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तीरंदाज: दबी हुई चुप्पी

आधुनिक युग में शायद एक तरफ से कही गई बात को संवाद माना जाने लगा है। कहीं न कहीं दूसरे से हमारी अपेक्षा यह रहती है कि वह जुबान न खोले। सिर्फ सुने, बोले नहीं। बोलना सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक पाप माना जाने लगा है।

Author Published on: October 13, 2019 12:58 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

अश्विनी भटनागर

आपकी बातचीत कैसी रही?’ अमेरिका में लेक ताहो के किनारे पर स्थित कलाकृतियां बेचने वाली दुकान के युवा मालिक ने मुस्करा कर पूछा। मुझे उसका सवाल अटपटा-सा लगा था, क्योंकि दुकान में आने के बाद से मैंने एक शब्द भी नहीं बोला था। दुकान में लगी हुई कई कलाकृतियों को मैंने जरूर ध्यान से देखा था और फिर एक बड़े से लट्ठे से तराशी गई रेड इंडियन की आकृति को काफी समय तक निहारा था। लकड़ी की बनी लेक ताहो के मूल निवासी रेड इंडियन की जीवंत मूर्ति ने मुझे बेहद आकर्षित किया था। बुत की आखों में ममतामयी करुणा समाई हुई थी। अपने सवाल से मुझे थोड़ा हतप्रभ देख कर युवा ने मूर्ति की ओर इशारा किया।
‘उन साहब से आपके लंबे संवाद के बारे में पूछ रहा था।’
‘दिलचस्प थी। अच्छा लगा उनसे मिल कर।’ मैंने हंस कर कहा था।

‘जरूर लगा होगा। एकतरफा संवाद सबसे प्रभावी संवाद है। कहने वाले को खूब सुख मिलता है उससे। वैसे अगर आप देखें, तो बुत हुए लोगों से संवाद की कशिश ही कुछ और है। मूकता से जीवंत संवाद इसीलिए वक्ताओं को बड़ा लाभकारी लगता है। वे अपने हिसाब से अपनी बात कर लेते हैं और फिर अपने हिसाब से ही जवाब की कल्पना करके अपने बयान से संतुष्ट हो जाते हैं।’

‘आप कह तो ठीक रहे हैं। मैंने एक तरह से इस काठ की मूर्ति से संवाद ही किया था। उसकी आखों में झांक कर उसके विलुप्त जीवन को समझने की कोशिश की थी। पर यह मूर्ति आपने अपनी दुकान में क्यों सजा रखी है? इस इलाके से इसका क्या संबंध है?’

युवा दुकानदार (एक ठेठ अमेरिकी श्वेत व्यक्ति) अपना काउंटर छोड़ कर मूर्ति की तरफ बढ़ चला। ‘मेरा इस स्थान से कोई सीधा संबंध नहीं है। इसका है। पर यह अपनी कहानी आपको बता नहीं सकता है। इसको जड़ कर दिया गया है।’
‘मतलब?’ मैंने उत्सुकता से पूछा।

दुकानदार ने आदमकद मूर्ति के कंधे पर दोस्ताना हाथ रखते हुए अपनी बात जारी रखी, ‘क्रिस्टोफर कोलंबस ने जब अमेरिका की खोज की थी, तो उसने इनको यानी रेड इंडियंस को यहां रहते हुए पाया था। खोजने तो वह आपका देश निकला था- इंडिया और उसमें रहने वाले ब्राउन इंडियंस- पर पहुंच गया वह यहां और उसको जो मिले उनको देख कर उसने इंडियंस को रेड बता दिया था। ये सारे अमेरिकी महाद्वीप में फैले हुए थे। लेक ताहो में भी खूब थे। प्रेम और शांति के माहौल में उनकी एक अनूठी सभ्यता फल-फूल रही थी। इस झील का नाम दओ था और इसके चारो तरफ वषों नाम का कबीला रहता था। फिर 1848 में यहां की नदी में सोना मिलने की खबर फैल गई थी, दस साल बाद चांदी की खदान का भी पता चल गया था। फिर क्या था, गोरों की भीड़ यहां उमड़ पड़ी। रेड इंडियंस के लिए चमकीली धातुओं का कोई विशेष उपयोग नहीं था, पर हमारे लिए उसकी कीमत बहुत थी। पहले वे समझ नहीं पाए थे कि अचानक इतने बाहर के लोग क्यों उनके देश में घुसे चले आ रहे हैं। पर जब उन्हें समझ में आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।’

उसने एक लंबी सांस भरी और कहा, ‘उनको मालूम नहीं था कि लालच संवाद नहीं करता है, अपनी पूर्ति के लिए सिर्फ संहार करता है। गोरों का लालच इनको लील गया। एकतरफा संवाद की परिणति आज आप इस काठ के पुतले में देख रहे हैं। इंडियंस नहीं रहे हैं, अब बस उनकी प्रतिमाएं बना कर हम संतुष्ट हो रहे हैं।’

उसकी बात सुन कर मैं कुछ सोच में पड़ गया। कुछ मिनट पहले जिसे मैं मात्र एक वस्तु विशेष के रूप में देख रहा था, वह फौरन एक रूह, शरीर और जुबान में तब्दील हो गया था। मैं उसकी आपबीती को उसकी गरम सांसों के जरिए महसूस करने लगा था। पुतला जी उठा था। कुछ देर पहले जो मैंने एकतरफा संवाद किया था, अपने तरीके से उसकी आखों से झलकती करुणा को समझ कर मूर्तिकार की कलात्मकता से अपने को संबद्ध किया था, वह सब यकायक बेमानी हो गया था।

मन ही मन अपनी बात कह कर मैं आश्वस्त था कि मैंने मूर्ति और अपने बीच एक रिश्ता कयाम कर लिया था, जबकि वास्तविक स्थिति यह थी कि सत्यता की बुनियाद के बिना कोई रिश्ता संभव ही नहीं था। अगर वह दुकानदार नहीं टोकता, तो मैं अपनी खामखयाली में मस्त रहता। मूक से संवाद कर अपने अनुभव को पूरी मुखरता से किसी और मूक से बयान करता और यह चक्र चलता रहता।

आधुनिक युग में शायद एक तरफ से कही गई बात को संवाद माना जाने लगा है। कहीं न कहीं दूसरे से हमारी अपेक्षा यह रहती है कि वह जुबान न खोले। सिर्फ सुने, बोले नहीं। बोलना सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक पाप माना जाने लगा है। हम अपने को विवेकशील और तर्कशील मनुष्य मानते हैं, पर अपने सामने वाले से मशीनी रोबोट होने की उम्मीद रखते हैं। हमें विश्वास हो चला है कि हम बिना कहे भी सब सुन चुके हैं और हमारा अनुभव बाकी सबके अनुभव से ज्यादा व्यापक, उचित और प्रासंगिक है।

वास्तव में बिना रेड इंडियन की कहानी सुने और बिना उनके अनुभव को जाने मैंने उस मूर्ति के संदर्भ के बारे में अपना मन बना लिया था। अपने पूर्वानुमानों के बूते पर एक समाज की प्रासंगिकता तय कर दी थी। उस पर अपने को थोप दिया था। न मैंने उस संस्कृति का मर्म समझा था और न ही उनके जीवन की विसंगतियों का आकलन किया था। बस एक सतही नजर डाल कर अपने हिसाब से निष्कर्ष निकाल लिया था। उसकी बेजुबानी मुझको सूट करती थी। मैं अपनी संवेदनशीलता से प्रसन्न था।

वैसे मूक से मुखर तक का सफर, जिसमें एकतरफा नहीं बल्कि दोतरफा संभाषण हो, हमारी कामना की वास्तविकता होनी चाहिए। रेड इंडियन लगभग विलुप्त हो गए हैं। यूरोप से आए हुए लोगों ने बंदूक और तोप के गोलों से उनका मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया था, जिसकी वजह से उन्होंने अपनी संस्कृति के साथ-साथ अस्तित्व भी गंवा दिया था। उनको उनकी मुखरता बचा सकती थी, पर बोल के बोलबाले की आवश्यकता से वे अनभिज्ञ थे। वे खत्म हो गए। उनकी कहानी सुनाने वाला भी अब कोई नहीं बचा है। चुप्पी उनकी मौत बन गई थी।

 

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