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विस्थापित की जगह

यह विडंबना ही है कि देश में पिछले पचास वर्षों में बड़ी सिंचाई परियोजनाओं पर लगभग अस्सी करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, लेकिन सूखे और बाढ़ से प्रभावित जमीन का क्षेत्रफल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दरअसल, अब समय आ गया है कि पिछले पचास वर्षों में बने अनेक बांधों से मिल रही सुविधाओं की वास्तविक समीक्षा की जाए।

Author नई दिल्ली | Published on: September 15, 2019 1:17 AM
मेधा पाटकर

रोहित कौशिक

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर एक बार फिर आंदोलन की राह पर हैं। बड़वानी (मध्यप्रदेश) के छोटा बड़दा में मेधा पाटकर का सत्याग्रह और अनशन आठ-नौ दिन तक जारी रहा। उनका कहना है कि सरदार सरोवर बांध में 133 मीटर की ऊंचाई तक पानी भरने के बाद डूब प्रभावित क्षेत्र की स्थिति खराब होती जा रही है। इसके बावजूद पुनर्वास पर ध्यान न देकर बांध में और पानी भरा जा रहा है। पाटकर का कहना है कि इस साल बांध में 139 मीटर तक पानी नहीं भरा जाना चाहिए। आंदोलनकारियों का आरोप है कि 192 गांवों और एक नगर को बिना पुनर्वास डुबाने की साजिश रची जा रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस समय नर्मदा पुनर्वास से जुड़े विस्थापितों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर का कहना है कि जिन स्थानों पर पुनर्वास किया जाना है, वहां उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बावजूद सुविधाएं नहीं दी गई हैं।

दरअसल, इस दौर के हालात देख कर ऐसा लगने लगा है कि वंचितों के हक में आवाज उठाना गैरकानूनी हो गया है। निश्चित रूप से विकास होना चाहिए, लेकिन विकास की कीमत पर गरीबों की दुर्दशा की अनुमति नहीं दी जा सकती। आज विकास के जितने भी मॉडल अपनाए जा रहे हैं, उनमें गरीबों और विस्थापितों के बारे में कोई नहीं सोच रहा है। आज विकास का जो हवा महल बनाया जा रहा है, वह किसी न किसी रूप से आम आदमी की कब्र खोदने का काम ही करता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम बड़े शर्मनाक तरीके से इस विकास पर अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं। क्या हम विकास का ऐसा मॉडल नहीं बना सकते, जिससे आम आदमी को स्थायी रूप से फायदा हो। आज विकास के जो तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं उनमें गरीब लोगों को अस्थायी फायदा होता है। इसीलिए वह ताउम्र गरीब बना रहता है और सत्ताएं तथा पूंजीपति लोग विकास का स्वप्न दिखा कर उसे लगातार ठगते रहते हैं। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि इस व्यवस्था से त्रस्त आम आदमी और विस्थापितों के हक में खड़े होने वाले लोगों को भी सत्ताएं संदिग्ध बता कर गरीबों का दुश्मन घोषित करने पर लग जाती हैं। दरअसल, विस्थापन के दर्द को विस्थापित परिवार ही महसूस कर सकते हैं। केवल बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने से विस्थापितों का दर्द कम नहीं हो जाता।

विस्थापन के माध्यम से गरीब लोगों पर दोहरी मार पड़ती है। पहली मार तो व्यवस्था की होती है। सवाल यह है कि इस व्यवस्था में उजड़े हुए लोगों की मानसिक अवस्था के स्तर तक पहुंचने वाले कितने अधिकारी और कर्मचारी हैं। जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को अपना कर्तव्य निभाने में भी जोर पड़ता है, वे अपनी सरकारी नौकरी की मानसिकता से ऊपर उठ कर अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते। विस्थापितों पर व्यवस्था की मार से उपजी दूसरी मार मानसिक तनाव की पड़ती है। इस तरह उन्हें अनेक स्तरों पर मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। इसलिए विस्थापितों के भविष्य की ठोस और सार्थक कार्ययोजना बनाए बिना विकास की बात करना बेमानी है।

मध्यप्रदेश तथा देश के अन्य भागों में विभिन्न बांधों से जुड़ी परियोजनाएं सिर्फ विस्थापितों के राहत एवं पुनर्वास कार्यों को लेकर ही सवालों के घेरे में नहीं हैं, बल्कि इन परियोजनाओं में शुरू से ही पर्यावरण से जुड़े अनेक नियमों के पालन में कोताही बरती गई है। सवाल यह है कि विकास के मॉडल में ऐसी परियोजनाआें से प्रभावित परिवारों के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता है? यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि सरकार प्रभावित लोगों के बारे मेंं बड़ी-बड़ी बातें तो करती है, लेकिन उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया जाता है। क्या विकास के इस मॉडल में गरीब लोगों के लिए कोई जगह नहीं है? भारत में इस तरह की परियोजनाओं के विस्थापितों का इतिहास बहुत ही दुखद रहा है। अभी तक भाखड़ा नांगल बांध के विस्थापितों का भी ठीक ढंग से पुनर्वास नहीं हो पाया है। उधर टिहरी बांध के विस्थापित दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। अन्य जगहों पर भी बांध से प्रभावित लोग विस्थापन की मार झेल रहे हैं।

यह विडंबना ही है कि देश में पिछले पचास वर्षोें में बड़ी सिंचाई परियोजनाओं पर लगभग अस्सी करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, लेकिन सूखे और बाढ़ से प्रभावित जमीन का क्षेत्रफल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दरअसल, अब समय आ गया है कि पिछले पचास वर्षों में बने अनेक बांधों से मिल रही सुविधाओं की वास्तविक समीक्षा की जाए। पिंछले कुछ वर्षों से बड़े बांधों की उपयोगिता पर एक नई बहस चल पड़ी है। अधिकतर विकसित देशों ने बड़े बांधों को हानिकारक मानते हुए इनका निर्माण बंद कर दिया है। बांधों के विश्व आयोग की भारत से संबंधित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बड़ी सिंचाई परियोजनाओं से अधिक लाभ नहीं होता है, जबकि इसके दुष्परिणाम अधिक होते हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में बड़े बांधों के कारण विस्थापित करोड़ों लोगों में बासठ प्रतिशत अनुसूचित जातियों और जनजातियों से संबंधित हैं। बड़े बांधों के कारण जहां एक ओर लगभग पचास लाख हेक्टेयर जंगलों का विनाश हुआ है वहीं दूसरी ओर इस तरह की परियोजनाओं से अनेक तरह की विषमताएं पैदा हुई हैं और इसका लाभ अधिकतर बड़े किसानों और शहरी लोगों को ही मिला है।

आज निश्चित रूप से विज्ञान निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है, लेकिन फिर भी वह प्रकृति के सामने बौना ही है। अगर विश्व के बुद्धिजीवी प्रकृति के साथ विज्ञान की प्रतियोगिता कराएंगे तो किसी न किसी रूप में वे तबाही को ही जन्म देंगे। विज्ञान और प्रगतिवादी सोच का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि मानव विनाश के लिए। संपूर्ण विश्व में प्रकृति ने बड़े बांधों के माध्यम से जो तबाही मचाई है वह किसी से छिपी नहीं है। अक्सर हमारे कुछ वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी विभिन्न तर्क देकर यह सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं कि बड़े बांध एक निश्चित अवधि तक प्रकृति की मार झेलने में सक्षम हैं। ऐसा कह कर ये बुद्धिजीवी एक तरह से प्रकृति को चुनौती ही देते हैं। यह अनेक बार सिद्ध हो चुका है कि विभिन्न भविष्यवाणियों के बावजूद विश्व के वैज्ञानिक प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने में असमर्थ हैं। दरअसल, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वैज्ञानिकों द्वारा घोषित इस निश्चित समयावधि में भी बड़े बांध प्रकृति की मार झेल ही लेंगे।

भारत जैसे विकासशील देश में पीने के पानी, सिंचाई और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिससे कि संसाधनों का समुचित उपयोग और ठीक ढंग से पर्यावरण संरक्षण हो सके। इस व्यवस्था में वर्षा जल के संरक्षण, वैकल्पिक स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने और जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था से गरीबों का भी भला होगा। यह सर्वविदित है कि बड़े बांधों से जहां एक ओर अनेक बीमारियां फैलती हैं वहीं दूसरी ओर बांधों में गाद भर जाने से इनकी अवधि भी कम हो जाती है। बड़े बांधों से किसानों की जमीन, जंगल और मकान जलमग्न हो जाते हैं तथा जलभराव भी होता है। सरकार को सबसे पहले विस्थापितों के पुनर्वास की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। विस्थापन की मार झेल रहे आदिवासियों के हित में सोचना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

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