुनिक भारत के प्रारंभिक दौर की विशेषता थे, उनकी पूर्ण रूप से उपेक्षा हुई है। उदाहरण के लिए अब न कबीर है, न मीरा, न रसखान, न रहीम। आज फिर ऐसे समाज सुधारकों की जरूरत है जो इन घटनाओं पर और ऐसी मानसिकता पर प्रहार कर सकें, जनांदोलन कर सकें। अनेक समाजवादी विचारकों ने यह टिप्पणी की थी कि पूंजीवादी विकास समाज में संवेदनहीनता को जन्म देता है और समाज के हरेक अवयव को बाजार में क्रय-विक्रय की वस्तु बना देता है। हाल की घटनाएं इस विचार का समर्थन करती प्रतीत होती हैं।

मार्गरेट आइशर ने संभवत: इसीलिए परिवार को हर समाज व्यवस्था में अर्द्ध सामंती संस्था की संज्ञा दी है। उनका तर्क है कि परिवार एक ऐसी संस्था है, जहां पति अपनी पत्नी को भोजन, आवास, वस्त्र और संरक्षण प्रदान करता है और उसके प्रत्युत्तर में पत्नी निजी सेवाएं प्रदान करती है। इसलिए पत्नी की स्थिति सेवक या दास की तरह हो जाती है। इस स्वामी-दास के या पुरुषसत्ता के प्रभुत्व को तब समाप्त किया जा सकता है, जब समाज और उससे पहले महिला खुद को इंसान का दर्जा प्रदान करे।

इसी स्थिति को सोचते हुए शायद सिमोन द बोउवा ने तर्क दिया था कि महिलाओं के लिए एक विशिष्ट धर्म की आवश्यकता है, क्योंकि जिस धर्म को पुरुष ने निर्मित किया है, उसमें पुरुष ने खुद को दमनकर्ता-शोषक की भूमिका में और महिला को दमित-शोषित समूह के रूप में स्थापित किया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सभी धर्मों में पुरुष को ईश्वर ने स्वामित्व दिया है और उसका यह स्वामित्व समाप्त न हो जाए, इसलिए वह महिलाओं को ईश्वर का भय दिखाता है, ताकि वह विद्रोह न कर सके।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास और प्रौद्योगिकी क्रांति के बाद भी पुरुष/ समाज लैंगिक विभाजन और पूर्वाग्रहों की जिस प्रकार की धार्मिक व्याख्या करता है और उसे वैधता देता है। इस पर बुद्धिजीवियों या समाज वैज्ञानिकों को चर्चा नहीं करनी चाहिए? क्यों संविधान में बराबरी का अधिकार देने वाला राज्य राजनीति में महिला आरक्षण बिल को पास नहीं कर पाया? मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में बलात्कार की पीड़ित नाबालिग बच्ची के पिता को वहां की पंचायत ने फरमान सुनाया कि बच्ची का बलात्कार करने वाला निम्न जाति का था, इसलिए बच्ची के शुद्धिकरण के लिए गांव के लोगों को मासांहरी भोज करवाना होगा। ऐसा न करने पर उनका समाज से बहिष्कार कर दिया जाएगा। कितना हास्यास्पद है कि जिस परिवार की बच्ची से बलात्कार हुआ, दंड भी उसी को? कभी जाति के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर तो कभी लैंगिक भेदभाव के नाम पर प्रताड़ित तो महिला को ही होना है?

संपूर्ण देश में, विशेष रूप से हिंदी क्षेत्र में यह समाज सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है, इस पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है। अगर इस तरह के पूर्वाग्रह नहीं होते या कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ होता तो बिहार में इतने मासूमों की मौत न होती! क्या समाज कभी लैंगिक पूर्वाग्रहों या भेदभाव से मुक्त हो पाएगा? अगर नहीं तो संविधान में वर्णित अनुच्छेद-15 अर्थहीन हो जाएगा, जिसमें उल्लेख है कि किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। यह लैंगिक विभाजन बाजार, समाज, राज्य, राजनीति, संस्कृति सभी जगह विद्यमान है. जब तक इसके प्रति लोगों की सोच में परिवर्तन नहीं आएगा, समतावादी समाज की स्थापना एक सपना ही रहेगा। परिवार अब भय और हिंसा का स्रोत बन गए हैं और साथ ही परिवार महिला शोषण की वैधता को स्थापित करते है। संभवत: यह भी एक कारण हो कि अब युवा विवाह, परिवार और नातेदारी जैसी संस्थाओं में विश्वास नहीं करते।

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