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तीरंदाजी: होने और दिखने के बीच

मीना कुमारी की छवि एक सहनशील आदर्श भारतीय नारी की थी, जो बिना उफ किए सारे जुल्म और जिंदगी के उतार-चढ़ाव सह जाती है। एक तरह से उन्होंने अपने पूरे करिअर में सिर्फ ऐसी फिल्में की, जो परंपरागत नारी जीवन का सजीव, हृदय स्पर्शी चित्रण करती थी।

Author Published on: October 6, 2019 12:57 AM
मीना कुमारी

अश्विनी भटनागर

अदाकारा मीना कुमारी ट्रेजेडी क्वीन के तौर पर मशहूर हैं। उन्होंने अपने लगभग छत्तीस साल के फिल्मी सफर में सिर्फ तीन ऐसी फिल्में की थी, जो कि हलकी-फुलकी कॉमेडी फिल्में कही जा सकती हैं। उनका नाम भावुक फिल्मों से इस तरह जुड़ा था कि दर्शक सिनेमा घर में मीना कुमारी से साथ आंसू बहाने के लिए तैयार होकर जाता था। निर्माता और निर्देशक भी उनके पास वही कहानी लेकर जाते थे, जिसमें भावोत्तेजक पुट पूरा हो। मजे की बात यह है कि दुख और सहानुभूति के भाव उभारने वाली नायिका से कभी दर्शकों का मन भरा नहीं और उनकी ज्यादातर फिल्में हिट साबित हुई थीं।

‘साहब बीवी और गुलाम’ और ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों ने मीना कुमारी को अमर कर दिया है। दोनों ही बेहद दर्दनाक पटकथा पर आधारित थीं। ‘साहब बीवी और गुलाम’ में मीना कुमारी ने एक संभ्रांत बंगाली परिवार की छोटी बहू की भूमिका निभाई थी, जो अपने पति की उपेक्षा की वजह से धीरे-धीरे शराब में घुल जाती है। ‘पाकीजा’ में उन्होंने एक तवायफ का किरदार निभाया था, जिसकी प्यार पाने की तड़प अंजाम तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है। दोनों ही फिल्मों में मीना कुमारी अपने पात्र का दर्द बेहद सशक्त तरीके से दर्शकों से साझा करने में कामयाब रही थीं। यह उन्हीं का हुनर था कि चाहे टीस छोटी बहू की हो या साहिबजान की, वे हर मन में आज भी घुमड़ जाती है।

मीना कुमारी की छवि एक सहनशील आदर्श भारतीय नारी की थी, जो बिना उफ किए सारे जुल्म और जिंदगी के उतार-चढ़ाव सह जाती है। एक तरह से उन्होंने अपने पूरे करिअर में सिर्फ ऐसी फिल्में की, जो परंपरागत नारी जीवन का सजीव, हृदय स्पर्शी चित्रण करती थी। छोटी बहू की भूमिका में वे जरूर मद्य में चूर नजर आई थीं, पर फिल्म के अंत में उन्होंने परंपरागत रूढ़ि को अपने अंदाज में निभाया था। अभिनय में उन्होंने न किसी और कलाकार की नकल की थी और न ही उनका कोई प्रेरणा सोत्र था। वे अनुपम थीं, अनूठी थीं।

पर आश्चर्य की बात यह है कि निजी जीवन में उनको प्रेरणा एक ऐसी शख्सियत से मिलती थी, जो उनके प्रस्तुत रूप से एकदम विपरीत थी। वास्तव में यह विश्वास कर लेना एकदम से मुश्किल है कि मीना कुमारी अमेरिकी अभिनेत्री मर्लिन मुनरो से बेहद प्रभवित थीं। मुनरो उनके जीवन में एक पोस्टर गर्ल की तरह थीं, जिनको देख कर वे रश्क करती थीं। मर्लिन मुनरो कामोत्तेजक भूमिकाए निभाती थीं और अपने व्यक्तिगत जीवन में भी वे आजाद खयाल थीं। उनका अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी से संबंध उसी तरह सुर्खियों में रहा था जैसे कि उनकी बेबाक प्लेबॉय मैगजीन में तस्वीरें चर्चा में रही थीं।

दोनों का रहन-सहन, पालन-पोषण एकदम अलग था। सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी जुदा थी। पर फिर भी मीना कुमारी मर्लिन मुनरो पर क्यों रीझ गई थीं? क्या उनकी दबी हुई शख्सियत मुनरो के जरिए अपने को जाहिर कर रही थी? क्या यही वजह थी कि मीना कुमारी ने चुपचाप अपनी निजी जिंदगी को शराब और बेलौक संबंधों के हवाले कर दिया था?

मीना कुमारी दोहरा जीवन जीने वालों में अकेली नहीं है। ज्यादातर लोग पेश कुछ और आते हैं और होते कुछ और हैं। मीना कुमारी की तरह वे अपनी प्रेरणा की चर्चा नहीं करते हैं, पर अंदर ही अंदर उनका व्यक्तित्व करवट ले रहा होता है और जब वह जगजाहिर होता है, तो आसपास वाले चौंक जाते हैं। मनोविज्ञानिकों का कहना है कि हम वह नहीं होते हैं, जो हमें हमारा माहौल बनाता है, बल्कि वह होते हैं, जो हमारा माहौल हमारे अंदर दमित करता है। परिवार, समाज, परंपरा आदि से हम बहुत कुछ सीखते हैं और इन सब सीखों का अनुकरण भी करते हैं। पर यह अनुकरण महज एक मुखौटा होता है, जिसको हम सामाजिक स्वीकार्यता पाने के लिए पहन लेते हैं। वास्तव में हम ढोंग करते रहते हैं, जिसका पर्दाफाश एक दिन अचानक हो जाता है और व्यक्ति अपनी पूर्ण नग्न अवस्था में प्रकट हो जाता है।

ऐसा होने से पहले वे अपनी दमित भावनाओं को अपने भीतर घोटता रहता है। साथ ही वह अपने प्रेरणा स्रोत की विवेचना स्वयं करता है और उसमें इतना उलझ जाता है कि रात को रात मानने को तैयार नहीं होता है। अपने सामने सारे साक्ष्य होने के बावजूद वह उनको झुठलाने पर आमादा रहता है।

एक तरह से मन ही मन जिसको हम अपना हीरो चुनते हैं, यानी जिससे प्रेरणा लेते हैं वह हमारे प्रकट व्यक्तित्व से ठीक उल्ट ही होता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जितना ज्यादा व्यक्ति या समाज दमित होगा उतनी ही उसकी प्रेरणा नकारात्मक रूप में बलिष्ठ होगी। वह पालनहारे में पाए जाने वाले बलिष्ठ गुण को नकार कर विध्वंसकारी प्रेरणा को तलाश कर अपना लेगा। इतिहास इस प्रवृत्ति का गवाह है। लोग और राष्ट्र इसकी आग में स्वाह होते रहे हैं।

वैसे दमित भाव उत्पन्न होने के बहुत सारे कारण हो सकते हैं, पर उसको पहचान कर सही दिशा देने की योग्यता अमूमन हम सबमें नहीं होती है। हमारी दमित मानसिकता सकारात्मक भाव को पनपने नहीं देती है। वैसे भी भावनाओं की रौ में बह जाना आसान होता है। हम उसमें बह कर अपने को मुख्यधारा में होने का आभास दिलाते रहते हैं।

वास्तव में मीना कुमारी वैसी नहीं थी जैसी वे अंतत: बन गई थीं। उनमें बचपन से ही गरीब होने की कुंठा थी। कुछ सालों में वे अमीर और मशहूर हो गई थीं, पर इसके बावजूद उनकी कुंठा गई नहीं थी। वह दूसरे रूप में पनपती रही थी। उसने मर्लिन मुनरो की शक्ल अख्तियार कर ली थी। मुनरो प्रेरणा बन गई थीं- एक ऐसी प्रेरणा जिसने मीना कुमारी को न घर का रखा न घाट का। पति से अगलाव, अत्यधिक मद्यपान और बेलगाम दिलबरी ने उनकी जान ले ली थी। मुनरो भक्ति उनको ले मरी थी।

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