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शख्सियत: युग प्रवर्तक साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी

द्विवेदी जी का रचना संसार विपुल है। उनके लिखे और अनुदित ग्रंथों की संख्या 81 है। पद्य के मौलिक ग्रंथों में काव्य-मंजूषा, कविता कलाप, देवी-स्तुति और शतक आदि प्रमुख है। गंगा लहरी, ऋतु तरंगिणी, कुमार संभव सार आदि उनके अनूदित पद्यग्रंथ हैं।

महावीर प्रसाद द्विवेदी।

हिंदी को आज एक समृद्ध विश्वभाषा का दर्जा हासिल है। हिंदी की भाषागत साख पुख्ता करने और इसके भीतरी अनुशासन को मजबूत करने में जिन लोगों की बड़ी भूमिका रही, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम उनमें अग्रिम पंक्ति में है। हिंदी के प्रति उनके समर्पित जीवन और यशस्वी कार्यों का ही नतीजा रहा कि हिंदी साहित्य के एक पूरे दौर को आज हम ‘द्विवेदी युग’ (1903-1916) के तौर पर जानते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, मैथिलिशरण गुप्त जैसे हिंदी साहित्य के कई दिग्गज इसी युग की देन हैं।

हिंदी के इस महान लेखक और पत्रकार का जन्म रायबरेली के दौलतपुर गांव में 15 मई 1864 में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. रामसहाय दुबे था। आर्थिक तंगी के कारण उनकी तालीम का सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चला। बाद में उन्हें जीआइपी रेलवे में नौकरी मिली। उन्होंने काफी निष्ठा से काम किया तथा उन्नति करते-करते अहम पद पर पहुंच गए। किंतु स्वाभिमान के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी।

नौकरी से मुक्त होते ही वे ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक हो गए। उन्होंने17 वर्षों तक इसका संपादन किया। इस पत्रिका का हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के विकास में अमूल्य योगदान है। इसके संपादन कार्य से अवकाश प्राप्त कर द्विवेदी जी अपने गांव चले आए और वहीं 29 दिसंबर 1938 को उनका स्वर्गवास हो गया।

द्विवेदी जी का रचना संसार विपुल है। उनके लिखे और अनुदित ग्रंथों की संख्या 81 है। पद्य के मौलिक ग्रंथों में काव्य-मंजूषा, कविता कलाप, देवी-स्तुति और शतक आदि प्रमुख है। गंगा लहरी, ऋतु तरंगिणी, कुमार संभव सार आदि उनके अनूदित पद्यग्रंथ हैं। हिंदी भाषा के प्रसार और पाठकों के रुचि परिष्कार के लिए उन्होंने विविध विषयों पर निबंध लिखे।

उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में संस्कृत टीकाकारों की तरह कृतियों का गुण-दोष विवेचन किया और खंडन-मंडन की शास्त्रार्थ पद्धति को अपनाया। वे सरल-सुबोध भाषा के हिमायती थे। उनकी भाषा में न तो तत्सम शब्दों की अधिकता है और न उर्दू-फारसी के अप्रचलित शब्दों की भरमार। मसलन वे ‘गृह’ के स्थान पर ‘घर’ और ‘उच्च’ के स्थान पर ‘ऊँचा’ लिखना ज्यादा पसंद करते थे।

उनका जोर भाषा की शुद्धि पर बहुत था क्योंकि जब उन्होंने लेखन शुरू किया तो हिंदी भाषा व्याकरण की अराजकता की शिकार थी। उन्होंने इस दिशा में कितना कार्य किया और किस तरह कवियों-लेखकों की भाषा को मांजा, इसके कई उदाहरण हैं। मैथिलीशरण गुप्त ने बेबाकी से यहां तक स्वीकार किया- द्विवेदी जी ने मेरी उलटी-सीधी रचनाओं का पूर्ण शोधन किया। उन्हें सरस्वती में छापा और पत्रों द्वारा भी मेरा उत्साह बढ़ाया।

आत्मगौरव और आत्मप्रशंसा से दूरी बनाए रखना उनका सहज स्वभाव था। 1933 में उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर जब नागरी प्रचारिणी सभा ने उनके अभिनंदन का कार्यक्रम रखा तो उन्होंने वहां कहा, ‘मुझे आचार्य की पदवी मिली है, क्यों मिली है मालूम नहीं। कब और किसने दी है यह भी मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना है कि मैं बहुधा इस पदवी से विभूषित किया जाता हूं… मैंने बनारस के किसी संस्कृत कॉलेज में भी कदम नहीं रखा कभी… फिर इस पदवी का मैं मुस्तहक कैसे हो गया?’ इस युग प्रवर्तक साहित्यकार ने हिंदी को जो अनुशासन और अनुशीलन दिया, उसके बूते ही आज इस भाषा और इसके साहित्य का संसार इतना समृद्ध है।

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