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परिप्रेक्ष्य: कामयाबी के पैमाने

शिक्षा के बाजारीकरण में हमें यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि किस वर्ग का, किस जाति का विद्यार्थी किन शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहा है और वह उस शिक्षा के आधार पर अपने भविष्य को कैसे सुनिश्चित करता है?

Author December 30, 2018 3:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

ज्योति सिडाना

शिक्षा मनुष्य को आलोचनात्मक चेतना प्रदान करने वाली एक गत्यात्मक प्रक्रिया है। शिक्षा साधन है और मूल्य साध्य होते हैं। उदाहरण के लिए लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, स्वतंत्रता, समानता और ईमानदारी ऐसे मूल्य हैं जिन्हें शिक्षा के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए मूल्य किसी भी समाज के विकास का स्पष्ट खाका होते हैं, क्योंकि यही नागरिकों का जीवन निर्माण करते हैं। शिक्षा मनुष्य को किसी भी पूर्वाग्रह, पक्षपात, भेदभाव के बिना उन मूल्यों से परिचित करवाती है जो विकास का आधार तैयार करते हैं। मूल्य सिखाए नहीं जाते, बल्कि व्यवहार के माध्यम से हम उन्हें अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाते हैं। मूल्य समय, स्थान, संस्कृति सापेक्ष होते हैं, इसलिए समाज के बदलने पर इनमें भी बदलाव होता है। बच्चों को प्राथमिक कक्षाओं से ही इन मूल्यों को बताना शुरू कर दिया जाता है। इन्हें स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाता है, परंतु क्या इन मूल्यों की सही व्याख्या की जाती है?

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों में आलोचनात्मक चेतना पैदा करना, उन्हें सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनितिक पूंजी में बदलना, व्यक्तित्व का समग्र विकास करना, चरित्र निर्माण करना, प्रतिरोध की संस्कृति उत्पन्न करना, दासता / शोषण से मुक्त कराना इत्यादि होता है। देखा जाए तो प्राचीन काल में शिक्षा पूर्णत: व्यक्तित्व विकास पर बल देती थी। मध्य काल में समाजोपयोगी शिक्षा पर बल दिया जाता था और आधुनिक काल में तकनीकी / व्यावसायिक शिक्षा एवं व्यक्ति-कौशल पर बल दिया जा रहा है जो भौतिकता पर बल देती है, जिसमें नैतिकता का अभाव है, संस्कृति व मानव मूल्यों का अभाव है, जो दिशाहीन पीढ़ी को उत्पन्न कर रही है। महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि हमारी शिक्षा पद्धति कैसी है, विवेचनात्मक या सृजनात्मक? क्या शिक्षक जो पढ़ा रहे हैं उसे उन्होंने अपने जीवन का हिस्सा बनाया है? चूंकि बच्चे सबसे ज्यादा समय स्कूल में या शिक्षक के साथ बिताते हैं, उन्हें जैसा व्यवहार करते देखते हैं, वैसा सीखते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो वे विरोधाभास का शिकार होते हैं (यानी पढ़ाया कुछ और दिखाया कुछ)। हम यहां दो तरह की शिक्षा पद्धति की बात कर सकते हैं। पहला, आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र अर्थात जिसमें समाज और उससे जुड़े मुद्दे हम कक्षाओं में पढ़ाते और चर्चा करते हैं और फिर पाठ्यक्रम की अंतर्वस्तु की व्याख्या करते हैं। यह ‘समझ का खुला प्रारूप’ है जिसमें शिक्षण, शोध, विस्तार पर बल दिया जाता है, ताकि बच्चों में स्वाभाविक शिक्षण, कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता विकसित हो सके। इससे बच्चों में सृजनशील मस्तिष्क का विकास होता है। दूसरा, परंपरागत / रूढ़िवादी शिक्षाशास्त्र अर्थात समाज और उससे जुड़े मुद्दे कक्षाओं का हिस्सा नहीं बनते, केवल पाठ्यक्रम तक ही कक्षाओं की चर्चा सीमित रहती है। यह ‘समझ का बंद प्रारूप’ है जिसमें केवल शिक्षण पर बल दिया जाता है, जैसे आरोपित शिक्षण या थोपी गई शिक्षा इत्यादि। संभवत: इसलिए इसमें सृजनशीलता और कल्पनाशीलता की संभावनाएं भी समाप्त हो जाती हैं और इससे बच्चों में ‘बंधक मस्तिष्क’ (कैप्टिव माइंड) का विकास होता है।  यहां कुछ प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं, जैसे शैक्षणिक संस्थानों में सफलता के क्या अर्थ हैं? सफलता एवं प्रतियोगिता के मध्य क्या संबंध है? बाजार-निर्देशित शिक्षा

किस प्रकार के व्यक्तित्व को निर्मित कर रही है? क्या खुशहाली सूचकांक और विकास सूचकांक की तरह सफलता सूचकांक की अवधारणा भी संभव है.. इत्यादि? यह कहा जा सकता है कि उच्च शिक्षा में एक विरोधाभासी ढांचा उभरा है जिस पर आलोचनात्मक तरीके से ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसे कोई विद्यार्थी बारहवीं की परीक्षा में अठहत्तर फीसद लाता है और प्रतियोगिता में अच्छी रैंक से पास हो जाता है, जबकि कोई बच्चा निनन्यानवे फीसद लाकर सर्वोच्च स्थान हासिल करने के बाद भी प्रतियोगिता से बाहर हो जाता है, क्यों? क्या हम विद्यार्थियों को केवल सूचना उपलब्ध करवा रहे हैं? अगर ऐसा कर रहे हैं तो हम उसकी विश्लेषण करने की क्षमता को नष्ट कर रहे हैं। संभवत: यही कारण है कि आज के अधिकांश विद्यार्थियों के पास सूचनाओं का तो भंडार है, लेकिन वह उसके आधार पर विश्लेषण करने या विषय की समझ विकसित करने में असमर्थ अनुभव करते हैं। उपन्यासकर अनातोले फ्रांस का मत है कि ‘शिक्षा का ये मतलब नहीं है कि आपने कितना कुछ याद किया हुआ है, या ये कि आप कितना जानते हैं, बल्कि इसका मतलब है आप जो जानते हैं और जो नहीं जानते हैं उसमे अंतर कर पाना।’ बाजारवाद और वैश्वीकरण ने प्रतियोगिता, व्यक्तिवादिता एवं सफलता को महत्त्वपूर्ण मूल्य के रूप में स्थापित किया है। ये तीनों मूल्य सामूहिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए सामाजिक विकास और सामाजिक हित से संबद्ध पक्षों को चुनौती मिल रही है। अब सिर्फ यही तीन मूल्य पढ़ाए जा रहे हैं, इसलिए जीवन निर्माण या व्यक्तित्व विकास में शिक्षा सहायक नहीं, बल्कि अंतर्विरोधी है। संभवत: इसलिए नवाचार और सृजनात्मकता के लक्षण हाशिये पर नजर आने लगे हैं। ज्ञान का स्थान कौशल ले रहा है, बच्चे केवल नौकरी करने के लिए पढ़ते हैं, ज्ञान हेतु नहीं। अब शिक्षा अपने उद्देश्य में आंशिक रूप से सफल हो रही है। इस शिक्षा ने उन्हें एक तरफ ज्ञान और सूचना के विश्व से जोड़ा है तो दूसरी तरफ परिवार, मित्र, पड़ोस और अनौपचारिक विश्व से पृथक कर दिया है।

शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है कि बच्चों को हर बात को प्रश्न पूछ कर अपने आप समझने की शिक्षा दी जाए। विद्यालय की कक्षाओं में बच्चों को कुछ भी रटने की आवश्यकता नहीं, बल्कि सभी विषय प्रश्न-उत्तर के माध्यम से बच्चे स्वयं पढ़ें और समझें। व्यस्क शिक्षा का उद्देश्य लिखना-पढ़ना सीखने के साथ-साथ समाज का आलोचनात्मक विवेचन करना है जिसमें गरीब व शोषित विद्यार्थियों को अपने समाजों, परिवेशों, परिस्थितियों और उनके कारणों को समझने की समझ विकसित हो, ताकि वे अपने पिछड़ेपन और गरीबी के मूल कारणों को समझ सकें और उनसे लड़ने के लिए सशक्त हों। इसके लिए किसी भी समुदाय में पढ़ाने से पहले शिक्षक को वहां शोध करना चाहिए और समझना चाहिए कि वहां के लोग किन शब्दों का प्रयोग करते हैं, उनकी क्या चिंताएं हैं, वे क्या सोचते हैं, इत्यादि। फिर शिक्षक को प्रयास करना चाहिए कि उसकी शिक्षा उन्हीं शब्दों, चिंताओं इत्यादि से जुड़ी हुई हो। विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गुणवत्तामूलक शिक्षा और सामाजिक पृष्ठभूमि के मध्य संस्तरणमूलक संबंध है जिसमें उच्च वर्ग का विद्यार्थी उच्च शिक्षण संस्थानों में व निम्न वर्ग का विद्यार्थी निम्न स्तरीय शिक्षण संस्थानों में शिक्षा लेने के लिए बाध्य होता है। शिक्षा के बाजारीकरण में हमें यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि किस वर्ग का, किस जाति का विद्यार्थी किन शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहा है और वह उस शिक्षा के आधार पर अपने भविष्य को कैसे सुनिश्चित करता है? आज की पीढ़ी विचारहीन विचारों से भरी नकलची पीढ़ी है, उसके पास फंडे हैं, जुमले हैं, लेकिन चिंतन नहीं है या कहें कि उसके पास चिंतन प्रधान भाषा का अभाव है। यह चिंतन का विषय है। इसलिए बच्चों को ये सिखाया जाना चाहिए कि कैसे सोचें, ना कि क्या सोचें। इसके लिए आवश्यक है कि विद्यार्थियों में सामाजिक यथार्थ की आलोचनात्मक, व्यापक एवं वैज्ञानिक समझ को विकसित किया जाए, संवैधानिक मूल्य जैसे सहनशीलता, बाहुल्यता का सम्मान, समानता एवं विकास के बहुआयामी चरित्र की अवधारणा को उनकी चेतना का भाग बनाया जाए, स्थानीय संस्कृति, अर्थतंत्र, राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था की प्रारंभिक जानकारी दी जाए, ताकि विद्यार्थियों में राज्य, देश एवं वैश्विक संदर्भ में विकासात्मक पक्ष के साथ सभी पक्षों को समझने की समझ विकसित हो।

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