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आत्म-मोह के मारे लोग

फेसबुक को पता है कि हम कहां रहते हैं और कब-कब कहां रहे, कहां क्या काम करते हैं और क्या करते रहे, किन-किन से हमारा परिचय है, किनसे कब और कहां मिलते हैं, हम कितने अमीर या गरीब हैं, हमें किन चीजों का शौक है, हमारी राजनीतिक विचारधारा क्या है, आदि। और यह कोई साधारण बात नहीं है। इस प्रकार प्राप्त सूचनाएं यदि गलत हाथों पड़ जाएं तो उनका किस प्रकार दुरुपयोग किया जा सकता है, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

Author April 1, 2018 05:45 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

महेंद्र राजा जैन

अभी तक नहीं सीख पाया, न सीखना चाहता हूं कि फेसबुक कैसे खुलता है या खोला जाता है, पर मेरे लैपटॉप पर प्राय: रोज ही दर्जनों की संख्या में बड़ी ही सूझ-बूझ वाले संदेश आते रहते हैं। इनमें से अधिकांश प्राय: ऐसे लोगों द्वारा भेजे गए होते हैं जिन्हें मैं नहीं जानता, पर मैं यह भी नहीं जानता कि उनका उत्तर किस प्रकार दूं। कुछ संदेशों में मुझे ऐसे लोगों के जन्मदिन पर शुभकामनाएं भेजने को कहा जाता है जिन्हें मैंने कभी देखा-जाना तो क्या, उनका नाम भी कहीं पढ़ा-सुना नहीं होगा। अत: उनके जन्मदिन पर बधाई भेजने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता। लेकिन उनका जन्मदिन निकल जाने के बाद मैं अपने आपको बहुत समय तक दोषी मानता रहता हूं और सोचता रहता हूं कि यदि मैंने उन्हें शुभकामना संदेश भेज दिया होता तो अच्छा होता। उससे मेरा कुछ बिगड़ता तो नहीं, पर संदेश पाने वाले को जरूर कुछ खुशी होती। भले ही मैं उसे न जानता होऊं, पर संभव है वह मुझे जानता ही हो।

फिर कुछ ऐसे भी विचित्र लोग हैं जो फेसबुक पर हर दूसरे-तीसरे दिन अपना स्टेटस अद्यतन यानी ‘अप-डेट’ करते रहते हैं, जबकि स्पष्ट है कि उनके मैसेज में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि उनका स्टेटस (पहले भले ही कुछ भी रहा हो या नहीं) किसी भी रूप में कुछ भी बदला है और स्टेटस अद्यतन करने की इस प्रक्रिया में वे लोगों को बताते रहते हैं कि पिछले एक-दो दिन में या अभी कुछ घंटे पहले ही उन्होंने क्या-क्या और कैसे-कैसे (बोरिंग) काम किए हैं। वे ऐसा क्यों समझते हैं कि उनके द्वारा किए गए इन कामों में मुझे दिलचस्पी होगी।
कुछ लोग केवल दूसरों की दृष्टि में अपने को अधिक महत्त्वपूर्ण बतलाने या उन्हें ईर्ष्यालु बनाने के लिए जगह-जगह की पृष्ठभूमि में अपने चित्र डाल कर बताना चाहते हैं कि उन्होंने अपने परिवार के साथ दुनिया के किस प्रसिद्ध होटल में क्या खाना खाया या कहां-कहां की सैर की, आदि। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने को अधिक सुंदर दिखाने के लिए अपने चित्र के स्थान पर किसी दूसरे का चित्र डाल कर प्रभावित करने की चेष्टा करते हैं, पर उनका यह कृत्य ज्यादा समय तक छिप नहीं पाता। और इसके बाद सबसे अधिक आत्ममोहित वे लोग हैं, जिन्हें पता नहीं क्यों अपने ‘नए-नए’ चित्र भेजे बिना चैन नहीं पड़ता। इन चित्रों में उनके परिचितों/रिश्तेदारों को भले ही कुछ रुचि हो, पर किसी और को क्या दिलचस्पी हो सकती है!
मार्च के ‘अक्षर पर्व’ में ललित सुरजन ने लिखा कि कुछ समय पूर्व किसी ने फेसबुक पर एक कविता की दो पंक्तियां नागार्जुन के नाम से डाल दीं। बहुत-से पाठकों ने इस पर विश्वास भी कर लिया क्योंकि वे नागार्जुन की ही शैली की थीं। पर जो लोग जानते थे कि वे नागार्जुन की नहीं हैं उनके प्रतिवाद को एक सिरे से नकार दिया गया। बाद में पता चला कि कविता मध्यप्रदेश के जीवन लाल विद्रोही की थी। इस प्रकार फेसबुक पर कुछ भी लिख दिया जाता है और अधिकतर लोग बिना किसी सोच-विचार के उसे सच मान कर ‘लाइक’ करने लगते हैं।

फेसबुक पर मित्र बनाना तो आम रिवाज है, वस्तुत: इसी से फेसबुक अधिक लोकप्रिय हुआ, पर यह जानना भी कम रोचक नहीं होगा कि कुछ लोग मित्रता गांठने के लिए, लोगों को प्रभावित करने के लिए अपने परिचय में भी बढ़ा-चढ़ा कर ऐसी-ऐसी बातें लिखते हैं जो सच नहीं होतीं। विवाहित व्यक्तियों द्वारा अपना पारिवारिक संबंध छिपाना तो आम बात है। किसी इंटर कॉलेज में मामूली अध्यापक ने अपने को विश्वविद्यालय का प्रोफेसर बता कर अपने फेसबुकी मित्रों को प्रभावित करने की चेष्टा की, तो मेरे एक पैंसठ वर्षीय परिचित ने अपनी उम्र पचपन वर्ष बता दी। उनका ध्यान जब इस ओर दिलाया गया तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कहा कि वह टाइपिस्ट की गलती से हुआ होगा, पर उन्होंने अभी तक उसमें भूल सुधार नहीं किया या करवाया। फेसबुक पर विपरीत लिंगियों में मित्रता भी आम बात है और इसकी परिणति कभी-कभी ही नहीं बल्कि प्राय: प्रेम संबंध में भी हो जाती है, पर जब दोनों रूबरू होते हैं तो सही स्थिति का पता चलने पर बड़ी निराशा होती है और कभी-कभी इसकी परिणति आत्महत्या तक में हो जाती है। कैम्ब्रिज एनालिटिका लीक कांड के बाद वाट्सऐप के सह-संस्थापक ब्रायन एक्टन ने वाट्सऐप से संबद्ध लोगों को, विशेषकर वाट्सऐप पर नियमित रूप से क्लिक करने वाले उपभोक्ताओं से सोशल मीडिया प्लेटफार्म को हटाने के लिए कहा है। कहा जा रहा है कि जो लोग फेसबुक एकाउंट-धारक हैं उन्हें भी अब फेसबुक से किनारा कर लेना चाहिए। पर क्या इतना ही काफी होगा? उसे डिलीट करना असंभव न सही, पर उतना आसान भी नहीं है। ज्ञातव्य है कि फेसबुक ने 2014 में वाट्सऐप का अधिग्रहण कर लिया था।

ऐसे बहुत-से लोग होंगे जो कभी भी फेसबुक के सदस्य नहीं रहे। इसके बावजूद फेसबुक के पास उनका डाटा है जो उसे उन लोगों से मिला है जो फेसबुक का प्रयोग करते हैं और उसमें जाने-अनजाने अपने मित्रों, परिचितों, संबंधियों आदि के बारे में भी जानकारी दे देते हैं। इतना ही नहीं, यह भी अब स्पष्ट हो गया है कि फेसबुक कुछ दलालों यानी ‘थर्ड पार्टी’ से भी लोगों के संबंध में डाटा खरीदता रहा है और इस डाटा में उनके बारे में और भी बहुत-कुछ है जो वे स्वयं अपने संबंध में नहीं जानते हैं। फेसबुक को पता है कि हम कहां रहते हैं और कब-कब कहां रहे, कहां क्या काम करते हैं और करते रहे, हमारा पूरा इतिहास, किन-किन लोगों से हमारा परिचय है, किनसे कब और कहां मिलते हैं, हम कितने अमीर या गरीब हैं, हमें किन चीजों का शौक है, हमारी राजनीतिक विचारधारा क्या है, आदि- और भी बहुत-कुछ। और यह कोई साधारण बात नहीं है। जितना ही अधिक फेसबुक को पता है उतना ही अधिक वे उसमें से आलोड़न कर अपने मतलब की बात निकाल लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त सूचनाएं यदि गलत लोगों के हाथ पड़ जाएं तो उनका किस प्रकार दुरुपयोग किया जा सकता है- इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

कहा जा रहा है कि इस संबंध में सरकारों द्वारा कानून में और कड़ाई की जानी चाहिए। पर समस्या वास्तव में इससे अधिक गंभीर है। यह नहीं भूलना चाहिए कि वेबसाइटों का निर्माण निगमों के अपने हितों को ध्यान में रख कर किया जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि इंटरनेट के नियम जनसामान्य के हित के लिए बनाए जाने चाहिए और किसी को भी डाटा संकलन का अधिकार तब तक नहीं दिया जाना चाहिए जब तक कि इस बात से संतुष्ट न हो लिया जाए कि वे जो काम कर रहे हैं उसके लिए यह आवश्यक है। इस संबंध में यूरोपीय संघ ने जो नियमन प्रस्तावित किया है और जिसे आगामी 25 मई से लागू किया जा रहा है वह बहुत-कुछ यही काम करेगा। इसमें इस बात का भी प्रावधान है कि डाटा एकत्र करने वाली संस्था संबंधित दस्तावेजों के माध्यम से गोपनीयता की गारंटी देगी।

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