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किताबें मिलीं कॉलम में नई किताबें : कांच की बारिश, ब्रांड मोदी का तिलिस्म, नैनीताल: एक धरोहर

कवि की अधूरी दुनिया को उसकी कविता सजाती-संवारती है। हर कवि दरअसल, एक बेहतर इंसान और घनीभूत संवेदनशील होने के दबाव में कविता की प्रकृति की ओर उन्मुख होता है।

Author नई दिल्ली | June 19, 2016 6:53 AM
Jansatta ravivari, poems, puja khillan, poetry, poems of puja khillanप्रतीकात्मक तस्वीर।

कांच की बारिश

कवि ही धरती के सौंदर्य को याद दिलाता रहता है। कवि की अधूरी दुनिया को उसकी कविता सजाती-संवारती है। हर कवि दरअसल, एक बेहतर इंसान और घनीभूत संवेदनशील होने के दबाव में कविता की प्रकृति की ओर उन्मुख होता है। भावनात्मक स्तर पर किशोर वैभव ऐसे ही पर्यावरण से धीरे-धीरे अपना नाता जोड़ रहे हैं। वे चीजों का धीरे-धीरे अवलोकन कर रहे हैं। चीजों के उस पार जाने की उद्यमिता भी उनमें निरंतर संभावित प्रतीत हो रही है।

इधर मुख्यधारा की हिंदी कविता में सब कुछ है, पर प्रकृति एक सिरे से गायब होती जा रही है, कवि और आलोचक जैसे उसकी उपेक्षा के किसी संधि प्रस्ताव से बंधे हों। किशोर के यहां यह प्रकृति भले बिना गूढ़ इशारों के बिंब नहीं गढ़ती, पर उसकी उपस्थिति ही वह प्रमाण है, जो उसे भविष्य में उसके लोकेल की जिंदगी को शिद्दत से रचेगी- खुला आसमान, धूप-छांव, गुजरा सावन, सर्द दिन, छत पर आती ठंडी हवा, डाल पर बैठी चिड़िया, बारिश का पानी, नदी की धार।

कांच की बारिश: किशोर वैभव; सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर; 150 रुपए।


ब्रांड मोदी का तिलिस्म

हर दौर में बदलाव के अपने प्रतीक और मानक होते हैं। फिर बदलाव अपने साथ कई तरह के सपने लेकर आता है। लोकतंत्र में चुनाव एक मायने में सामूहिक सपनों को साकार करने का साधन भी होता है। लेकिन पहली बार कोरे सपनों की चुनावी सियासत ने देश के बड़े हिस्से को प्रभावित किया। जिन क्षेत्रों के नतीजों पर उसका असर नहीं दिखा, वहां भी वह दिलचस्पी जगा गया। इसके प्रतीक के रूप में नरेंद्र मोदी नामक ऐसी शख्सियत उभरी, जिसका केंद्रीय राजनीति में खास बोलबाला नहीं था। वे नए दौर के नए ब्रांड की तरह स्थापित हुए।

आखिर ब्रांड मोदी कैसे बुना गया, कैसे लोगों में सत्ताधारियों से मोहभंग पर इसका मुलम्मा चढ़ाया गया, कैसे अपनी पार्टी में अहम न माना जाने वाला एक शख्स केंद्रीय मंच की धुरी बन गया, किन ताकतों और स्थितियों से उसे मदद मिली, कैसे-कैसे मतदाताओं के अलग-अलग रुझान एकरूप हो गए, कैसे उत्तर, पश्चिम और हिंदी पट््टी में जुनून पैदा हुआ, और कैसे तेजी से उसकी रंगत फीकी पड़ने लगी? ये सवाल लंबे समय तक राजनीतिक पंडितों का ध्यान खींचते रहेंगे। आखिर ऐसे सपनों के सौदागर समूचे इतिहास में गिने-चुने ही होते हैं। यह किताब इसी रहस्य के हर सूत्र को तमाम आंकड़ों के साथ खोलती है।

ब्रांड मोदी का तिलिस्म: धर्मेंद्र कुमार सिंह; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 325 रुपए।


नैनीताल: एक धरोहर
प्रयाग पांडे इतिहासकार बेशक नहीं हैं, पर इतिहास के एक बेचैन शोधार्थी वाले तमाम गुण उनमें हैं। इतिहास को पहले खोजना, फिर उसकी मुकम्मल पड़ताल करना और अंत में उसे संवारना, अनूठा गुण है प्रयाग में। उन्होंने इस पुस्तक में नैनीताल के किसी भी आयाम को अछूता नहीं छोड़ा है। इस किताब को शोध प्रबंध कह सकते हैं, प्रामणिक दस्तावेज भी कह सकते हैं और चाहें तो जीवन के समस्त पहलुओं का समग्र विवेचन भी।

अपने अध्ययन को प्रयाग ने कई अध्यायों में बांटा है। इसमें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से शुरुआत है, तो मानसखंड के नैनीताल संदर्भों की विवेचना भी। बसावट की स्थिति के पहले का चित्रण है, तो नैनीताल के पहले नक्शे तक को तलाशा गया है। बड़ा ही व्यापक, वृहद और विशाल परिप्रेक्ष्य है इस अध्ययन का। इस पुस्तक में प्राचीन काल से लेकर आजादी के बाद के नैनीताल की चहुंमुखी दशा और दिशा का सम्यक चित्रण और विश्लेषण किया गया है।

नैनीताल: एक धरोहर; प्रयाग पांडे; कंसल प्रिंटर्स, सुमित्रा सदन, मल्लीताल, नैनीताल; 600 रुपए।

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