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तीरंदाज: निगहबान पूंजीवाद का अंधा कुआं

निगहबान पूंजीवाद मतदाता को बरगला कर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार कर रहा है। चुनाव को डिजिटल तरीके से फिक्स या तय करके अपने हिसाब का नेतृत्व देने की चेष्टा कर रहा है।
ब्रिटिश कन्सल्टिंग कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका पर आरोप लगा है कि उसने पांच करोड़ फेसबुक यूजरों का डेटा बिना अनुमति के जमा किया।

शायद हमें नींद में चलने की आदत है। नीद में चलते वक्त हमारी आंखें तो खुली रहती हैं, पर दिखता कुछ नहीं है। हम बस यों ही चाभी भरे खिलौने की तरह या फिर रोबोट की माफिक उठते हैं और कुछ करके वापस बिस्तर पर लेट जाते हैं। उठने पर याद नहीं रहता कि क्या किया था और क्यों किया था। लेकिन क्रिया तो हो गई थी। उसका रिकार्ड बन भी गया था। इस रिकार्ड की वजह से कैंब्रिज एनालिटिका और फेसबुक पर सवाल उठे हैं और इनका जवाब भी हमारी आदतों से जुड़ा हुआ है। फेसबुक करीब चौदह साल पहले शुरू हुआ था। वह इंटरनेट पर सवार होकर आया था। इंटरनेट भी ज्यादा पुराना नहीं है। इसका आम प्रयोग महज तीन दशक पहले शुरू हुआ था। पर बहुत ही कम समय में ये दोनों हमारी जिंदगी पर इस तरह से हावी हो गए हैं कि इनके बिना जीना दुश्वार है। शुरू में इंटरनेट संदेशों की खेती पर चलता था। सबीर भाटिया ने मुफ्त में संदेश भेजने और पाने के लिए ‘हॉटमेल डॉट कॉम’ बनाया था और यह फौरन लोकप्रिय हो गया था। इसके बाद तमाम मेल सेवाएं बाजार में आई थीं और उसके बाद ‘याहू’ और ‘गूगल’ जैसी कंपनियां हमारी और जरूरतों, जैसे समाचार, मनोरंजन या सर्च यानी खोज को पूरा करने में लग गई थीं। इंटरनेट पर हर विषय पर कंटेंट भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने लगा था और हम उसका इस्तेमाल बेरोक-टोक करने लगे थे। हॉटमेल सेवा मुफ्त थी, लेकिन उसका सारा व्यवसाय पीछे के दरवाजे से होता था। हॉटमेल पर जो भी आता था, उसकी पूरी प्रोफाइल साइबर गोदाम में जमा कर ली जाती थी और फिर उसे बड़ी कंपनियों को वाजिब दामों पर बेच दिया जाता था। ये कंपनियां मेल प्रोफाइल का अध्ययन करके अपनी विज्ञापन नीति बनाती थीं, जिससे उनकी बिक्री बढ़े और मुनाफा ज्यादा हो सके।

वास्तव में शुरुआती दौर में ही ‘मुफ्त’ इंटरनेट ने अपना बिजनेस मॉडल बना लिया था। उसका ‘आधार’ व्यक्ति विशेष के बारे में जानकारी जमा करना था और फिर एक से एक को जोड़ कर उपभोक्ता समुदायों का रेखा चित्र या प्रोफाइल तैयार करना था। यह डाटा या आधार सामग्री बाजार में चलने वाले नए सोने के सिक्के साबित हुए थे। व्यक्तिगत जानकारी जमा करने की होड़ ‘फेसबुक’ जैसी सोशल नेटवर्क वेबसाइटों के आने से और तेज हो गई थी। ई-मेल लोग जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते थे, लेकिन ‘फेसबुक’ के आते ही इंटरनेट का उपयोग हजारों गुना बढ़ गया था। सोशल नेटवर्क खुद में रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरत ऐसा बन गया था कि उसके बिना एक पल भी काटना नामुमकिन था। ऐसे में उपयोगकर्ता अपने को एक दिन में दसियों बार इंटरनेट पर जाहिर करने लगा था। वह कहां है, क्या खरीद रहा है, क्या पढ़ रहा है, क्या देख रहा, क्या सोच रहा है और उसके ‘दोस्त’ कौन-कौन हैं वगैरह। आपकी और हमारी अंतरंग सूचनाओं ने बाजार को और जानने के लिए ललचा दिया था। यहीं से शुरू हुआ पूंजीवाद का नया संस्करण- ‘सर्विलांस कैपिटलिज्म’ यानी निगहबान पूंजीवाद। निगरानी करके पैसा कमाने का धंधा लगभग सन 2000 में व्यापक स्तर पर चुपचाप शुरू हुआ था। इसमें सभी बड़ी कंपनियां भागीदार थीं। उन्होंने सोशल नेटवर्क को ऐसा डिजाइन करवाया था कि आम लोग उसके आदी हो जाएं। नेटवर्क पर तरह-तरह से हमें अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा करने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाने लगा था। बाजार हमें निचोड़ रहा था, लेकिन हमको उसका अहसास नहीं होने दे रहा था। यों कहीं न कहीं तो हमें मालूम था कि सामान मुफ्त नहीं है। मगर हम बेपरवाह थे, क्योंकि कीमत हमसे सीधी नहीं वसूली जा रही थी। काफी सारे मजे के लिए थोड़ी-सी निजता गंवाना हमें मंजूर था।

निगहबान पूंजीवाद शब्द 2015 में गढ़ा गया था और उसकी उत्पत्ति का कारण बाजार नहीं, बल्कि राजनीति थी। 2008 में अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हुआ था, जिसमें सोशल मीडिया का पहली बार व्यापक स्तर पर उपयोग हुआ था। बराक ओबामा की जीत का कुछ श्रेय सोशल नेटवर्किंग मंचों और इंटरनेट से लिए गए ‘बिग डाटा’ को दिया गया था। लेकिन वास्तव में 2012 के चुनाव में इंटरनेट पर उपलब्ध ‘आधार सामग्री’ यानी डाटा का सबसे कारगर उपयोग हुआ था। ओबामा के चुनावी अभियान ने इसको इतना विकसित कर दिया था कि उनका प्रचार उन वोटरों तक भी पहुंच गया, जिन वोटरों के होने का उनके प्रतिद्वंद्वी को इल्म तक नहीं था। इंटरनेट पर उपलब्ध महंगा वोटर डाटा, यानी मतदाता के व्यवहार के बारे में जानकारी फौरन दुनिया भर के राजनेताओं के लिए पहली चुनावी जरूरत बन गया। इसकी खरीद-फरोख्त का काला बाजार हर जगह खुल गया। ‘फेसबुक’ ने 2010 में खुद एक अध्ययन करवाया था, जिसमें पाया गया था कि 0.4 प्रतिशत वोटर ऐसे थे, जिन्होंने अपना मत यह जान कर बदल दिया था कि उनके मित्र और परिवार वाले किसी और को वोट दे रहे थे। सोशल नेटवर्क पर ‘प्रेरित संदेश’ करके उन्हें अपना मत बदलने के लिए उकसाया गया था। हालांकि प्रथम दृष्ट्या कहा जा सकता है कि यह 0.4 प्रतिशत बड़ा आंकड़ा नहीं है। लेकिन अमेरिका जैसे देश में, जहां राष्ट्रपति का सीधा चुनाव होता है, इसका कुल जमा वोट तीन लाख चालीस हजार बनता है। याद रहे 2000 में जॉर्ज बुश कोई दो-तीन सौ वोट से राष्ट्रपति का चुनाव जीते थे। 2016 में डोनाल्ड ट्रंप को एक अनुमान के अनुसार एक लाख वोट मात्र एक क्षेत्र से ही ‘टारगेटेड प्रोफिलिंग’ की वजह से मिले थे।

निगहबान पूंजीवाद आज आपने चरम पर है। बाजार-सरकार-राजनीति का गठबंधन बहुत गहरा हो चुका है। बाजार को अपने उपभोक्ता को हांकने के लिए निगहबानी चाहिए तो नेताओं को मत पलटने के लिए इसकी जरूरत है। उधर सरकार ज्यादा से ज्यादा निगहबानी आंतरिक सुरक्षा का बहाना देकर रखना चाहती है। तीनों तंत्र आम आदमी के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं। वे उसको अपनी मनमर्जी से हांकना चाहते हैं, उसके व्यवहार पर अपना पंजा कसना चाहते हैं। अगर पूंजीवाद वर्ग विभाजन पर आधारित था तो निगहबान पूंजीवाद भेड़ों को बकरी और बकरियों को भेड़ बना कर उनके चरवाहों की तरफ सुनियोजित तरीके से हांकने पर आधारित है। आम आदमी के लिए ये सब बड़े खतरे हैं। लेकिन इनमें से सबसे बड़ा खतरा राजनीतिक है। निगहबान पूंजीवाद मतदाता को बरगला कर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार कर रहा है। चुनाव को डिजिटल तरीके से फिक्स या तय करके अपने हिसाब का नेतृत्व देने की चेष्टा कर रहा है। वह हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता को निगल कर हमको डिजिटल गुलाम बनाने पर आमादा है। हमें अब नींद में चलने सरीखी डिजिटल आदतें बदलनी होंगी, वरना हम एक अंधे कुएं में गिर जाएंगे और उसमें हमेशा के लिए कैद हो जाएंगे।

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