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वक्त की नब्ज: सियासत का खेल और खिलाड़ी

सत्रहवीं लोकसभा की कहानी का अंत जैसे जैसे पास आ रहा है, वैसे वैसे दिखने लगा है कि इस दौड़ में एक ही खिलाड़ी रहा है औरों से कोसों आगे और उस खिलाड़ी का नाम है नरेंद्र मोदी। एक बार फिर मोदी सरकार अगर बनती है इस हफ्ते, तो श्रेय उनको निजी तौर पर मिलेगा।

Author May 19, 2019 4:16 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

आज शाम तक समाप्त हो जाएगा मतदान, इस आम चुनाव के लिए। आज सारी शाम मेरे जैसे ‘पंडित’ बिताएंगे किसी न किसी टीवी स्टूडियो के चमकते उजाले में उन एग्जिट पोलों का विश्लेषण करते हुए, जो हर चरण के बाद किए गए थे, पर राज रखे गए हैं आज तक। जिन लोगों ने देखे हैं ये एग्जिट पोल चुपके से, बताते हैं कि अगली बार भी बनेगी मोदी सरकार। एग्जिट पोल हमेशा सही नहीं होते हैं, लेकिन इस बार शायद होंगे, क्योंकि इनको बिना देखे ही मैं कह सकती हूं कि जहां भी गई हूं पिछले दो महीनों में, मुझे मोदी के समर्थक ज्यादा मिले हैं, आलोचक कम। यह सिर्फ बालाकोट के कारण नहीं है, लेकिन देश की सुरक्षा एक अहम मुद्दा जरूर रहा है इस चुनाव में।

सबसे बड़ा मुद्दा लेकिन मोदी खुद बने रहे हैं पूरे चुनाव अभियान के दौरान। कुछ इस लिए कि आम मतदाताओं की नजर में उनकी छवि एक ईमानदार, नेक और मेहनती प्रधानमंत्री की है। कुछ इसलिए भी कि मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी ऐसे लोग थे, जिन्होंने मोदी को बदनाम करने के अलावा कुछ नहीं किया। ऐसा करके उन्होंने मोदी की मदद की और अपना नुकसान। खासकर चुनाव के आखिरी दिनों में, जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने यहां तक कह डाला एक आमसभा में कि जब उनकी बारी आएगी, मोदी को जेल भेज दिया जाएगा या देश से भगा दिया जाएगा। यह धमकी जब उस महिला से आती है, जिसके दौर में पंचायतों के चुनाव भी शांति से नहीं हुए हैं, मोदी की मदद करती है नुकसान नहीं।

ममता दीदी अकेली नहीं थीं मोदी की मदद करने में। उनसे भी ज्यादा मोदी की मदद की है कांग्रेस अध्यक्ष ने। राहुल गांधी ने चुनाव अभियान के शुरू होने से पहले ही मोदी की छवि को कलंकित करने के लिए एक मुहिम शुरू कर दी थी रफाल सौदे को घोटाला बता कर। चौकीदार चोर है, चौकीदार चोर है चिल्लाते रहे, बिना कोई सबूत पेश किए कि मोदी ने चोरी कैसे की इस सौदे में। सो, आरोप टिका नहीं मतदाताओं के मन में। जो बात टिकी इस प्रयास से, सिर्फ यह कि देश के प्रधानमंत्री को चोर कहना गलत है। मुझे कई देहाती मतदाता मिले, जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राहुल गांधी को इस तरह की बातें करनी नहीं चाहिए। एक गांव के अध्यापक के शब्दों में, ‘राहुल गांधी का लगता है मानसिक संतुलन हिल गया है। जो भी मन में आता है बोल देते हैं।’ कांग्रेस अध्यक्ष और महागठबंधन के पक्ष में अगर कोई ठोस मुद्दा था, तो वही पुरानी सेक्युलरिजम की कवच। लेकिन इस पर भी शक करने लगे थे लोग, क्योंकि राहुल और प्रियंका गांधी ने अपने आप को अच्छा हिंदू साबित करने के लिए जरूरत से ज्यादा प्रयास किए। मंदिरों के चक्कर काटने लगे और ऐसा करके उन्होंने मुसलमानों के दिमाग में उनकी तथाकथित सेक्युलरिजम को लेकर शक पैदा किया। गोरक्षकों की हिंसा से मुसलिम समाज मोदी से इतना दुखी है कि इस बार खुल कर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बताते हैं कि उनकी रणनीति बन चुकी है उन प्रत्याशियों को वोट देने की, जो भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को हरा सकते हैं। इसका लाभ उत्तर प्रदेश में मिलेगा मायावती और अखिलेश यादव के गठबंधन को, कांग्रेस को नहीं।

समस्या यह है कि बिना कांग्रेस के केंद्र में सरकार बन नहीं सकती, क्योंकि किसी भी राज्य क्षत्रप के पास लोकसभा में इतनी सीटें नहीं आने वाली हैं, जो अपने आप को सबसे बड़ा दल साबित कर सके। यह दावा सिर्फ कांग्रेस कर सकती है, सो सोनिया गांधी ने तेईस मई को महागठबंधन के नेताओं के साथ अपने घर में मुलाकात रखी है। परिणाम आने तक प्रतीक्षा करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अभी तक ऐसा नहीं दिख रहा है कि कांग्रेस पार्टी सौ के आंकड़े तक पहुंच पाएगी, ताकि मोदी को चुनौती दे पाए। मोदी को हराना आसान नहीं था कभी भी। लेकिन हराया जा सकता था, अगर कांग्रेस अध्यक्ष ने पिछले पांच वर्षों में पार्टी की जड़ों को मजबूत करने का दिल से प्रयास किया होता। ऐसा करने के बदले उन्होंने अपने परिवार को मजबूत करने का प्रयास किया, सो जब युद्ध कठिन लगने लगा तो अपनी बहन को उतार दिया युद्धभूमि में। ऐसा करके उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि उनको अपने परिवार के तथाकथित करिश्मे पर भरोसा ज्यादा है, कांग्रेस पार्टी की शक्ति और सिद्धांतों पर कम। समस्या उनकी यह है कि करिश्मा और सेक्युलरिज्म ऐसे कारतूस हैं, जो इतनी बार इस्तेमाल किए गए हैं कि उनमें ऊर्जा ही नहीं रही है।

सो, सत्रहवीं लोकसभा की कहानी का अंत जैसे जैसे पास आ रहा है, वैसे वैसे दिखने लगा है कि इस दौड़ में एक ही खिलाड़ी रहा है औरों से कोसों आगे और उस खिलाड़ी का नाम है नरेंद्र मोदी। एक बार फिर मोदी सरकार अगर बनती है इस हफ्ते, तो श्रेय उनको निजी तौर पर मिलेगा। कई गलतियां रही हैं उनके दौर में, कई वादे हैं, जो अभी तक पूरे नहीं कर पाए हैं, लेकिन मोदी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है और न ही मतदाताओं का उन पर विश्वास।
मेरा मानना है कि उनकी छवि और भी अच्छी होती आज अगर उन्होंने साध्वी प्रज्ञा और योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टरपंथियों को अपना हमसफर न बनाया होता। सबका साथ, सबका विकास वाले वादे पर अगर खरा उतरे होते, तो उनको मुसलमानों का भी वोट मिलता इस बार। पर ऐसा कहने के बाद यह भी कहना होगा कि अपने प्रतिद्वंद्वियों के सामने जब खड़े होते हैं मोदी, तो उनका कद उनसे ऊंचा दिखता है।

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