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तीरंदाज: मानवता का मूल करुणा

अरस्तू हो या फिर प्लेटो या फिर आज का डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट, कवि, दार्शनिक, लेखक या वास्तुशिल्पी सभी अपनी परम करुणा के कारण श्रेष्ठता की बुलंदी पर पहुंच पाए हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: September 15, 2019 12:58 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अश्विनी भटनागर

मैं वास्तव में हिंदू हूं।’ कह कर उन्होंने मुझे चौंका दिया था।
‘कैसे? आप तो ठेठ अमेरिकी हैं?’ मैंने हंस कर कहा। ‘आप श्वेत हैं, कैथोलिक क्रिश्चियन हैं और साथ में पुरुष भी हैं- आपकी तो खालिस अमेरिकी पहचान है। इसके आलावा आप विज्ञान के क्षेत्र में भी कई लंबे-लंबे झंडे गाड़ चुके हैं। आप हिंदू कैसे हो सकते हैं? धर्म परिवर्तन!’
‘नहीं। कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया है। पर मैं ठीक कह रहा हूं। मैं हिंदू हूं।’
‘वो कैसे?’
‘मैं आपको बताता हूं कैसे।’ उन्होंने कहा और फिर मेरे साथ बैठ गए।
मैं इन साहब से कुछ देर पहले एक दोस्त के यहां चल रही पार्टी में मिला था। दोस्त ने मेरे अमेरिका आगमन पर अपने कुछ खास मित्रों और सहयोगियों को खाने पर बुलाया था। ज्यादातर मेहमान वैज्ञानिक थे या फिर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र के जाने-माने लोग थे। मैं हिंदुस्तान से आया था, इसलिए शुरुआती बातचीत वहीं के बारे में हुई थी और फिर उसमें कई और विषय जुड़ गए थे। पर देर शाम को इन साहब ने यकायक अपने को हिंदू कह कर मुझे चौंका दिया था। चूंकि मजाक की कोई गुंजाइश नहीं थी, इसलिए मैं पूरी संजीदगी से उनकी तरफ मुखातिब हो गया था।
‘देखिए’, उन्होंने अपनी बात शुरू की, ‘हिंदू कौन है?’
‘कौन है?’ मैंने उनके प्रश्न पर प्रश्न किया।
‘जिस व्यक्ति में करुणा है, वह हिंदू है।’
‘करुणा भाव तो हर व्यक्ति में होता है।’ मैंने तपाक से कहा था।
‘नहीं।’
‘नहीं?’
‘करुणा बहुत कम लोगों में होती है। थोड़ी-बहुत दया सबके दिल में होती है और इसीलिए ज्यादातर लोग किसी अन्य का कष्ट देख कर कुछ क्षण के लिए द्रवित हो जाते हैं। जब उनके दिल में दया जागती है तो पैसे से या फिर किसी और तरीके से पीड़ित व्यक्ति की मदद कर देते हैं। सहानुभूति दिखा कर भी वे गैर का दर्द कम करने की कोशिश करते हैं। वे दया करते हैं।’
‘दया ही तो करुणा है, दोनों शब्द एक ही भाव के लिए उपयोग किए जाते हैं।’ मैंने कहा।

‘नहीं। दोनों में फर्क है। दया क्षणिक होती है, करुणा स्थायी। दया भाव है, करुणा स्वभाव है। भाव बदलते रहते हैं। स्वभाव कभी नहीं बदलता। यह अभिवृत्ति, मनोदृष्टि है जो जन्मजात होती है। हिंदू जन्मजात होता है। अगर आप हिंदू हैं तो हिंदू हैं, कहीं और से परिवर्तित होकर हिंदू नहीं बन सकते हैं।’
वे अपनी बात बेहद शांत और तार्किक लहजे में कर रहे थे। मैं उनको गौर से सुनने लगा था।

‘जिस व्यक्ति में करुणा होती है, वह अस्थायी विकल्प नहीं ढूंढ़ता है। अगर करुणामय व्यक्ति को किसी के रोग से दुख होता है तो वह सिर्फ सहानभूति नहीं जताता या उसकी सेवा में नहीं लग जाता है, बल्कि पूर्ण उपचार की खोज में अपने को होम कर देता है। इसी तरह से आवागमन के कष्ट को समझने पर करुणामय व्यक्तियों ने बैल गाड़ी से लेकर हवाई जहाज तक के उपचार ढूंढ़ निकाले हैं। रोजाना के ऐसे उपचारों की लंबी सूची बनाई जा सकती है जिसको करुणामयी लोगों ने स्थायी परिणति तक पहुंचाया है। उन्होंने दया तक ही अपने को सीमित नहीं रखा, बल्कि करुणा को साकार किया है।’

‘ऋषि, मुनि और शास्त्री जिन्होंने वेद, उपनिषद, पुराण और शास्त्र लिखे थे, वे अति करुणामयी महानुभाव थे। वे मूल हिंदू थे। भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, आदि शंकराचार्य करुणामय गंगा की विभिन्न धाराएं हैं। आज जो व्यक्ति वाणिज्यिक कारणों को अलग कर के अपना काम पूरी निष्ठा से करता है, वह हिंदू है। वह माया-मोह से अलग हट कर निष्काम भाव से नश्वर संसार और देह को अमरत्व की ओर अग्रसर कर रहा है।’
हम उनकी बात सुन कर अवाक थे। पार्टी में जो कुछ आवाजें उठ थीं, धीरे-धीरे शांत होती गई थीं। सबका ध्यान उनकी तरफ खिंच गया था। पर वे एकाग्रचित्त होकर सिर्फ मुझसे मुखातिब थे।
‘कष्ट निवारण सिर्फ मानव जाति की प्रवृत्ति है। पशु, पक्षी या फिर वनस्पति को कष्ट का बोध नहीं होता है और अगर होता भी है तो मानव की तुलना में न के बराबर होता है। बोध के आभाव में निवारण का संकल्प अन्य जातियों में नहीं हो सकता है। सिर्फ मनुष्य संकल्प कर सकता है, पर उसका संकल्प करुणा के जरिए ही पूरा होता है।’
वे बोलते जा रहे थे, ‘आप तो जानते ही होंगे’, उन्होंने मुझसे कहा, ‘कि हिंदू यज्ञ या पूजा में संकल्प लिया जाता है!’
‘हां, लिया जाता है।’ मैंने हामी भरी।
‘मैं इसी संकल्प की बात कर रहा हूं। करुणा को अपने मानस में संग्रहीत करने का संकल्प वास्तव में श्रेष्ठता प्राप्त करने का बीज मंत्र है।’
अमेरिकी वैज्ञानिक अपनी बात बिना संकोच के कह रहे थे। वे पूरे आत्मविश्वास से कई हिंदुस्तानी हिंदुओं को हिंदू होने का अर्थ बता रहे थे। उनका विश्वास उनके अध्ययन और संग्रहण पर टिका था।
‘सर’, उन्होंने हौले से कहा, ‘मैं और आप दुनिया के दो अलग कोनों में रहते हैं, अलग-अलग संस्कृतियों में पले-बढ़े हैं, हमारा खाना-पीना अलग है, पर अगर जब हम करुणा को आत्मसात कर लेते हैं तो हम सब हिंदू हो जाते हैं।’
‘आपका मतलब है कि श्रेष्ठता हिंदू का पर्यायवाची है?’

‘यस सर। हिंदू धर्म नहीं है। श्रेष्ठता का मानक है। दुनिया भर के धर्म दया पर जोर देते है, पर चूंकि हिंदू व्यवस्था जीवन जीने का तरीका है, इसीलिए वह दया को नहीं, बल्कि करुणा को महत्त्व देती है। कर्म को प्रधानता देती है। रिश्ता पालन पर जोर देती है। दुनिया की कोई भी प्राचीन सभ्यता हो या फिर आज का आधुनिक समाज, सबके सृजन का स्रोत करुणा में निहित है।

अरस्तू हो या फिर प्लेटो या फिर आज का डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट, कवि, दार्शनिक, लेखक या वास्तुशिल्पी सभी अपनी परम करुणा के कारण श्रेष्ठता की बुलंदी पर पहुंच पाए हैं। वे हिंदू हैं। मैं करुणा का कायल हूं, कर्मप्रधान हूं, अपने कर्म में श्रेष्ठता लाने के लिए प्रयासरत हूं, इसलिए हिंदू हूं। मैं कुछ और हो ही नहीं सकता हूं।’

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