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कुपोषण का दंश

भारत में भुखमरी का कारण क्या है, क्या संसाधनों की कमी है? नहींं, ऐसी स्थिति कम से कम भारत में नहींं है। भारत में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कमी है और न ही वित्तीय संसाधनों की। कमी है तो केवल प्राथमिकता की।

Author Published on: October 6, 2019 1:41 AM
यूनिसेफ के अनुसार भारत में करीब 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं

रवि शंकर

ज्ञान और तकनीक एक तरफ देश में क्रांति ला रही है, तो दूसरी तरफ हम मानव के जीवन की प्राथमिक जरूरत, भूख को पूरा नहींं कर पाए हैं। यह अपार प्रगति सबके लिए भोजन का प्रबंध नहींं कर पाई है। सामाजिक और आर्थिक विकास के पैमाने पर देखें तो भारत की एक विरोधाभासी तस्वीर उभरती है। एक तरफ तो हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादक देश हैं, तो दूसरी तरफ कुपोषण के मामले में तमाम कोशिशों के बावजूद स्थिति चिंताजनक है। देश अब भी गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं की चपेट से बाहर नहींं निकल सका है। समय-समय पर होने वाले अध्ययन और रिपोर्ट इस बात का खुलासा करते हैं कि तमाम योजनाओं के बावजूद देश में भूख और कुपोषण की स्थिति पर लगाम नहींं लगाया जा सका है।

सरकार द्वारा व्यापक स्तर पर खाद्य सुरक्षा और गरीबी निवारण कार्यक्रम चलाया जा रहा है, पर इनसे लाभान्वित होने और लाभान्वित न होने वालों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। देश में करीब एक तिहाई बच्चे अब भी कुपोषण का शिकार हैं। वंचित तबकों में समस्या काफी गंभीर है। हम खुश हो सकते हैं कि कुपोषण की समस्या में पिछले एक दशक के दौरान कमी आई है, लेकिन हमारी खुशी स्थायी नहींं हो सकती अगर हम समग्र तस्वीर पर नजर डालें। दरअसल, हमारे यहां कुपोषण एक महामारी की तरह बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों का जीवन छीन रहा है। गंभीर और तीव्र कुपोषण ज्यादातर मामलों में जानलेवा हो सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए हमने अभी तक कोई ठोस कदम नहींं उठाया है। या जिन उपायों को हम ठोस मान कर आगे बढ़े हैं वे इससे निपटने में कारगर नहीं हैं। हम अभी तक नीति आयोग द्वारा गंभीर कुपोषण पर समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन की नीति तय नहीं कर पाए हैं। इसका साफ मतलब है कि योजनाओं को लागू करने में कहीं न कहीं भारी गड़बड़ियां और अनियमितताएं हैं। फिलहाल जरूरत है कि भुखमरी से लड़ाई में सरकारें और वैश्विक संगठन अपने-अपने कार्यक्रमों को बेहतर और अधिक उत्तरदायित्व के साथ लागू करें।

कई रिपोर्टें साफ कहती हैं कि पर्याप्त पोषण सुनिश्चित करने में देश विफल रहा है। गौरतलब है कि भारत लंबे समय से विश्व में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों का देश बना है। हालांकि कुपोषण के स्तर को कम करने में कुछ प्रगति भी हुई है। गंभीर कुपोषण के शिकार बच्चों का अनुपात वर्ष 2005-06 के 48 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2015-16 में 38.4 प्रतिशत हो गया। इस अवधि में कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 42.5 प्रतिशत से घट कर 35.7 प्रतिशत हो गया। साथ ही शिशुओं में रक्ताल्पता (एनीमिया) की स्थिति 69.5 प्रतिशत से घट कर 58.5 प्रतिशत रह गई, पर इसे अत्यंत सीमित प्रगति ही मान सकते हैं। भारत के लिए यह चिंताजनक बात है कि यह अपने पड़ोसी बांग्लादेश से भी शिशु मृत्यु दर में आगे है। भारत में शिशु मृत्युदर प्रति हजार सड़सठ है, जबकि बांग्लादेश में यह प्रति हजार अड़तालीस है। भारत में पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चे पैंतीस प्रतिशत हैं। इनमें भी बिहार और उत्तर प्रदेश सबसे आगे हैं। उसके बाद झारखंड, मेघालय और मध्यप्रदेश का स्थान है। मध्यप्रदेश में पांच साल से छोटी उम्र के बयालीस फीसद बच्चे कुपोषित हैं, तो बिहार में यह फीसद 48.3 है।

कुशल प्रबंधन वाले राज्यों केरल, गोवा, मेघालय, तमिलनाडु व मिजोरम आदि में स्थिति बेहतर है। जिन राज्यों में परिवार नियोजन, जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों आदि की सरकारों द्वारा अनदेखी की जाती है, उन्हीं राज्यों में कुपोषण की समस्या सबसे ज्यादा विकट है। सवाल है कि जब देश में अपार संसाधन हैं, हम लाइलाज बीमारियों को पराजित कर रहे हैं, ऐसे में भूख का इलाज क्यों नहींं कर पा रहे हैं?

यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब दस लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया के देशों से बहुत ज्यादा है। एक तरफ हम मंगल ग्रह पर जीवन की खोज में मशगूल हैं, अपने पुराने सपनों के चांद पर इंसानी बस्ती बनाने की योजना भी बना रहे हैं, हम दावे करते हैं कि हम विश्व की पांचवीं और छठी अर्थव्यवस्था हैं, लेकिन हम सभी नागरिकों की भूख नहीं मिटा पाए हैं। भारत में लगभग हर चौथा बच्चा कुपोषित है। भूख का सबसे बड़ा प्रभाव बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है, जो केवल हमारे वर्तमान को ही नहींं बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगा।

सवाल है कि भारत में भुखमरी का कारण क्या है? क्या संसाधनों की कमी है? नहींं, ऐसी स्थिति कम से कम भारत में नहींं है। भारत में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कमी है और न ही वित्तीय संसाधनों की। कमी है तो केवल प्राथमिकता की। भारत में कुपोषण और खाद्य सुरक्षा को लेकर कई योजनाएं चलार्इं जाती रही हैं, लेकिन समस्या की विकरालता को देखते हुए यह नाकाफी तो थी, साथ ही व्यवस्थागत, प्रक्रियात्मक विसंगतियों और भ्रष्टाचार की वजह से भी यह तकरीबन बेअसर साबित हुई है। दरअसल, भूख से बचाव यानी खाद्य सुरक्षा की अवधारणा एक बुनियादी अधिकार है, जिसके तहत सभी को जरूरी पोषक तत्त्वों से परिपूर्ण भोजन उनकी जरूरत के हिसाब से, समय पर और गरिमामय तरीके से उपलब्ध करना किसी भी सरकार का पहला दायित्व होना चाहिए।
दरअसल, कुपोषण किसी भी देश या समाज के लिए मौजूदा समय में सबसे बड़ी समस्या है। भारत में कुपोषण की इतनी बड़ी समस्या है कि इससे निपटना आसान नहींं है। इसके लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पोषण मिशन का शुभारंभ किया था, जिसका लक्ष्य 2022 तक कुपोषण का समाधान करना है। पर इस सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी भारत को अपनी वर्तमान गति को दोगुना करना होगा। निस्संदेह अगर बच्चे कुपोषित पैदा हो रहे हैं, तो एक निष्कर्ष यह भी है कि उनकी माताओं का स्वास्थ्य भी ठीक नहींं है। गरीबी, अशिक्षा और अज्ञानता के चलते गर्भावस्था के दौरान जरूरी खानपान न मिल पाना कुपोषण की एक शृंखला को जन्म देता है।

यह ठीक है कि भारत में कुपोषण की स्थिति में पिछले वर्षों में काफी सुधार आया है, पर भारत अब भी उन देशों में शामिल है जहां विश्व के सबसे अधिक कुपोषित बच्चे निवास करते हैं। जबकि भारत के संविधान का अनुच्छेद-21 हर एक के लिए जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। इस अनुच्छेद के तहत उपलब्ध जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार में भोजन का अधिकार सम्मिलित है। वहीं संविधान का अनुच्छेद-47 कहता है कि लोगों के पोषण और जीवन स्तर को उठाने के साथ ही जनस्वास्थ्य को बेहतर बनाना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसलिए कुपोषण से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सभी योजनाओं में समन्वय बेहद जरूरी है। यूनिसेफ की प्रोग्रेस फॉर चिल्ड्रेन रिपोर्ट में चेतावनी देते हुए कहा गया है कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के उचित तरीके के साथ स्वास्थ्य के प्रति कुछ सामान्य सावधानियां बरती जाएं तो भारत में हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के छह लाख से ज्यादा बच्चों की मौत को टाला जा सकता है। उम्मीद कर सकते हैं कि कुपोषण से चौतरफा लड़ाई में उतरी केंद्र सरकार अपने लक्ष्य को समय पर हासिल कर लेगी।

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