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भारतीय होने का अर्थ

यह प्रश्न अक्सर उठाया जाता है कि क्या संविधान में निहित धर्म-निरपेक्षता, पंथ-निरपेक्षता महज आदर्श-वाक्य हैं या आचरण और व्यवहार? इन प्रश्नों के उत्तर तो हमारा एक हजार वर्ष का मिला-जुला इतिहास ही दे रहा है।

Author Published on: September 8, 2019 1:37 AM
‘भारतीयता’ को उसके व्यापक दर्शन में देखना होगा।

रमेश दवे

क्या ‘भारतीय’ मात्र एक शब्द है या विचार? भारतीयता के जितने अर्थ हैं, उतने ही अनर्थ भी हैं। एक है वैचारिक भारतीयता, जो बुद्धिजीवियों द्वारा अपने-अपने ढंग से परिभाषित या व्याख्यायित की जाती है। आज का भारत एक संपूर्ण प्रभुता-संपन्न स्वतंत्र गणराज्य है। यहां तरह-तरह की भारतीयता होना, भारत की बहुधर्मी, बहु-सांस्कृतिक, बहु-क्षेत्रीय, बहुभाषी, बहु-जातीय और बहु-विचारधारागत परंपरा का परिणाम है। संविधान में इंडिया अर्थात भारत कहा गया है। वहां हिंदुस्तान, भारतवर्ष, जंबूद्वीप आदि नामों को संवैधानिक मान्यता शायद नहीं है। पर दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो ‘हिंदुस्तान’ और ‘हिंदुस्तानी; को तो मानते हैं, लेकिन भारतीय और भारतीयता को एक प्रकार की कथित सांप्रदायिकता मानते हैं। वे तहजीब के गंगा-जमुनीपन को तो मानते हैं, लेकिन सांस्कृतिक एकता को सांप्रदायिक कहते हैं। केवल कुछ भाषायी शब्दों से भारतीयता तय होती है, तो फिर हम भारतीयता के वे सब तत्त्व त्याग दें, जो हमें अपने भारतीय या हिंदुस्तानी होेने का बोध कराते हैं। संस्कृति कहें या तहजीब, इसमें हम जीते रहे हैं, आज भी जी रहे हैं। यही हमारी परंपरा, हेरिटेज या रिवायत है। अगर हम सांस्कृतिक या कौमी एकता का विभाजन करेंगे, तो फिर क्या यह कहेंगे कि हम तुलसीदास को सांस्कृतिक भारतीयता से जोड़ सकते हैं, अगर दूसरी ओर से यह कहा जाएगा कि हम तुलसी को नहीं, कबीर को सच्चा भारतीय मानते हैं।

अब प्रश्न यह है कि किसे भारतीय कहा जाए और किसे नहीं? क्या मीर, गालिब, सौदा, मोमिन से लेकर फिराक, बशीर बद्र, निदा फजली अलग किस्म के भारतीय हैं और कबीर, तुलसीदास, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, अज्ञेय से लेकर हमारे समकालीन तमाम कवि दूसरी तरह के भारतीय हैं? क्या बड़े गुलाम अली से मोहम्मद रफी तक, मकबूल फिदा हुसेन, सैयद हैदर रजा से लेकर समकालीन चित्रकारों तक या प्रेमचंद से लेकर रेणु और आज के कथाकारों तक और अनेक कला-साहित्य में सृजन करने वाले कलाकारों की भारतीयता का बंटवारा किया जा सकता है? भारत ने तो अपने एक हजार वर्ष से अधिक के इतिहास में उन सबको अपनाया, जो बाहर से आए और बस गए। उनका इतिहास, उनका साहित्य, उनकी कलाएं, उनका स्थापत्य, उनका प्रशासन और काफी हद तक उनकी शिक्षा और तहजीब तक से भारत ने अपने को जितना ग्लोबल, उदार और सर्व-समावेशी बनाया, वैसा तो दुनिया के किसी देश में नहीं हुआ। यहां हिंदू, पारसी, यहूदी, ईसाई, मुसलिम, सिख सभी एक होकर अगर भारतीय कहलाते हैं, तो ऐसा कोई अन्य देश है, जहां इतने सारे धर्मावलंबियों को उस देश की देशीयता दी गई हो?

विचार, विचारधाराएं, आस्था और विश्वास, खाने-पीने का तरीका अलग हो सकता है, मगर अलग-अलग होकर भी एक लगता है, तो यह सिर्फ भारत की परंपरा है। हम चाहे अपने को भारतीय कहें या हिंदुस्तानी, मकसद सिर्फ एक हो कि यह मुल्क एक है और इस मुल्क का हर बाशिंदा यहां का ही है। और जो नागरिक है वह भारतीय भी है। इसलिए भारतीय होने को किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता से जोड़ना संविधान, देश की परंपरा और राष्ट्रीय एकता का अपमान ही कहा जाएगा, क्योंकि भारतीयता एकता का सूचक शब्द है विभाजन का नहीं।

‘भारतीयता’ को उसके व्यापक दर्शन में देखना होगा। भारतीय एक स्वतंत्र राष्ट्र की नागरिक राष्ट्रीयता है। भारतीयता का पहला सबक शिक्षा से शुरू होना चाहिए। वहां भारतीयता के व्यापक अर्थ से हम छात्र-छात्राओं को जोड़ सकते हैं, ताकि वे भविष्य के ऐसे नागरिक बनें जो एक सर्वधर्म-समावेशी भारतीयता की पहचान हों। अगर संविधान में समानता का प्रावधान है, तो हम संविधान के विरुद्ध जाकर किसी को भी गैर-भारतीय नहीं कह सकते, चाहे उसका धर्म, भाषा या क्षेत्र कोई भी हो। हमें अपना इतिहास और भूगोल, संस्कृति और भाषा पढ़ाने का और कलाओं, साहित्य आदि को देखने का नजरिया बदलना होगा। हमारी शिक्षा ने हमें आज तक गांधी जैसा स्वदेशी नहीं बनाया, जिसका परिणाम हमारे अपने-अपने स्वदेश और स्वदेश के धर्म हो गए। शिक्षा को चेतना की पाठशाला होना चाहिए, न कि संस्कृति के नाम पर कट्टरता की। चेतना से मनुष्य विवेकवान बनता है और उस पर कोई भी विचार या विचारधारा थोपी नहीं जा सकती।

हम आज जिस आधुनिक, उत्तर-आधुनिक समय में रह रहे हैं, उसने हमें उपकरण तो दिए, मगर आचरण नहीं दिए। उसने सारी दुनिया को एक मोेबाइल या कंप्यूटर में साकार तो कर दिया, लेकिन हमारे सांस्कृतिक सौंदर्य की छटा कम कर दी। हम सूचना के बंदीगृह में तो कैद हो गए, लेकिन सोचने का मुक्त आकाश गंवा बैठे। हमारे पास अगर बहुत संपन्न संस्कृति, वांग्मय, धर्म-व्यवस्था की नैतिकता और अपनी जातीय-स्मृति रही है, तो उसे हम ओछी राजनीति और संकीर्ण, कुटिल एवं विघटनकारी शक्तियों से बचाएं।

हम युद्ध के शस्त्रों की होड़ के बजाय शास्त्रों की दौड़ से ऐसा शास्त्र क्यों न रचें कि हम हजारों साल पुराने वांगमय के सहारे जीने के बजाय अपने समय के साहित्य को भी नया वांगमय बना कर अगली पीढ़ी को सौंप सकें? जब तक हमारा चिंतन नहीं बदलता, हमारी चेतना नहीं बदलती और हमारी चिंताएं मानवीय नहीं होतीं, तब तक हम वैसे भारतीय कैसे हो सकते हैं जैसे दयानंद, विवेकानंद, श्रीअरविंद, रामकृष्ण परमहंस, जे. कृष्णमूर्ति और गांधी आदि थे। हम जितने तुलसी, कबीर के देश हैं उतने ही मीर और गलिब के भी देश हैं, हम जितने एनी बेसेंट, फादर कामिल बुल्के और रस्किन बांड के देश हैं, उतने ही सर सैयद अहमद खां, बादशाह खान, मौलाना आजाद आदि के भी देश हैं।

इसलिए भारतीयता न तो किसी व्यक्ति, धर्म, इतिहास या अपनी अपनी मान्यता से तय होती है, न क्षेत्र, जाति और भाषा से। भारतीय होना एक ऐसा मनुष्य होना है, जिसमें महावीर की महानता और बुद्ध की प्रबुद्धता हो और देश का अर्थ यहां का प्रत्येक जन, प्रत्येक व्यक्ति से प्यार करे, उसका सम्मान करे और सब मिल-जुल कर उस भारतीयता को जिए। भारतीयता में जीने का अर्थ है हम अपने लोकाचार, शिष्टाचार, सामासिक-संस्कृति-बोध, रीति-रिवाज, उत्सव-त्योहार, पूर्वजों के सांस्कृतिक, साहित्यिक और कलात्मक योगदान की स्मृति में जीएं तो जरूर, लेकिन अपनी आधुनिकता को संवेदनशील, गतिशील और सर्वधर्म समावेशी बनाएं, वैज्ञानिक सोच से अंधविश्वास, सांप्रदायिकता आदि से मुक्त होकर ऐसे भारतीय दिखें कि सारा विश्व यह कह सके कि यह ‘वसुधैव कुटुंबकम; की सभ्यता वाला, सहिष्णु और भावी संभावनाओं का एक ऐसा देश है जिसका हर नागरिक होने पर गर्व करता है।

यह प्रश्न अक्सर उठाया जाता है कि क्या संविधान में निहित धर्म-निरपेक्षता, पंथ-निरपेक्षता महज आदर्श-वाक्य हैं या आचरण और व्यवहार? इन प्रश्नों के उत्तर तो हमारा एक हजार वर्ष का मिला-जुला इतिहास ही दे रहा है। एक भारतीय हिंदू नागरिक जिस प्रकार की मंदिर-श्रद्धा से मंदिर जाता है, वैसी ही श्रद्धा और सम्मानभाव से वह मजारों पर मत्था टेकता है, गुरद्वारों में सिर ढंक कर गुरुगं्रथ साहब को प्रणाम करता है, चर्च में प्रार्थना करता है। ऐसी भारतीयता क्या दुनिया में कहीं मिलेगी?

यह देश तरह-तरह की तहजीबों का संगम है। यहां आदिवासी-सभ्यता का भोलापन है, यहां दलित अब सम्मान के साथ खड़े होकर अपनी अस्मिता रच रहे हैं, यहां की युवा शक्ति सारी दुनिया में भारतीयता को समृद्ध और सम्मानित कर रही है, यहां का किसान तमाम अभावों और प्राकृतिक कोपों के बावजूद पूरे देश का पेट भर रहा है, यहां के मजदूर अपने पसीने की हर बूंद देश पर निछावर कर रहे हैं, यहां हर धर्म अपना धर्माचरण के लिए स्वतंत्र है। यहां स्त्रियां बराबरी का अधिकार पाकर सांसद, विधायक, पार्षद के रूप में अपनी शक्ति दिखा रही हैं। एक स्वच्छ, श्रेष्ठ और सकारात्मक भारतीयता से हम देश को बदल कर अर्थ को अनर्थ से बचा सकते हैं।

 

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