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तीरंदाज: छुटकी के साथ

छुटकी कहो या लाडो, बात एक ही है। हम लोग रोज शाम को घूमने जाते हैं। सूरज के अस्त होने के कुछ पहले ही छुटकी अपनी दोपहर की नींद से उठती है और अपना पट्टा लेकर मेरे सामने खड़ी हो जाती है।

Author Published on: November 3, 2019 12:48 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अश्विनी भटनागर

छुटकी खिलने को आतुर है। मैं, उसको अपने मन की तरह, बांधे रहता हूं। मैं अपने डर से बंधा हूं और बेचारी छुटकी मुझसे बंधी हुई है। मैं मन की आजादी से सहम जाता हूं। छुटकी बेपरवाह है। छुटकी मुझे बहुत प्रिय है। मैं उसके साथ बहुत समय बिताता हूं। खासकर अपने एकांत और खामोशी का समय। वह सब जानती है और शायद इसीलिए छुटकी मेरा भाव और मन भांप कर उसमें एक क्षण में रम जाती है। वह न कोई सवाल करती है और न ही अपने मन की बात जाहिर करती है। बस मेरे प्रवाह में जैविक, प्राकृतिक रूप से शामिल हो जाती है। उसका यह भाव मुझे बहुत भाता है। जब मैं किसी सोच में होता हूं तो उसको दुलारने लगता हूं। पता नहीं क्यों गहन सोच मेरे मन में उसके लिए दुलार उत्पन्न कर देता है और मैं उसके सिर पर हाथ फेरने लगता हूं। वह गोदी में और सिमट आती है और बस एकटक सिर उठाए मेरी आंखों से मौन संवाद करती है। विचार का जब कभी तारतम्य कुछ क्षणों के लिए टूटता है, तो मैं उसकी आंखों में देख कर प्यार से मुस्करा देता हूं। उसके लिए वह पल भर की मुस्कराहट काफी है- वह समझ जाती है कि हम कह रहे हैं कि छुटकी बिटिया अब हम तुम्हे क्या बताएं, हम किस कशमकश में हैं? क्या हम कहें और तुम सुन कर क्या करोगी? हर आदमी को अपनी उलझन खुद ही सुलझानी पड़ती है। उसकी कोई क्या मदद कर सकता है।

पर छुटकी अपनी तरह से मदद हर बार करती है। चुप रह कर, खामोश समझदारी बरत कर। उसको खूब मालूम है कि किसी भी उलझन का कोई स्थायी हल नहीं है। वह समझती है कि इंसान अल्पकालिक कामचलाऊ प्रतिवचन जरूर ढूंढ़ सकता है, पर अपने हालात पर महावत की तरह अंकुश नहीं लगा सकता है। पहली कशमकश दूसरी कशमकश की जननी होती है और यह प्रक्रिया अंत तक चलती रहती है। यह वह रक्त बीज है, जो हर पल मनुष्य के मानस में नया दानव उत्पन्न करता है और उसका सारा जीवन असंख्य दानव-छायाओं से आभासी युद्ध करते हुए गुजरता है। पर छुटकी की जिंदगी में आभासी कुछ भी नहीं है। सब कुछ वास्तविक है। इसलिए वह न तर्क करती है और न ही दर्शन की ओर जाती है। उसके लिए स्पर्श की आत्मीयता सर्वप्रधान है। स्पर्श सब कुछ कह जाता है और उसका अनुभव स्वयं में विस्तृत वार्तालाप का बोध है। छुटकी का हर स्पर्श मुझमें एक अनूठा बोध जगाता है।

छुटकी और मेरी योनि अलग अलग हैं। कहते हैं, लाखों योनियां पार करने के बाद ही मनुष्य योनि मिलती है। मैं मनुष्य योनि को प्राप्त हूं। छुटकी श्वान योनि में है। मेरे पास विवेक है। कहते हैं, पशु विवेकहीन होते हैं। मनुष्य और पशु के बीच विवेक ही सबसे महत्त्वपूर्ण भेद है। इसलिए मनुष्य जाति पशु जाति से उत्कृष्ट है। मेरे पास विवेक है और मैं अक्सर उलझनों में फंसा रहता हूं। छुटकी विवेकहीन है। उसकी सद्भावना, उसका समर्पण, अगाध प्रेम और सहज समझ मेरे विवेक को अक्सर लांघ कर मुझे उस संवेदना तक ले जाते हैं, जिसमें सोच के बोझ को मैं झटक कर सिर्फ उस पल के आनंद के स्पर्श से अभिभूत हो जाता हूं। विवेक पर अनुभव की अनुभूति मुझे यकायक सरस बना देती है। सोच पिघल कर ‘होने’ की तरलता का एहसास जगा देती है।

छुटकी जब भी मुझे टकटकी बांधे देखती है, धीरे से और पास और फिर और पास खिसकती आती है, तो वह अपनी मूक संवेदनाओं को मुझसे संबद्ध कर निष्कर्षों के बियाबान में भटकने से बचा लेती है। वह सूंघ कर रास्ता ढूंढ़ लेती है, जबकि मैं विवेचना के झाड़ झंखाड़ में फंसा रहता हूं। हम सूंघ नहीं पाते हैं और शायद इसीलिए हमें हमेशा दिशा और दशा भ्रम रहता है। हमारा दिमाग और जुबान ज्यादा चलती है और सहज प्रवृत्ति बिल्कुल नहीं। इनके जरिए हमने अपने आप को लाचार कर दिया है।

ऐसा नहीं है कि छुटकी कोई विशिष्ट जंतु है। उससे पहले मेरी लाडो थी। उसकी तबियत को लेकर मैंने कुछ ज्यादा ही बुद्धि लगाई थी और वह अकाल ही काल का ग्रास बन गई थी। बेहद पछतावा हुआ था। लाडो की कमी बहुत महसूस होती थी, पर काफी समय तक हिम्मत नहीं हुई थी कि दूसरी बिटिया को घर ले आने का खयाल भी मन में पालें। पर एक दिन लाडो का खयाल मन से उठ कर दिमाग पर हावी हो गया। छुटकी घर आ गई। उसने हमारी गोद में बैठ कर एहसासों को फिर से हरा-भरा कर दिया। लाडो की सोच खत्म हो गई थी। उसका अनुभव फिर जी उठा था।

छुटकी कहो या लाडो, बात एक ही है। हम लोग रोज शाम को घूमने जाते हैं। सूरज के अस्त होने के कुछ पहले ही छुटकी अपनी दोपहर की नींद से उठती है और अपना पट्टा लेकर मेरे सामने खड़ी हो जाती है। अगर मैं टालमटोल करता हंू तो अपना पंजा मेरे हाथ पर बार-बार मार कर चलने का आग्रह करने लगती है। मेरे उठते ही उस पर शोखी सवार हो जाती है। बल खाती, वह कभी मेरे आगे-आगे दौड़ती है तो कभी अचानक मुड़ कर मेरे पैरों में लिपट जाती है। अगर मैं रुक जाऊं तो पलट कर वह दबे स्वर में भौंकती है। वह स्वर शिकायत का होता है- रुक क्यों गए? आओ मेरे साथ दौड़ो न! उसकी शाम की शोखी मेरे मन में भी उल्लास जगा देती है। उसका अपने पट्टे को खींचना ठीक उसी तरह होता है जैसे कभी-कभी मेरा मन अपनी सीमा रेखाओं को खींचने लगता है। मस्ती बंधन नहीं चाहती है। शोखी बेलगाम होकर ही खिलती है। छुटकी खिलने को आतुर है। मैं, उसको अपने मन की तरह, बांधे रहता हूं। मैं अपने डर से बंधा हूं और बेचारी छुटकी मुझसे बंधी हुई है। मैं मन की आजादी से सहम जाता हूं। छुटकी बेपरवाह है। उसकी अपनी वृत्ति पर भरोसा है। मुझको अपनी वृत्ति पर भरोसा नहीं है। मैं समझदार आदमी हूं, इसलिए अपने अंदर की शोखी का संज्ञान लेने से बचता हूं। कृत्रिम भोग और विलास मेरा लक्ष्य है। सब कुछ है, बस वह छुटकी वाली मस्ती नहीं है। शाम की बयार में ठुमक-ठुमक कर चलने की शोखी नहीं है।

मैं खुश नहीं हूं। छुटकी खुश है। हम दोनों साथ हैं, क्योंकि उसका मुझसे जो रिश्ता है वह मेरी इस कमी को पूरा करता है। छुटकी इंसानी दिवालियापन को जन्मजात समझती है। वह मेरी पूरकता की प्राप्ति के लिए अपनी आहुति दे रही है। पट्टे से बंधी है, पर बेबाक अंतरंगता से हर बार मेरी एक और गिरह खोल देती है। मुझे आदमी से इंसान बनाने की उसकी उत्सुकता मेरी उदासीनता को अपने पर हावी नहीं होने देती है। सही मायने में वह मेरी ‘बेस्ट फ्रेंड’ है।

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