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सभी को चाहिए गांधी

आज के नीति निर्धारक अगर गांधी के विचारों को समझाने का सघन प्रयास करें, उसके मूल उदेश्य तथा लक्ष्य को पहचान सकें, तो निश्चित रूप से बदली हुई परिस्थितितों में भी समाधान निकाले जा सकेंगे, जिनमें स्वदेश, स्वराज और स्वदेशी पुन: अपना उचित स्थान पा सकेंगें।

Author Published on: November 3, 2019 1:46 AM
महात्मा गांधी (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

जगमोहन सिंह राजपूत

इस समय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और बैठकों में चर्चा और चिंता के मुख्य विषय या तो हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, हथियार, अविश्वास, पलायन आदि से संबंधित होते हैं या जलवायु परिवर्तन, जल संकट, पर्यावरण प्रदूषण, ओजोन परत, बढ़ता समुद्री जल स्तर और कई राष्ट्रों के विलुप्त होने की आशंकाओं से जुड़े होते हैं। कुछ लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि लगभग प्रत्येक में कोई न कोई व्यक्ति गांधी को याद करता है! उसके बाद विमर्श की दिशा ही बदल जाती है। ऐसा लगाने लगता है कि आज की कठिन परिस्थतियों में भी सामान्य मानवीय प्रयासों से मनुष्य और प्रकृति के बीच की लगातार कमजोर होती कड़ी को पुनर्जीवित करना संभव है। मगर भारत ने तो गांधी के विचारों को उनके जीवनकाल के अंतिम वर्षों से ही- बिना कहे- नकारना शुरू कर दिया था। गांधी खुद भी इससे अनभिज्ञ नहीं थे।

गांधी ने चालीस वर्ष की आयु में ‘हिंद स्वराज’ लिखा। जिन आशंकाओं को गांधी ने अपनी दूरदृष्टि से पहचान लिया था वे चिंताजनक परिमाण में अब भारत के सामने आ गई हैं, मगर समाधान हम पश्चिम की सोच की नकल से ही पाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा कि : ‘मेरी पक्की राय है कि हिंदुस्तान अंग्रेजों से नहीं, बल्कि आजकल की सभ्यता से कुचला जा रहा है, उसकी चपेट में वह फंस गया है। उसमें से बचने का अभी भी उपाय है, लेकिन दिन-ब-दिन समय बीतता जा रहा है।’ इसके साथ ही उनकी भारत की गहरी समझ इन शब्दों में व्यक्त होती है : ‘मैं मानता हूं कि जो सभ्यता हिंदुस्तान ने दिखाई है, इस सभ्यता को पाने में दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता। जो बीज हमारे पुरखों ने बोए हैं, उनकी बराबरी कर सकें ऐसी कोई चीज देखने में नहीं आई। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का केवल नाम रह गया, मिस्र की बादशाहत चली गई, जापान पश्चिम के शिकंजे में फंस गया और चीन का कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिंदुस्तान आज भी अपनी बुनियाद में मजबूत है।’ गांधी के लिए स्वराज का अर्थ अपना शासन ही नहीं था, वह था अपने ‘ऊपर ऊपर शासन’! और यह विदेशी शासन से आजादी पाने से भी कठिन चुनौती है। लेकिन रास्ते हैं।

पहला रास्ता तो यही था कि हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी, ‘क्योंकि अमीर अपनी अमीरी की वजह से सुखी नहीं है और गरीब अपनी गरीबी के कारण दुखी नहीं है!’ दक्षिण अफ्रीका से भारत आकर गांधीजी ने गोखले के परामर्श के अनुसार भारत का भ्रमण किया, उसे जाना, पहचाना; उसी के आधार पर आगे बढ़े। वे समझ लगातार विकसित होती रही, और 7 नवंबर 1929 को उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा : ‘हम एक ऊंची ग्राम-सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। हमारे देश की विशालता और हमारी भूमि की स्थिति तथा आबोहवा, मेरी राय में; मानो यह तय कर दिया है कि उसकी सभ्यता ग्राम सभ्यता ही होगी। उसके दोष तो मशहूर हैं, लेकिन उनमें कोई ऐसा नहीं है, जिसका इलाज न हो सकता हो।’

इसके आगे उन्होंने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया था : उस समय देश की आबादी तीस करोड़ थी। उतनी ‘बड़ी’ आबादी के लिए और कोई विकल्प था ही नहीं, ग्राम स्वराज के अलावा! हां, विकल्पों पर तब विचार हो सकता था अगर आबादी केवल तीन करोड़ की जा सकती! क्या आज एक सौ तीस करोड़ पर आधुनिक सभ्यता और शहरीकरण का बोझ डालना सही रणनीति मानी जा सकेगी? अगर हमने अपनी योजनाओं में ग्राम स्वराज और किसान तथा मिट्टी को शुरू से ही गांधी के इच्छानुसार तरजीह दी होती, तो आज किसानों की आत्महत्याओं का ‘सामान्यीकरण’ न हो गया होता! किसानों का ऋण माफ करने की योजनाएं अब चुनाव घोषणा पत्रों का आवश्यक अंग बन गई हैं : चौबीस घंटे में माफ; दस दिन में माफ! बाद में क्या होता या नहीं होता है, इस पर बहसें होती रहती हैं।

यह तथ्य कोई नकार नहीं सकता है कि किसान के कष्ट और निराशाएं बढ़ती ही रहती हैं, उनके गांव उजाड़ होते जा रहे हैं! दिल्ली में हवा में जहर घुलता है, हरियाणा और पंजाब के किसान पराली जलाने के गुनहगार घोषित कर दिए जाते हैं, जेलों में डाले जाते हैं, अन्य प्रकार से भी प्रताड़ित होते हैं, मगर कोई सरकार आगे आकर उनके समक्ष पराली के वैकल्पिक उपयोग के संसाधन उचित परिमाण में उपलब्ध कराने का दायित्व लेने का कष्ट नहीं उठाती है। गांधी तो आत्मनिर्भर गांव की संरचना चाहते थे, वे उस तकनीक के भी विरुद्ध नहीं थे, जो उसमें सहायता कर सके। गुजरात के अमूल का उदाहरण बहुत कुछ कहता है। इसमें डेरी उद्योग में नई आधुनिक तकनीकी का समय की आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर उपयोग किया गया है।

लाखों किसानों के जीवन पर इसका सार्थक और समर्थक प्रभाव पड़ा है। गांधी की इसी दृष्टि से समझना होगा। वे गतिशीलता के विरुद्ध कभी नहीं रहे, अपने सोच और विचारों में बदलाव को वे स्पष्ट रूप से स्वीकार करते थे। इंदौर की एक आमसभा में 10 मई, 1935 को गांधीजी ने कहा था कि वे इस धारणा से सहमत नहीं हैं कि हिंदुस्तान की आबादी इतनी बढ़ गई है कि उसके भरण-पोषण के लिए मशीनों की आवश्यकता है। वे मानते थे कि ‘हम हिंदुस्तान के छोटे-छोटे उद्योगों से करोड़ों रुपए का धन पैदा कर सकते हैं। उसमें पैसे की भी विशेष आवश्यकता नहीं है, जरूरत है लोगों की मेहनत की।’ गांधीजी औद्योगिक सभ्यता के खिलाफ थे। वे ऐसे यंत्र नहीं चाहते थे, जो ‘काम न रहने के कारण आदमी के अंगों को बेकार बना दें।’ गांधी का विश्वास था कि जब तक व्यक्ति मशीन का मास्टर है, उसका उपयोग होना चाहिए। मगर जब मशीन व्यक्ति की बॉस हो जाएगी तब मशीन का ही शासन होगा! इससे बचाना चाहिए।

आज एआई- आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस- का जमाना है। युवा जानते हैं कि उनकी क्या स्थिति है। रही गांव की बात, तो जब ट्रैक्टर आए, श्रम कम हुआ, मगर साथ ही साथ पशु हटे और घटे, पेड़ कटे, तालाब और अन्य जल स्रोत विलुप्त होते गए, मशीनों के कारण यह सब भी आसान होने के कारण आंख मूंदकर होता गया! मगर अब हम कहां पहुंचे हैं? हमारी कृषि भूमि से रासायनिकों के दुष्प्रभाव को निकाल पाना असंभव-सा लगता है, जलस्तर नीचे जा रहा है, खाद्य पदार्थों में जहरीली मिलावट बढ़ती ही जा रही है। आज आर्गेनिक फल, सब्जियां तीन-चार गुने दामों में लोग ढूंढ़ रहे हैं! और भी बहुत कुछ नियंत्रण से बाहर जा रहा है। सरकारें चीन के लिए बाजार खोल देती हैं, वे सस्ते माल से बाजार को पाट देते हैं। जनता से अपेक्षा की जाती है कि वह चीनी माल न खरीदे! यह कैसी विडंबना है? कहां गए वे दस्तकार, कारीगर जो अंतिम पंक्ति में खड़े थे और जिनके लिए गांधी हर पल चिंतित रहते थे?

‘हिंद स्वराज’ के तीस वर्ष बाद गांधीजी ने स्वयं कहा कि अगर मैं हिंद स्वराज पुन: लिखूं, तो कुछ शब्द बदल दूंगा, मगर मूल भावना और संकल्पना तो वही रहेगी। आज के नीति निर्धारक अगर गांधी के विचारों को समझाने का सघन प्रयास करें, उसके मूल उदेश्य तथा लक्ष्य को पहचान सकें, तो निश्चित रूप से बदली हुई परिस्थितितों में भी समाधान निकाले जा सकेंगे, जिनमें स्वदेश, स्वराज और स्वदेशी पुन: अपना उचित स्थान पा सकेंगें।

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